Tuesday, July 15, 2025

लघुकथा: “राशन कार्ड से विदेश यात्रा – मोदी मॉडल”

(हास्य-व्यंग्य | पृष्ठभूमि: मुस्लिम समाज)

मोहल्ला “चिकनवाला चौक” सुबह से हलचल में था।
हाजी समसुद्दीन की पान की दुकान पर भीड़ जमा थी। वजह? मोहल्ले के ‘अंतरराष्ट्रीय एजेंट’ बशीर मियां फिर से सऊदी भेजने वाला प्रोजेक्ट लेकर आए थे।

"अबे बशीर! पासपोर्ट तो लगेगा ना?" – रईस ने पूछा।

बशीर मियां ने बीड़ी सुलगाई, एक गहरी सांस ली और कहा –
"अबे गंवार! अब जमाना बदल गया है, अब पासपोर्ट की जगह राशन कार्ड से भी काम चल जाता है।"

भीड़ में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई।

"सच कह रहे हो बशीर भाई?" – कलीम ने पान थूकते हुए पूछा।

"भाई, अल्लाह गवाह है! खुद क्राउन प्रिंस ने छूट दे दी है –
‘जो चावल खाता है, वही हमारे यहाँ काम करेगा।’"

लोगों की आँखों में चमक आ गई।
बशीर मियां ने समझाया –
"बस दस हजार रुपए जमा करो, एक फोटो दो, और राशन कार्ड की कॉपी – बाकी सब हम देख लेंगे।"

यह सुनते ही मोहल्ले के बेरोज़गारों में नई जान आ गई।
मुजफ्फर, जो अब तक दूल्हे का सेहरा पहनने के ख्वाब में था, बोला –
"अब्बू कहते थे रोज़गार निकले तो शादी की सोचूंगा… अब तो दो-दो बीवी ले आउंगा!"


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अगले दिन मस्जिद के बाहर "ओपन इंटरव्यू" रखा गया।

एक टेबल, एक गद्दा, और पीछे एक बैनर टंगा था –

> “राशन कार्ड रखो, रिजर्वेशन लो – सऊदी तुमको बुला रहा है।”



सवाल भी दिलचस्प थे:

> "तुम्हारे राशन कार्ड पर कितने यूनिट हैं?"
"पिछली बार कितनी बार केरोसिन लिया था?"
"चावल ज्यादा खाते हो या आटा?"



जिसने भी दिल से जवाब दिया, उसे “फाइनल सेलेक्शन” का ठप्पा मिल गया।
किसी ने बकरा बेच दिया, किसी ने बीवी के गहने – दस-दस हजार जमा हो गए।


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इसी बीच मोहल्ले में नई चर्चा शुरू हो गई –

"ये सब मोदी जी की विदेश नीति का कमाल है!" – चचाजान ने कहा।
"पहले वीज़ा-पासपोर्ट बनवाने में साल लग जाता था… अब राशन कार्ड से ही विदेश जाया जा सकता है!"

"देश बदल रहा है – पहले खाने को राशन चाहिए था, अब विदेश जाने को!" – दुकानदार ने चुटकी ली।


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मगर हर मोहल्ले में दो पढ़े-लिखे जरूर होते हैं –
यहाँ थे नसीम इंजीनियर और फारूक M.A. (इंग्लिश)।

उन्होंने बशीर मियां से इश्तहार का पन्ना मांगा।
गौर से पढ़ा, और माथा पकड़ लिया –

“सऊदी की भाषा अरबी की जगह ‘अरवी’ लिखी थी।”

“तनख्वाह 1500 रियाल की जगह लिखा था – '15,000 भारतीय रुपए + दो टाइम चाय'।”

“और सबसे बड़ी बात – पासपोर्ट की जगह राशन कार्ड से विदेश भेजा जा रहा था!”


नसीम ने पूछा –
"बशीर भाई, ये 'अरवी' कौन सी भाषा है?"

बशीर मुस्कराया –
"अबे तूने अरवी की तरकारी नहीं खाई क्या? वही वाली!"

फारूक बोला –
"भाई, तनख्वाह रियाल में होनी चाहिए, रुपए में क्यों?"

बशीर झल्लाया –
"कम्पनी भारतीय है मियाँ! काम सऊदी में करती है, तनख्वाह भारत में देती है। और पासपोर्ट-वासपोर्ट सब पुराने सिस्टम की चीजें हैं – अब राशन कार्ड से ही बायोमेट्रिक हो जाता है!"

लोग हँसी रोक न सके, मगर कुछ अब भी श्रद्धा में डूबे थे –
"इतनी जानकारी है भाई को, ज़रूर अंदर का लिंक होगा!"
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पर एक हफ्ते बाद… बशीर मियाँ ग़ायब!
फोन बंद, दुकान बंद, मोहल्ला फिर उसी चाय, पान और बेरोज़गारी की दुनिया में लौट आया।

अब हाजी समसुद्दीन की दुकान पर एक तख्ती टंगी है:

> “मोदी है तो मुमकिन है।”

🔸 समाप्त 🔸

Monday, July 4, 2022

क्या अहल ऐ जहाँ तुझको सितमगर नही कहते....


किसी भी तरह की बर्बरता, हैवानियत और हत्या को, किसी भी तरह सही नही ठहराया जा सकता है। आप चाहे इंसानियत,सियासत,धर्म या फिर किसी भी एंगल से सोचे, नंगी आंखों से देखे या धर्म-अधर्म की ऐनक लगाकर अगर आप जिंदा इंसान है, एक सभ्य समाज का हिस्सा है तो आपको निर्ममता भरा जघन्य अपराध साफ नजर आयेगा और आना भी चाहिए।
हर ज़ुल्म एक जुर्म होता है और हर तरह के जुर्म की अलग सजा है। जिसके लिए हमारे देश में कानून है कोर्ट है।

किसी भी लोकतांत्रिक देश में सबसे बड़ी आजादी अन्याय के खिलाफ़ बोलने की होती है। ज़ुल्म के खिलाफ़ उठ खड़े होने की होती है पर कानून हाथ में लेने या ख़ुद जज बनकर सजा सुनना या देना जघन्य अपराध है। मौजूदा परिस्थिति में लोकतंत्र एक भीड़ तंत्र बन गया है जहां कभी भी कोई भीड़ आकर किसी को भी धर्म और आस्था के नाम पर घेर कर मार देती है। जो सरसर गलत और निंदनीय है। परंतु इन सब में कहीं ना कहीं लचर प्रशासन और रेंगती न्यायपालिका भी जिम्मेदार है। दोहरे मापदंड, हर खिलाफ़ उठने वाली आवाज को कानून और पुलिस का डर दिखाकर चुप कराना या जेल में डाल देने से देश में जो हताशा, लाचारी और घुटन का माहौल जन्म ले रहा है इससे किसी का भला नही होगा। किसी खास धर्म या समुदाय को निशाना बनाने उनके घरों पर बुल्डोजर चलाने से देश का नाम रौशन नही होगा। दमनकारी नीति केवल सत्ता और उसके चाटुकारो का कुछ दिन ही भला करती है। परंतु उस कुछ वक्त में मानवता और नैतिकता का जो नुकसान होता है उसके परिणाम नस्ल दर नस्ल भुगतने पड़ते है।

आजकल देश का माहौल किसी फिल्म की रोचक पटकथा सा प्रतीत होता है। जिसमें एक फ्रेम की रोचकता जैसे ही कम होने लगती है तुरंत ही एक नया मोड़ कहानी में उभर आता है।
हर रोज एक नया क़िरदार कहानी में जुड़ जाता है। कभी कोई नफरती चिंटू धर्म के नाम पर पिटारा खोल लेता है तो कभी कोई देश भक्ति को ढाल बनाकर अपना उल्लू सीधा कर जाता है। किसी की एक छोटी सी बात भी उसके लिए जिंदगी भर की सजा बना दी जाती है तो किसी का जघन्य अपराध उसके लिए अवसरता के नए राजनीतिक द्वार खोल देता है।

