Wednesday, May 31, 2017

दाग़



 "चल मीना अब तेरा नंबर है अच्छे से नाप देना।" सपना ने पास खड़ी मीना को हाथ से खींच कर दर्ज़ी के सामने खड़े करते हुए कहा। "और हाँ चाचा इसका नाप थोड़ा टाइट रखना।" ठीक है बेटा दर्ज़ी चाचा ने अपनी ऐनक सही करते हुए कहा।
"पर दीदी टाइट चोली में दम घुटता है।" मीना ने मिनमिनाते हुए कहा। "ठीक है चाचा टाइट चोली में इसका दम घुटता तो एक काम करना चोली पीछे से पूरी खुली रखना मेडम को सांस आती रहेगी।" उसने ठहाका लगाते हुए कहा।
"क्या दीदी आप भी हर बख्त मज़ाक करती रहती है।"
"ऐ बस कर हरामखोर इतने सालो से पालपोस कर तुझे बड़ा किया है अब दो पैसे कमाने का वक़्त आया, तो तेरा दम घुटने लगा। चुपकर निगोड़ी कही की।" सपना ने गुस्से से दाँत पीसते हुए कहा।
"देख मीना अगले हफ्ते एक मोटी असामी आ रही है। तेरी नत उतारी की रस्म करने, इसलिए मुझे कुछ कमी नही चाहिए समझी।"
"पर दीदी पिछले महीने ही तो नत उतारी हुई थी मेरी,पेट में अब-तक दर्द है।" मीना ने पेट पर हाथ लगाकर कहा।
"अरे मेरी भोली ये बात हमे ही तो पता है।" सपना ने उँगलियों से उसके गाल खींचते हुए कहा।
"चाचा एक काम और करना लहंगा ऐसे सिलना की नाभि से कम से कम 5 इंच नीचे बंधे हाय आधे ग्राहक तो तेरे पेट पर ही टाँय टाँय फिस्स हो जायेंगे।" दोनों हाथों से बलाये लेते हुए सपना फूली न समायी।
"दीदी आप भी न।" मीना ने शरमाते हुए नज़र झुका ली।
"चल छिलनाल शर्माना भी नही आता। सपना ने मीना के बनावटी शर्म के नाटक पर तुनक कर कहा।"
"हा..हा " मीना ने ठहाका लगाया।
चल जल्दी से निपट के नीचे आजा सपने ने सीढ़िया उतरते हुए कहा।

ये छोटी सी झलक थी फूलपुर की उन बदनाम गलियों की जहाँ की रानी सपना है। इन बदनाम गलियों में बड़े बड़े नवाब जादे अपनी नवाबी लुटा गए। वैसे अब नवाब तो