रोज टीवी चैनलों की मज़हब के नाम पर जोश भरी बहस देखकर लगता ही नही की देश में अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोज़गार, सामाजिक और आर्थिक विकास कोई मुद्दा भी है। अपने कथित आकाओं और उनकी गलत नीतियों, प्रोपेगंडा तथा पंगु और छोटी सोच को सही ठहराने की जी तोड़ मेहनत करते टीवी चैनल और उन पर लिपे पुते मुर्दा ज़मीर के जो कसाई अंकर रोज हम-तक ज़हरीली खबरें पहुंचते है। उन्हें फर्क ही नही पड़ता की इसका समाज की मानसिकता पर या फर्क पड़ेगा। किसी विश्व शक्ति के सरबराह द्वारा नैतिक आधार पर हाल चाल पूछना पहले पन्ने की ख़बर बनाकर फैलाई जाती है। भले ही उसी पल आपके देश में कोई धर्म के नाम पर कत्ल किया जा रहा हो या कोई नौजवान नौकरी ना मिलने की हताशा में खुदकुशी कर रहा हो कोई मायने नही रखता है।
विदेशों में देश के नाम का डंका बजना अच्छी और गर्व की बात है पर अपने देश में जो अल्पसंख्यक,दलित, आदिवासी कमज़ोर वर्ग के साथ अन्याय और जुल्म हो रहा है उसपर आँख मूंद लेना भी शर्मिंदगी की बात है। ऐसे मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू-थू करने से विश्वगुरु नही बना जाता है।
बाकी मज़हबज़-धर्म और आस्था के नाम पर होने वाली बर्बरता और हैवानियत भरी घटना दोबारा ना हो इसके लिए सोचे , इस तरह की घटनाओं से सामान्य नागरिक पिसते हैं, शर्मिन्दा होते हैं कि क्या कहें, क्या करें। गली-मौहल्लों कालोनियों ,बाजारों, बसों, ट्रेनों और स्कूलों में मासूमों को भुगतना पड़ता है। ये ना कोई धर्म है, ना मज़हब है और ना ही आस्था, ये केवल निरिह जिहालत है पागलपन है। ऐसे पागलों से दूरी बनाकर रहे। अपने हक और मुद्दों की लडाई लड़े। कथित धर्म और राजनीतिक ठेकेदारो के प्यादे बनकर आपका भला नही होगा। आखिर में बिस्मिल सईदी की यह पंक्तियाँ मुखिया के नाम.......
"क्या अहल-ऐ-जहाँ तुझको सितमगर नही कहते,
कहते तो है पर तेरे मुँह पर नही कहते।"
~कौसेन

Sunday, October 24, 2021

भेड़िये

उनके लिए तुम्हारी उम्र कोई मायने नही रखती तुम बूढ़ी हो जवान हो या फिर नादान बच्ची।

उम्र उनकी भी मायने नही रखती वो साठ के हो या सत्रह के।

कुछ मायने रखता है तो सिर्फ एक मौका, जो वो अक्सर ढूंढ ही लेते है, 

तुम भीड़ में हो, घर में हो या सड़क पर यह मायने नही रखता।
कुछ मायने रखता है तो सिर्फ तुम्हारा वहाँ होना जिसे वो ताड़ लेते है।

तुम चीखों, तडपो, गिड़गिड़ाओं या मदद मदद चिल्लाओ कोई मायने नही रखता।
कुछ मायने रखता है तो सिर्फ मुर्दा लाशों का वहाँ से गुजरना, जिसे वो जान लेते है।

कंक्रीट के इन जंगलों में वो भेड़िये आ बसे है, जो खुले आम घूमते है इंसानों की परवाह किये बिना, पर उनका इंसानों के बीच होना मायने नही रखता, मायने रखता है सिर्फ भेड़ियो के बीच इंसान का इंसान होना।

यह भीड़ जिनके हाथों में रोशनी की मसाले है, यह अख़बार जिनके पन्नो पर तुम्हारे दर्द की दस्ताने छपी है। यह लोग जो तुम्हें इंसाफ दिलाने के लिए लिख और बोल रहे है सब बे मायने, मायने रखता है तो सिर्फ इंसाफ, जो मुश्किल है।

Saturday, August 28, 2021

मेरे बचपन का स्वतंत्रता दिवस 🇮🇳🇮🇳


बचपन पैदल चलता है, हर कदम हर मौड़ पर गुजरती हर चीज़ को ध्यान से देखता है महसूस करता है और उसे खुलकर जीता भी है इसलिए शायद बचपन की यादें हमेशा दिमाग की तिजोरियों में महफूज़ रहती है। बात उन दिनों की है जब हर खुशी, त्यौहार केवल मोबाइल की सेल्फी या व्हाट्सएप- फ़ेकबुक के स्टेटस मात्र नही थे, तीज त्यौहार पर एक दूसरे को व्हाट्सएप पर मैसेज भेजकर नही बल्कि गले मिलकर मुबारकबाद दी जाती थी। उन दिनों में छब्बीस जनवरी और पन्द्रह अगस्त की ख़ुशी ईद या दीपावली जैसे त्योहारों की खुशी से कम नही  होती थी।

सफ़ेद आर्ट के पन्ने पर बड़ी नफ़ासत से एक दिन पहले RG के रंगों से तिरंगा बनाकर साफ-सुतरी लकड़ी पर आटे की लई से बडे सलीके से चिपकाया जाता था, हफ़्तों पहले कागज पर बड़ी मेहनत से आज़ादी के नारे लिख-लिखकर याद किये जाते थे और स्कूल की छुट्टी से पहले जोर-जोर से बोलकर उनकी प्रेक्टिस भी की जाती थी।

फिर आती थी वो सुबह जिसके इंतेज़ार में रात भर नींद नही आती आई थी......
नीला कुर्ता सफेद पाजामा (जिसे नील देकर मज़ीद चमकाया होता था।) और उनके नीचे लखानी या बाटा की बुरुश से मनज़ी हुई हवाई चप्पल और हाथ मे तिरंगा झण्डा लेकर जब घर से निकलते थे तो आँखों की चमक और दिल की धड़कन खुद ब खुद बढ़ जाती थी। 

सुबह स्कूल की प्रभातफेरी में चिल्ला-2 पूरे गाँव में आज़ादी के नारे लगाते हुए घूमते थे, स्कूल में वापस आकर ध्वजारोहण होता था और सब एक सुर में जन-गण-मन गाते थे। जन-गण-मन उन दिनों सभी के मुँह जुबानी याद रहता था कुछ चंद एक किताबों के पिछले कवर पर वन्देमातरम भी छपा रहता था जिसे पढ़ने से उन दिनों ना तो ईमान से ख़ारिज होने का डर था ना ही पढ़ने से देशभक्ति का कोई प्रमाण पत्र अलग से मिलता था।

स्कूल में छोटे- मोटे प्रोग्राम भी होते थे जिनमें नज्म, कौमी तराने और एक आद हँसी-मज़ाक का प्रोग्राम होता था। इन सबके बाद स्कूल के हेडमास्टर या कोई अन्य मोअज्जि मेहमान देश की आज़ादी के बारे में छोटा सा भाषण देते थे।

आख़िर में गुलाबी लिफाफे में मुट्ठी भर गुलदाना मिलता था जिसे थोड़ा सा चखकर बाक़ी पेंट या कुर्ते की जेब मे रखकर घर ले जाते थे। ~कौशेन🇮🇳

अगर दरिया में रहना है बहाना सीख मौजों से,

ख़स-ओ-ख़ाशाक की मानिंद बह जाने से क्या होगा।

इसी एहसास से पैदा हुई है फ़िक्र-ए-आजादी,

क़फ़स में इस तरह घुट घुट के मर जाने से क्या होगा।।

ख़स-ओ-ख़ाशाक-घास, फूँस
कसफ़-पिजरा

गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त

 
मेरा एक दोस्त है फिलीपींस से, ऑफिस में साथ काम करता है। ऑफिस के साथ-2 वो अपना साइड बिज़नेस भी करता है जिसके पार्सल अक्सर ऑफिस के पते पर ही डिलीवर होते है। कभी-२ अगर ऑफिस टाइम के बाद कोई डिलीवरी होती है तो, वो मुझे फ़ोन कर के रिसीव करने के लिए बोल देता है क्योंकि मेरा घर ऑफिस से चंद क़दमों की दूरी पर ही है।

हमारे ऑफिस की जुमे और बार (शनिवार) की छुट्टी रहती है तो आज भी उसने मुझे शाम में कॉल करके बोला था कि मेरी डिलीवरी आयेगी प्लीज़ रिसीव कर लेना।

रात के 10;30 बजे मुझे डिलीवरी बॉय की कॉल आई।

हेल्लो- जी कौन मैंने (टूटी फूटी अरबी में पूछा) सामने से अरबी में जवाब आया कि आपकी डिलीवरी है। साथ ही उसने एक दो सेंटेंस और अरबी में बोले जो मुझे समझ नही आये। तो मैंने इंग्लिश में पूछा कि आप कहाँ से हो ( इजिप्ट, यमन, इंडिया या पाकिस्तान) उसे जवाब दिया कि मैं कश्मीर से हूँ  फिर हमनें हिंदी या समझ ले उर्दू में बात की, उसने कहा कि आप दो मिनट में बाहर आकर पार्सल रिसीव कर ले।
मैंने उसे अपने घर की लोकेशन भेजी क्योंकि उसके पास ऑफिस वाली लोकेशन थी और दरवाजे पर जाकर उसका इंतेज़ार करने लगा। लगभग मुश्किल से एक मिनट के बाद ही  उसने मेरे करीब आकर कार रोकी, पिछली सीट से एक बॉक्स उठाकर मुझे दिया और फोन नंबर कन्फर्म करके जाने लगा।
मैंने पानी की बोतल जो में उसके लिए लाया था उसे दी। 
उसने दो घूट पानी के पिये मेरा शुक्रिया अदा किया और फिर से जाने लगा।
मैंने उसे रोकते हुए कहा.. भाई अगर बुरा ना मानो तो एक बात पूछूँ?
जी बोलिये.. उसने कहाँ।
आपसे जब मैंने आपकी नशनल्टी के बारे में पूछा तो आपने कश्मीर बताया आप इंडिया या पाकिस्तान भी कह सकते थे?

"दोस्त ना तो इंडिया हमें अपना समझता है और ना ही पाकिस्तान, दोनों मुल्कों ने हमें सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा समझा हुआ है हमें तो यह दोनों मुल्क इंसान ही नही समझते है, बस अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से हमारा इस्तेमाल करते है। इसलिए मैं सिर्फ कश्मीर का हूँ।"
  
कश्मीर के बारे में कहा जाता है कि “गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त/ हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त” (धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं).
#कौशेन

Sunday, September 1, 2019

खुशनसीब है जिन्हे टिकटोक और पब जी के ज़माने में जवानी जीने का मौका मिल रहा है





क्या आप पता है की ......

१-अर्जेंटीना और भारत की अर्थव्यवस्था की तुलना क्यों की जा रही है?

२- मदन मल्लिक कौन है?

३- मौहम्मद अलीम सैय्यद कौन है ?

४ - अगर आप उपरोक्त सवालों के जवाब नहीं जानतें  तो मुबारक हो आप सच्चे देशभक्त भारतीय हो।



 पिछले दिनों हम सबने सुना है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने एक लाख 76 हज़ार करोड़ भारत सरकार को देने का फैसला किया है जिसपर हम सबने नोटबंदी की तरह ही बड़े मज़ेदार जोक्स भी शेयर किये है। ख़ैर तो मैं ऊपर पूछे गए सवालो की बात करता हूँ।

१ - दरअसल, अर्जेंटीना की सरकार ने अपने सेंट्रल बैंक को फंड देने के लिए मजबूर किया था.
ये साल 2010 की बात है. अर्जेंटीना की सरकार ने सेंट्रल बैंक के तत्कालीन चीफ़ को बाहर कर बैंक के रिज़र्व फंड का इस्तेमाल अपना क़र्ज़ चुकाने के लिए किया था.
अब भारत सरकार के रिज़र्व बैंक से फ़ंड लेने की तुलना अर्जेंटीना के अपने सेंट्रल बैंक से फंड लेने से की जा रही है.
अर्जेंटीना लातिन अमरीका की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. लेकिन आज अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था बेहद ख़राब दौर में है।  विश्लेषक मानते हैं कि अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने की शुरुआत तब ही हो गई थी जब सेंट्रल बैंक से ज़बर्दस्ती पैसा लिया गया था। भारत और अर्जेंटीना के घटनाक्रम में फ़र्क ये है कि अर्जेंटीना की सरकार ने आदेश पारित कर सेंट्रल बैंक से पैसा लिया जबकि भारतीय रिज़र्व बैंक ने विमल जालान समिति की सिफ़ारिश पर सरकार को पैसा दिया। अब अर्जेंटीना लगातार जटिल हो रहे आर्थिक संकट में फंस गया है जिससे बाहर निकलने का रास्ता नज़र नहीं आ रहा है।  क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने देश के दीवालिया होने का अंदेशा ज़ाहिर कर दिया है।

भारतीय रुपया डॉलर के मुक़ाबले लगातार टूट रहा है. बेरोज़गारी दर बीते 45 सालों में सर्वोच्च स्तर पर है. जीडीपी की दर सात सालों में सबसे कम होकर सिर्फ़ पांच प्रतिशत रह गई है. अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेत स्पष्ट नज़र आ रहे हैं। सरकार के सहयोगी ही इन दावों पर सवाल उठा रहे हैं.

Saturday, December 29, 2018

दुःख और ख़ुशी

दुःख और ख़ुशी

सब कहते है खुश रहा करो, अपने मन मस्तिष्क को सकारात्मक विचारों से भरो।

करो ख़ुद ही मंथन दुःख का खुशी का, जो इनसे पार पा गया अमर हो गया जीवन उसी का है।

किया मैंने गहन आत्ममंथन, सोचा जीवन में दुःख और ख़ुशी का क्या है बन्धन?

पहला प्रश्न जो मैंने खुद से किया, ख़ुशी है क्या?

सकुचाये से मन ने यह लंबा सा उत्तर दिया।

खुशी है दुःखों की दवा या गम की आँधी में कहीं से आया

रंगीन दुपट्टा जो किसी की उतरन है।

या वो किलकारी जो नौ महीने बाद माँ के

कानों में पड़ती है और क्षण भर में 'लड़की

है' जैसे शब्दों में फिर से दफ़न हो जाती है।

या वो प्रेम जो अपनी सीमाओं को लांघ कर

अस्पताल के पीछे नाले में बह जाता है।

या वो सम्मान जो ताबूतों में बंद कर दिया जाता है,

जात-पात के ताले लगाकर।

या वो चमक जो पिचके हुए जर्जर शरीर के सहारे, बेजान आँखों से,

टकटकी लगायें शीशे की दीवार के उस पार रखी रोटी को तकते हुए आंखों में आ जाती है।

या दुल्हन के जोड़े में सजी बेटी की झोली में भरे अरमान,

या उसी दुल्हन को दहेज के लोभ में आग लगाने वालों की

लालच भरी सोच जिसमें भरा है निर्दोष सिद्ध होने का सन्तोष।

इससे आगे मेरा मन उखड़ गया गुस्से से बोला, इसके अलावा कोई और प्रश्न हो तो बोलो, मुझकों ख़ुद के विचारों की तराजू में मत तोलो।

अच्छा दुःख क्या है? बस इतना और बता दो,

तुम ज्ञानी हो तो बिना रुके इसका भी उत्तर दो?

मन ने मुझकों अजीब सी नज़रो से देखा,

नादान!

दुःख और खुशी के बीच है बस एक महीन रेखा।

और बोला दुःख है...

वृद्धाश्रम में लेटी हुई उस माँ की प्रसव पीड़ा जिसकी साँसों की डोर अटकी है किसी अपने के आने की झूठी आस में ।

या सड़कों पर इंसानी भेड़ियों के पंजों में तड़पती किसी निर्भया की चीख,

या मारो-मारो के शोर के साथ अपने हाथों से इंसाफ करती कथित भीड़,

या अन्नदाता का अन्न के लिए तडपकर मर जाना।

या सत्ता के घमंड में जनता की त्राहि-त्राहि पर ठहाके लगाना।

या सीमा पर राष्ट्र की रक्षा करते-करते ठंड से सिकुड जाना।

या इंजीनियर की डिग्री लेकर चपरासी की जॉब के लिए लाइन में लग जाना।

और भी कई रंग है दुःख और खुशी के इस दुनिया में, पर बहुत मुश्किल है सब को एक साथ कह पाना।

इतना कहकर मन मौन हो गया, मेरे विचारों में जैसे कहीं वो खो गया।

और मैं आज भी अटका हूँ उस महीन सी रेखा के सहारे,

जिसे लांघकर जीवन, दुखों को खुशी के पार उतारे।

Saturday, September 1, 2018

खुशी और दुःख

खुशी क्या है?
दुःख की दवा
या गम की आँधी में कहीं से आया
रंगीन दुपट्टा जो किसी की उतरन है।
या वो किलकारी जो नौ महीने बाद माँ के
कानों में पड़ती है और क्षण भर में 'लड़की है' जैसे शब्दों में फिर से दफ़न हो जाती है।
या वो प्रेम जो अपनी सीमाओं को लांघ कर अस्पताल के पीछे नाले में बह जाता है।
या वो सम्मान जो ताबूतों में बंद कर दिया जाता है जात-पात के ताले लगाकर।
खुशी क्या है?
दुल्हन के जोड़े में सजी बेटी की झोली में भरे अरमान
या दहेज़ की सूली पर झूलती लक्ष्मी।
और दुःख क्या है?
माँ की प्रसव पीड़ा या वृद्धाश्रम में साँसों की डोर से
अटकी झूठी आस।
बस दुःख तो इतना भर ही है इस संसार मे
पर खुशी के ओर भी कई रंग है।
#मुसाफ़िर @Mohdkausen

Tuesday, August 22, 2017

"अगर तुम मर ही जाते तो कम से कम ये शुकून तो रहता कि कोई करने वाला नही भीख ही मांग लेते । पर तेरे होते हुए तो कोई भीख भी नही देता। कहते है कि इसका तो हट्टा कट्टा शौहर जिन्दा है। इन बच्चो को संभालूँ , लोगो के घरो में बर्तन मांजू  ? या जिन से उधार लिया है उनकी की गालियाँ और गन्दी नज़र बर्दास्त करूँ।" हमेशा की तरह वो रो पीट रही थी। और उसका शौहर आराम से बीड़ी फूंक रहा था। उस पर बीवी की बातो का कोई असर ही नही हो रहा था। या शायद अब उसे ऐसे ताने सुनने की आदत थी। "अरे. . . . . . . जब बेटा........ इतना........ निकम्मा, नकारा था तो इसकी शादी क्यों की. . . . . . . . क्या शौंक चढ़ा था ऐसे निठल्ले के सर पर सेहरा सजाने का।" राशिद पर अपनी बातो का असर होता न देख अब रुखसाना ने दांत भींच -२ कर सास की तरफ गोले दागने शुरू कर दिए। पर उसकी सास ताहिरा बेगम एक नेक और समझदार खातून थी हमेशा की तरह शर्म से गर्दन झुका कर चुप रही। ( जो की सास बहू के मसले में एक अजीब बात है। )

पूरा घर राशिद के निकम्मेपन और आवारागर्दी से परेशान था। बूढ़ा बाप दिन रात बिजली के कारखाने में काम करता और जवान बेटा सड़को पर आवारागर्दी। छोटा परिवार था।  इसलिए दो वक़्त की रोटी नसीब हो रही थी, वरना ऐसे महंगाई के जमाने में कहाँ गुजारा होता है। दो बहन-भाई और माँ-बाप बस चार लोग थे परिवार में। जमील मियां ने काफी कोशिश की बेटा कुछ पढ़ लिख जाये। पर अकेला होने की वज़ह से घर पर मिले ज्यादा लाड प्यार और उसकी आवारा सोहबत ने उसे कहीं का नही छोड़ा। घर से स्कूल का कहकर निकलता और सारा दिन आवारा दोस्तों के साथ मटरगस्ती करता, यहाँ-वहाँ घूमता। बाप सारा दिन ड्यूटी पर रहता डर किसी का था नही, इसीलिए दिन पर दिन बिगड़ता चला गया। गली मोहल्ले से रोज़ शिकायते आने लगी कभी किसी के साथ मारपीट और कभी किसी के साथ गाली गलोच। रोज़ रोज़ की शिकायतों से तंग आकर जब बाप ने डांट पिलाई कि "राशिद देख या तो ये आवारागर्दी छोड़ दे वरना कहीं का नही छोड़ेगी ये तुझे। पढाई पर ध्यान लगा " तो तिडक कर बोला।  "मुझे...... नही पढ़ना  है। मुझे पढाई समझ नही आती... । मुझे काम...  करना है "
"बेटा पढ़ लिख जायेगा तो तेरे ही काम आएगा। और आजकल तो हर काम में पढाई की जरूरत पड़ती है "
माँ ने भी प्यार से समझाया। पर पत्थर दिमाग पर जोंक न लगी। थक हार कर जुम्मन चाचा की फर्नीचर की दुकान पर ये सोच कर छोड़ दिया के पढ़ा नही है। कम से कम हाथ का दस्तकार ही हो जायेगा तो जिंदगी में भूखा नही मरेगा।

पर आवारा तबियत राशिद यहाँ भी नही टिक सका। दो तीन महीने काम करके जुम्मन चाचा को भी टाटा बाय-बाय कर दिया। बूढ़े बाप ने जैसे तैसे करके बेटी के तो हाथ पीले कर दिए। पर नालायक बेटे को लाइन पर न ला सके। आस-पडोस, यार-रिश्तेदार सब ने ये ही सलाह दी। कि  शादी कर दो खूंटे से बंधेगा तो खुद-बर-खुद लाइन पर आ जायेगा। बूढ़े कंधो ने सोचा, ठीक है शादी तो करनी ही है। हो सकता है के दुल्हन का मुंह देख कर ही कुछ अक्ल आ जाये। और इस तरह रुखसाना दुल्हन बनकर इस आवारा के पल्ले बंध गयी।

नयी दुल्हन घर में आई तो खर्चे भी बढ़ गए। कुछ दिनों तक तो सब ठीक चला । पर बूढी कमाई,जवान बहू के खर्चे कहाँ तक बर्दास्त करती। बहू के ताने सास के कानो तक जाने लगे। घर के बिगड़ते हालात को देखकर माँ ने बेटे को खूब समझाया  "देख अब कुछ काम धंधा शुरू कर दे। मजदूरी ही करने लग,बहू भी आ गई है कब तक तेरे अब्बू अकेले पूरे घर का खर्च उठाते रहेंगे। अब बहुत हुआ संभल जा बेटा ।"  पता नही माँ की नसीहत का असर था या बीवी के खर्चो का ,अक्ल में कुछ बात आई और मजदूरी करने लगा। पर वो कहावत है ना कि चोर चोरी छोड़ देता है पर हेरा-फेरी नही छोड़ता। राशिद पर एक दम सही बैठती है। अब काम तो करता पर अगर दो दिन काम करता तो तीन दिन पड़कर खाता। ऊपर से हर साल बढ़ते परिवार से हालात और ख़राब हो गए। बहू हर वक़त सास को ताने देती। पर ताहिरा बेगम अपनी किस्मत समझ कर चुप रहती। वैसे भी माँ बाप जन्म के साथी होते है कर्म के नही। समझा-समझा कर थक गए। पर राशिद पर कोई फर्क नही पड़ता।

जब तक बाप का साया सर पर था। घर की गाडी किसी तरह चलती रही, पर उनके इंतकाल के बाद हालात बद से बत्तर होते गए। कभी कभी तो फाको की नौबत आजाती। रोज़ रोज़ के झगडे बढ़ने लगे। रुखसाना सास को कोसती, मायके जाने की धमकी देती। इधर बेटा अपने निकम्मेपन से बाज नही आता और इन दोनों के बीच में बूढी ताहिरा बेगम घुन की तरह पिस रही थी। ऊपर से भूखे पोता-पोती, अपनी भूख तो कैसे भी दबा लेती। पर दादी पर छोटे छोटे बच्चो का तड़पना नही देखा जाता। सच ही कहा किसी ने कि मूल से ज्यादा सूद प्यारा हो जाता है। इसीलिए ताहिरा बेगम ने बच्चो की भूख मिटाने के लिए आस-पड़ोस से काफी क़र्ज़ ले लिया था। जो वक़्त पर चुका न सकी और कर्ज़े वाले अब रोज़ आकर खरी खोटी सुना देते। बूढी आँखे शर्म से गर्दन झुकाकर उनसे ना जाने किस उम्मीद पर कल परसो के वादे कर लेती। और हर बार वादा खिलाफी पर नयी ज़लालत और नए वादे । पर नालायक बेटे पर कोई फ़र्क़ नही पड़ा।

और फिर अचानक सब कुछ बदल गया। घर के आँगन में हमेशा ठंडा पड़ा रहने वाला चूल्हा आग से दहकने लगा। पहले हर वक्त भूख से रोने बिलखने वाले बच्चे अब अपनी मस्ती में खेलने लगे। रुखसाना के चीखने चिल्लाने की जगह अब निकम्मे और नकारा राशिद की गन्दी गन्दी गालियों की आवाज आने लगी। "तू...बदचलन है, तू ... बाज़ारू औरत है रुखसाना ..." और रुखसाना आराम से घर के कामो में लगी रहती। उस पर शौहर की बातो का कोई असर नही होता। या शायद अब उसे ऐसे ताने सुनने की आदत थी। कर्ज़े वालो की गन्दी गालियाँ भी अब मुस्कुराहटों में बदल गई थी। बस एक चीज़ अब भी नही बदली थी। और वो थी बूढी ताहिरा बेगम की शर्म से झुकी गर्दन ।


Monday, August 21, 2017

मैं अधूरा इश्क़

तुम तितली सी फुदको, मैं भौंरे सा मंडराऊँ,
तुम बसन्त सी महको मैं पतझड़ सा बिखर जाऊँ।
तुम गंगा सी पावन मैं झरना कोई आवारा सा,
तुम सुबह की पहली किरण, मैं ढलते सूरज का कोई किनारा सा।
तुम कोई ज्ञानी आत्मा, मैं दुर्बल शरीर,
तुम धरा सी दानी, मैं कोई मलंग फ़कीर।
मैं कतरा कतरा सा, तुम सागर की अल्हड़ लहर,
मैं जेठ की तपती दोपहरी सा, तुम सुबह की पहली पहर।
तुम पूजा की थाली सी, मस्जिद की अजानों सी,
मीर की ग़ज़लों सी, मंटो के अफसानों सी।
मैं किसी मंदिर की सीढ़ी सा, मस्जिद के चौबारे सा,
राँझें की परछाई सा मजनूं के दुआरे सा।
तुम सच्ची कसम, किस्मत की लकीरों सी
कृष्ण की मुरली सी मीठी, तान कोई मंजीरों सी।
मैं अधूरा इश्क़, किताबो में रखें सूखे इरादों सा।
खतों की झूठी तहरीरों सा,सा जन्मों के बचकाने वादों सा।



Wednesday, May 31, 2017

दाग़



 "चल मीना अब तेरा नंबर है अच्छे से नाप देना।" सपना ने पास खड़ी मीना को हाथ से खींच कर दर्ज़ी के सामने खड़े करते हुए कहा। "और हाँ चाचा इसका नाप थोड़ा टाइट रखना।" ठीक है बेटा दर्ज़ी चाचा ने अपनी ऐनक सही करते हुए कहा।
"पर दीदी टाइट चोली में दम घुटता है।" मीना ने मिनमिनाते हुए कहा। "ठीक है चाचा टाइट चोली में इसका दम घुटता तो एक काम करना चोली पीछे से पूरी खुली रखना मेडम को सांस आती रहेगी।" उसने ठहाका लगाते हुए कहा।
"क्या दीदी आप भी हर बख्त मज़ाक करती रहती है।"
"ऐ बस कर हरामखोर इतने सालो से पालपोस कर तुझे बड़ा किया है अब दो पैसे कमाने का वक़्त आया, तो तेरा दम घुटने लगा। चुपकर निगोड़ी कही की।" सपना ने गुस्से से दाँत पीसते हुए कहा।
"देख मीना अगले हफ्ते एक मोटी असामी आ रही है। तेरी नत उतारी की रस्म करने, इसलिए मुझे कुछ कमी नही चाहिए समझी।"
"पर दीदी पिछले महीने ही तो नत उतारी हुई थी मेरी,पेट में अब-तक दर्द है।" मीना ने पेट पर हाथ लगाकर कहा।
"अरे मेरी भोली ये बात हमे ही तो पता है।" सपना ने उँगलियों से उसके गाल खींचते हुए कहा।
"चाचा एक काम और करना लहंगा ऐसे सिलना की नाभि से कम से कम 5 इंच नीचे बंधे हाय आधे ग्राहक तो तेरे पेट पर ही टाँय टाँय फिस्स हो जायेंगे।" दोनों हाथों से बलाये लेते हुए सपना फूली न समायी।
"दीदी आप भी न।" मीना ने शरमाते हुए नज़र झुका ली।
"चल छिलनाल शर्माना भी नही आता। सपना ने मीना के बनावटी शर्म के नाटक पर तुनक कर कहा।"
"हा..हा " मीना ने ठहाका लगाया।
चल जल्दी से निपट के नीचे आजा सपने ने सीढ़िया उतरते हुए कहा।

ये छोटी सी झलक थी फूलपुर की उन बदनाम गलियों की जहाँ की रानी सपना है। इन बदनाम गलियों में बड़े बड़े नवाब जादे अपनी नवाबी लुटा गए। वैसे अब नवाब तो रहे नही पर मर्द तो आज भी बाकि है। जो ख़ूब धड़ल्ले से अपनी हवस का बोझ इन गलियों की चौखट पर उतारने आते है। पर असल मे ये कहानी इन गलियों की नही है। ये कहानी है फूलपुर के चौधरी साहब की जिनके बेटे की शादी है। तो आइये चलते है शादी वाले घर की चौखट पर।

"अरे सत्तू चौबारे को सही से पुतवा दियो दीवारों पर इस्तिहार वालो ने न जाने क्या क्या लिखा दिया है।"
"अरे भौजाई घबराये नाही हम सब सँभाल लेंगे।" सत्तू ने दृढ़ता के साथ कहा।

"न जाने सारे हक़ीम डॉक्टर चार दिन में मर्दानगी बढ़ाने का ही इश्तहार क्यों करते है। कोई कमबख्त इंसानियत भी बढाये भले ही चार महीने लग जाये।" बड़ी चौधराइन दीवार पर लिखे इश्तहार पढ़कर बड़बड़ाते हुए चली गई।

"देखो पेंटर बाबु हमरे बिटवा की शादी है। कोनो कसर बाकी न रहे। अइसन पेंट करो की दीवारों की सारी कालक सफेदी में बदल जाये। सत्तू ने रंग वाले के कंधे पर हाथ रखकर दीवारों पर लिखे इस्तेहार पढ़ते हुए कहा।
"चार दिनों में मर्दाना ताकत बढाइये।
शर्तिया लड़का ही होगा।
शादी से घबराना क्या। समस्त रोगों का इक इलाज़
मिले डॉ. सम्राट गुपत रोग विशेषयज्ञ लाल चौक बस अड्डे के बराबर में फूलपुर,
"हे ससुरे का नाती शादी से कौउन घबराता है।" सत्तू ने बड़बड़ाते हुए कहा।
"पेंटर बाबु ये सब साफ़ चाहिए हम का ठीक से।" रंग वाले को हिदायत देते हुए आगे बढ़ गए सत्तू।
ये चौधरी साहब के छोटे भाई है सुजान सिंह उर्फ सत्तू सुना है इनकी बीवी शादी के दस दिन बाद ही इन्हें छोड़कर भाग गई थी। खैर.....

सामने चौधरी दिलवार सिंह का दरबार सजा है। यहाँ बैठ कर चौधरी साहब सारा दिन चिलम पीते रहते है और गरीबो की किस्मत अपने रजिस्टर में लिखते रहते है। बियाज़ पर पैसे देते है ना, छोटे किसानों और मज़दूरों को। जिसने बख्त में दे दिया ठीक नही तो भईया। चौधरी साहब प्राण भी ले लेते है।
चौधरी साहब की दो बीवी है एक जो अभी आप को गेट पर मिली यानी बड़ी चौधराइन दुर्गा रानी और दूसरी छोटी  चौधराइन कमलेश देवी। बड़ी चौधराइन से चौधरी साहब की शादी की रात से ही नही बनी, न जाने एक रात में ऐसा क्या हुआ कि चौधरी साहब का दिल दुर्गा देवी से ऐसा खट्टा हुआ कि तीन महीने बाद ही दूसरी शादी कर ली। पहले तो दुर्गा को छोड़ने का मन था पर दहेज़ में मिली 30 एकड़ जमीन और एक एम्बेसडर कार ने चौधरी को फ़ैसला बदलने पर मजबूर कर दिया। पर ईश्वर की करनी देखिये चौधरी साहब के यहाँ एक ही लड़का है और वो भी बड़ी चौधराइन दुर्गा रानी की कोख से। और बाकी 3 लडकियाँ है जो छोटी चौधराइन से है।

तो भैय्या चौधरी साहब के इकलौते बेटे की शादी है। दहेज़ से लेकर दुल्हन तक सब बहुत सोच समझकर चुनी है चौधरी साहब ने। दुल्हन मीठापुर के सांसद चौधरी ओम सिंह की एक लौती कन्या है। एक साथ दो निशाने साधे है चौधरी ने अपने निकम्मे आवारा बेटे के लिए एक तो आने वाले विधान सभा मे अपनी उम्मीदवारी पक्की कर ली दूसरे दहेज़ के रूप में इकलौती होने की वजह से सारा कुछ बेटे को ही मिलना है। इसीलिए चौधरी साहब आजकल हवाओ में उड़ रहे है।

और ये है दूल्ह राजा श्रीमान बहादुर सिंह जी 24 घण्टे अपनी मस्ती में मस्त, जिधर से भी निकलते है औरतो को अपना पल्लू बचाना भारी हो जाता है। हर वक़्त अय्यासी और दादागिरी इनका शौक़ है। बड़ी चौधराइन ने बहुत चाहा कि बेटा किसी तरह पढ़ लिख जाए पर चौधरी साहब से मिली बेपनाह छूट के सामने उनकी एक न चली ।
"ओये बिरजू ज़रा सपना को फोन तो लगा माल तैयार है या नही ।" बहादुर  सिंह ने अपने लपाटी दोस्त को नशे में झूमते हुए कहा।

"अभी पूछता हूँ भाई जी"
"हेलो सपना रानी बिरजू बोलूं हूँ। छोटे चौधरी साहब का खास सुनो आज भाई का मूड है माल तो तैयार है जैसा बोला था।"
"भाई सपना ने नमस्ते कही है थारे से और बोली है कि मामला पूरा सेट है।" बिरजू ने आंख दबाते हुए कहा।

"ठीक है तो फेर आज की शाम सपना डार्लिंग के नाम।" छोटे चौधरी ने हिचकी ली।

"कोई कही नही जायेगा। बहादुर  बहुत हुई तुम्हारी ये आवारा गर्दी अब तेरी शादी है कुछ अक्ल और होश की दवा कर समझा।" बड़ी चौधराइन जाने कब वहां आ गई थी और उसने उनकी बातें सुन ली थी।

"ओये मेरी माते रानी ये ही तो दिन है मेरे खेलने खाने के अब मस्ती नही करूँगा तो कब करूँगा, फिर तो बापू की तरह सारा दिन बहीखातों में ही बीतने है।" बहादुर  सिंह ने नशे में झूमते हुए कहा।
"शादी के दो दिन बचे है और तू नशे में धुत इन निकम्मे दोस्तो के साथ अय्याशियों के प्लान बना रहा है। शर्म कर शर्म।" चौधराइन ने शराब की बोतल को ठोकर मरते हुए कहा।

"शर्म, कैसी शर्म,मर्द है हम मर्द, शर्म औरतो के पास मिलती है यहाँ सिर्फ मर्दानगी और ज़िगर मिलता है माता।" बहादुर सिंह ने नशे में लड़खड़ाते हुए अपनी छाती पीटते हुए कहा।

"तेरे जैसे पूत से तो में कुपूत ही रह लेती ना जाने कौन से कर्मो का फल मेरे सामने आ रहा है। सारी उम्र इस उम्मीद पर जीती रही कि तू अपने बाप के जैसा नही बनेगा पर हाई री मेरी किस्मत एक अंडा और वो भी गंदा निकला।" चौधराइन अपने नसीब को कोसते हुए कमरे से बहार निकल गई।
कितनी मुसीबतों से इस घर में खुद को संभाला था दुर्गा रानी ने एक तो पति के होते हुए भी कभी सुहागन सा सुख ना भोग पायी थी। दूसरा पूरे घर का बोझ भार बस एक इस उम्मीद पर संभाल रखा था। कि बेटा बड़ा होगा तो उसके भी दिन बदलेंगे। वरना दिलावर सिंह ने क्या कुछ ज़ुल्म नही किये थे उसके साथ। दूसरी शादी से पहले हर रोज़ उसी के सामने बाज़ारू औरतो के साथ मुंह काला करता। दोस्तो की महफ़िलो में उससे जाम पे जाम बनवाता। कभी गुस्से में पीटता तो कभी घर के नौकरो के सामने गाली देता और ज़लील करता। वैसे तो बेटे से दुर्गा को कुछ खास उम्मीद नही थी मगर फिर भी उसे लगता था कि शादी के बाद शायद कुछ बदल जाये। पर आज की बातों से उसकी वो उम्मीद भी जाती रही।

शाम थोड़ी सी जवान क्या होती सपना के घर की तरफ जाने वाली बदनाम पगडंडियों पर मर्दानगी का खुमार चढ़ने लागता। छोटे चौधरी हो या बड़े चौधरी सब सपना के खासम खास थे। आज छोटे चौधरी की फ़रमाइश पर सपना ने खास तैयारी की थी। मीना जो अभी अभी जवान हुई थी या सपना की जुबान में कहे तो मार्कीट में बिल्कुल जीरो मीटर थी। खास आज छोटे चौधरी के लिये तैयार थी। वैसे तो पिछले महीने ही मीना की नत उतारी हो चुकी थी पर सपना नए पैकिट में पुराने माल को बेचने का हुनर बख़ूबी जानती है।

"आइये आइये सरकार नाचीज़ के गरीब खाने पेे स्वागत है।" सपना ने बहादुर  सिंह को देखते ही जोरो-खरोश से स्वागत किया।
"वो सब तो ठीक है पर हमारा माल रेडी है या नही?" चौधरी ने अपनी हवस भारी आवाज़ में सपना को अनदेखा करते हुए कहा।
"उफ्फ मेरे सरकार जरा दम तो ले। ऐसा पटाखा लाई हूँ आप के लिए की तमाम उम्र याद राखोंगे एक दम जीरो मीटर है।" सपना ने अपने अंदाज में आंखे मटकाते हुए कहा।
"फिर तो तुम इनाम की हक़दार हो सपना।" और चौधरी ने जेब से करारे नोटो की गड्डी निकाल कर सपना की तरफ उछाल दी।
"आप अपने खास कमरे में तशरीफ़ ले चलिये मैं अभी आप की अमानत भेजती हूँ।" सपना ने गेंदे के फूलों से सजे एक कमरे की तरफ इशारा करते हुए कहा।
कमरे में एक पलंग पर सफेद चादर बिछी थी। अगरबत्ती के धुंए से तर कमरा गेंदे के फूलों की अजीब गन्ध से महक रहा था।
सपना झट से दूसरे कमरे में गई और मीना को कुछ खास हिदायत देते हुए बोली देख कमरे की लाइट बंद रखना और जैसा बोले ठीक वैसा ही करना समझी और थोड़ा जोर जोर से चिल्लाना। और हाँ ये ले सपना ने एक कांच की शीशी मीना की तरफ बढ़ते हुए कहा।
"ये क्या है ? मीना ने पूछा।
सपना ने मुँह मीना के कान के पास ले जाकर धीरे से फुसफुसाया इसमें आज जो मुर्गा फ्राई करके तुझे खिलाया है ना उसका खून है। चुपके से चादर पर गिरा देना। ताकि तेरा जीरो मीटर और चौधरी की मर्दानगी दोनों का भरम बना रहे। और हाँ बाद में लाइट जलाना मत भूलना आख़िर चौधरी को सफेद चादर पर दाग नज़र भी तो आना चाहिये। सपना ने ठहाका लगाया।

बड़ी धूमधाम से चौधरी की चौखट से सजी धजी बारात बैंड बाजो की धुन के साथ निकली । चौधरी दिलावर सिंह ने दिलखोल कर ख़र्च किया था आखिर इकलौता बेटा जो था बहादुर  सिंह उनका ऊपर से सिमधी भी पैसे वाला तो जो भी खर्च कर रहे थे वो सब सूद समेत आने वाला था। बहादुर  सिंह अपने पिस्टल से और चौधरी साहब अपनी दो नली पुस्तैनी बंदूक से हवा में धायं धायं गोलिया दाग रहे थे। बारात की आन बान देखते ही बन रही थी। ऐसे ही नाचते गाते बारात दुल्हन के दरवाजे तक पहुंच गई। बड़ी धूमधाम से स्वागत हुआ चौधरी साहब के सिमधि ने कोई कोर कसर बाकी नही छोड़ी थी। ख़ूबखातिर दारी हुई। जय माला और फेरो के बाद आखिर बिदाई का बख्त भी आ गया । चौधरी ओम सिंह ने दहेज़ में दी गाड़ी की चाबी चौधरी दिलावर सिंह को देते हुए कहाँ। "देख चौधरी मुझे दामाद के सारे लच्छन पता है। पर मैंने फिर भी अपनी बेटी खुशी खुशी बियाह दी पर अब ध्यान रहे । मेरी बेटी को कोई कष्ट ना हो। वैसे मैं समझ सकता हूँ। जवानी में नादानी हमने भी की है पर अब दामाद को मैं खुद का उत्तराधिकारी समझ रहा हूँ। और विधान सभा चुनाव सर पर है तो कोई ऐसी हरकत ना हो जिस से हमारी साख पर आंच आये।"
अरे ओम सिंह जी ऐसी शुभ घड़ी में आप भी कैसी बाते लेकर बैठ गए। बेफिक्र रहिये आप की बेटी अब हमारी बेटी है। और रही बहादुर  की बात उसे मुझ पर छोड़ दीजिए। ये कहकर दिलावर सिंह ने ओम सिंह को गले लगा लिया।

नई दुल्हन की डोली चौधरी दिलवार की चौखट पर पहुंच गई। बड़ी धूमधाम से मंगल गीतों के साथ दुल्हन का स्वागत हुआ। दुल्हन क्या चाँद का टुकड़ा थी जिसने भी देखा देखता ही राह गया। बड़ी चौधराइन फूली न समाती बेटा भले ही कितना नकारा था पर सास बनने की खुशी तो अपनी जगह है। छोटी चौधराइन ने मुहँ दिखाई में सोने के कंगन पहनाये तो सबने बड़ी प्रसंशा की
"सौतेली होते हुए भी इतना प्यार बड़े दिल वाली है छोटी चौधराइन।"
उधर नई दुल्हन की मुँह दिखाई चल रही थी और यहाँ चौधरी बहादुर  सिंह की चाण्डाल चौकड़ी जमी हुई थी।

"भैय्या असली मर्दानगी दिखाने का बख्त तो आज आया है।" एक ने शराब गटकते हुए कहा।
"तेरा भाई मर्द है मर्द, तुझे कोई शक है क्या? छोटे चौधरी ने गर्व से सीना फुला कर पूछा।
"भैया जी शक तो कोई न पर नारी के सामने अच्छे अच्छे मर्द पानी भरते देखे है हमने और भाभी तो वैसे भी सुना है बी.ए. पास है।" दोस्तो ने ठहाका लगाया।
"अबे चल साले चौधरी बहादुर  सिंह उनमे से नही जो बीवी के गुलाम होते है।"
"अच्छा भैया भाभी कॉलेज पढ़ी है ज़रा चेक कर लियो कही सेकेण्ड हैंड माल न निकले।" और जोर से ठहाका गूंजा।

खूबसूरत लाइट से सजे और फूलो से महकते कमरे में अपने लड़खड़ाते कदमो के साथ बहादुर  सिंह दाखिल हुआ। सामने बेड पर लंबा सा घूंघट निकाले उसकी नई दुल्हन अनीता बैठी थी। ये पर्दा हटा दो ये..य...य मुखड़ा दिखा दो बहादुर  सिंह ने नशे में झूमते हुए अपनी बेसुरी आवाज़ में गाना गाया। और झट से दुल्हन के सर से दुपट्टा उतार कर दूर फैंक दिया। अनीता ने सकपका कर खुद को घुटनों में समेट लिया। बहादुर  सिंह ने ठहाका लगाया। "रे डर गई क्या तू हमरी पत्नी है और हम तुम्हारे पति परमेश्वर।" इतना कहकर बहादुर  सिंह ने लाइट का स्विच ऑफ कर दिया।

सुबह सारी हवेली में तहलका मच गया। बहादुर  सिंह को दुल्हन पसन्द नही आई थी और वो उसे छोड़ने की जिद्द पर अड़ गया। "रे बुलाओ इसके बाप नु ससुरे ने नए पैकिट में सेकंड हैंड माल थमा दिया।" बहादुर  सिंह एक हाथ मे शराब की बोतल और दूसरे में रिवाल्वर लहराता हुआ चिल्ला रहा था। किसी की समझ मे कुछ नही आ रहा था कि बात क्या है।

"रे शांत हो जा बात तो बता क्या हुई क्यों नशे में अनाप शनाप बोले है। सत्तू ने बहादुर  के पास जाकर कहा।"
"चाचा हमारे मथ्थे सेकंड हैंड माल मढ़ दिया है। छोरी खेली खाई है। कॉलेज से पढ़ी है जाने कितने यारो के साथ मुँह काला किया है। कुलटा ने" बहादुर  सिंह ने बदहवासी में अपना सिर पीटते हुए कहा।
"रे बावले चुप हो जा ज्यादा चढ़ गई है तुझे। किसी ने तेरे कान भर दिए। भैय्या को पता चल गया तो कयामत आ जायेगी " सत्तू ने बहादुर  सिंह को समझाते हुए कहा।
"बापू ने ही अपनी विधायकी के चक्कर मे ये किया है। और हमे किसी ने नही बहकाया खुद अपनी आंखों से देखा है यकीन ना आवे तो लो तुम भी खुद देख लो।" बहादुर  सिंह ने एक सफेद चादर सत्तू के ऊपर फेंकते हुए कहा।
"ध्यान से देख चाचा, है कोनो लाल दाग चादर पर, रात ये ही चादर बिछी थी हमरी सेज़ पर।"
सत्तू निःशब्द सा कभी मसले हुये फूलो के दागो से भरी चादर को देखता ओर कभी दरवाज़े में शांत खड़ी बड़ी चौधराइन दुर्गा देवी को। सत्तू ने एक शब्द नही कहा ओर चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया। बड़े चौधरी बैचेनी से इधर उधर टहल रहे थे। उन्हें अपने विधायक बनने के सपने की चिंता सता रही थी। उन्होंने दुर्गा देवी से नज़र बचा कर कहा।
"समझाओ अपने लाट साहब को वरना बहुत बुरा होगा।"

दुर्गा देवी ने एक तीखी चुभती नज़र से बहादुर  सिंह के कमरे की तरफ बढ़ते हुए बड़े चौधरी की तरफ देखा । चौधरी ने नज़रे झुका ली।
दुर्गा देवी कमरे में दाखिल हुए और दरवाज़ा अंदर से बन्द कर लिया।
"हवस ने तोड़ दी बरसों की साधना मेरी
गुनाह क्या है ये जाना मगर गुनाह के बाद।"

"यहाँ हमारी लंका लगी पड़ी है और आप को शायरी सूझ रही है।" बहादुर  सिंह ने गुस्से से कहा।

दुर्गा ने हल्का सा ठहाका लगाया। और फिर शांत स्वर में बोली। "तुझे पता है। बहादुर  तेरे बापू ने दूसरी शादी क्यों कि थी, क्यों पहली रात से ही तेरा बापू मुझसे नफरत करता है। क्योंकि मेरी सेज़ पर जो सफेद चादर बिछी थी उस पर भी लाल दाग नही थे। मैं भी तेरी पत्नी की तरह कुल्टा थी तेरे बापू की नज़र में। मैं भी तेरे बापू की मर्दानगी की कसौटी पर खरी नही उतरी थी।"
दुर्गा देवी ने धीरे धीरे बहादुर  की तरफ बढ़ते हुए कहा।

"और मज़े की बात तो ये थी है कि तेरी चाची सत्तू की बीवी वो भी कमीनी कुल्टा निकली। और उसने ऊपर से बेशर्मी ये की। कि तेरे चाचा को छोड़कर भाग भी गई।" काश! मैं भी उसकी तरह भाग जाती। दुर्गा ने ठंडी आह भरी।
"तो आप हमें यहाँ ये रामायण सुनाने आई है।" बहादुर  के स्वर में अब भी गुस्सा था।
"आप कुछ भी कहो में इस कुलटा को अपनी पत्नी नही मानूँगा ये मेरी मर्दानगी पर दाग़ है।" बहादुर  सिंह ने मेज़ पर हाथ मरते हुए कहा।

"अरे हां रामायण से याद आया उसमे भी तो नारी ने ही अग्निपरीक्षा दी थी। खैर वो सतजुग था और ये कलजुग
है। अब कलजुग है तो क्या पता तेरी पत्नी ही तुझे सबके सामने नामर्द घोषित कर दे। वो कह दे कि जब तुमसे कुछ हुआ ही नही तो दाग कहाँ से आएंगे।" दुर्गा देवी ने बेटे की आंखों में आंखे डालते हुए कहा।
बहादुर  सिंह के शरीर मे एक बार को बिजली सी कौंध गई।
"औरत अगर अपनी पर आ जाये तो अच्छे-अच्छोे की घिघि बंध जाती है। डर गए न छोटे चौधरी" दुर्गा देवी ने बहादुर  के चेहरे के बदलते भाव को पढ़ते हुई तंज़ के साथ कहा।
"आप कुछ भी कहे कोई भी दलील दी लें पर मैं उसे अपनी पत्नी नही स्वीकार करूँगा।" बहादुर  ने दुर्गा देवी के तंज़ भरे शब्दो से खीज़ कर कहा।
"क्यों नही स्वीकार करोगें?..क्योंकि चादर पर दाग नही?" दुर्गा देवी ने सवाल किया
"कभी खुद को आईने में देखा है। कभी झाँका है अपने गिरेबान में कितने दाग है तुम्हारे दिमाग़ में तुम्हारी आत्मा पर,औरतो के प्रति तेरी गिरी हुई सोच देख कर तो लगता है तू खुद एक दाग़ है मेरी कोख़ पर बहादुर  और तेरा बापू दो-दो बीवी रख कर बाहर मुहँ काला करता है। तुम खुद रात रात भर उन बदनाम गलियों में जाकर न जाने कितने बेजान जिस्मों को रौंदते हो। क्या इसे ही मर्दानगी कहते हो। बहादुर , दुःख होता है मुझे तुम्हे अपना बेटा कहते हुए। कभी कभी तो लगता है कि दीवाली पर हर साल जलने वाला रावण तुम जैसो से लाख दर्जा अच्छा था। हम हर साल उसे जलाते है बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में पर असली रावण और असली बुराई तो हमारे घरों में है। ना जाने बहादुर  तेरे जैसीे गंदी सोच के कितने हज़ारों रावण आज भी सड़को पर खुला घूमते है और हम उन्हें रिश्तों की आड़ में छुपाए रखते है। एक दशहरा तो तुम लोगो के लिए भी मनना चाहिए।" दुर्गा देवी ने धिक्कारते हुए कहा। "अरे अगर मर्द बनना है तो औरत की इज़्ज़त करनी सीखो उसको सम्मान दो उसे खिलौना या समान ना समझो।और अगर पति बनना है तो पत्नी को पत्नी का दर्जा दो उसे अपनी हवस का सामान न समझो उसे प्यार की कसौटी पर परखो अपनी दकियानूस और बेग़ैरत मर्दानगी के तराजू में मत तौलो और हां बहादुर  दुर्गा देवी ने दृढ़ता के साथ बहादुर  की आँखों मे देखते हुए कहा "जो कुछ मैं भुगत चुकी हूँ उसे दोबारा नही होने दूंगी चाहे कुछ भी हो जाये।"
"अब आप मुझे गुस्सा दिला रही है माँ " बहादुर  सिंह ने अपनी पिस्तौल हाथ मे लेकर कहा।
"अच्छा बेटा खुद के कर्मो का चिट्ठा सुना तो गुस्सा आ गया। पिस्तौल निकल आयी। इस गुस्से को छोड़कर कभी ठंडे दिल-दिमाग़ से सोचो अपनी हैवानियत को छोड़कर कर इंसानियत को अपनाओ।"
"जिस चरित्रहीन के लिए तुम भाषण दे रही हो ना मैं उसका ही खेल खत्म करता हूँ। और इतना कहकर बहादुर  सिंह हाथ में पिस्तौल लेकर दरवाज़े की तरफ लपका। दुर्गा देवी झट से उसके सामने आ गई "पहले मुझे मार"
"हट जा......माते....." दुर्गा को धक्का देकर बहादुर  ने कदम आगे बढ़ाए। आवाज़ सुनकर बड़े चौधरी बाहर से दरवाज़ा पीटने लगे " बहादुर  दरवाज़ा खोल।"
दुर्गा देवी ने बहादुर  को झंझोड़ते हुए कहा। अब तो शर्म कर त्याग दे अपना ये झूठा मर्दानगी का अहंकार और उसके हाथ से पिस्तौल छीनने की नाकाम सी कोशिश करने लगी पर बहादुर  के सिर पर खून सवार था उसने दुर्गा को झटका दिया। और अचानक इसी खींचातानी में धायं की आवाज़ के साथ गोली चली। हड़बड़ाए चौधरी दिलावर सिंह ने बाहर से गोली की आवाज़ सुनकर बंद दरवाज़े को धक्का देकर खोल दिया। सामने फर्श पर बहादुर  सिंह का बेजान ज़िस्म पड़ा था। और उससे उबल उबलकर निकलने वाले खून से पास पड़ी सफेद चादर पर लाल दाग उभर आये थे।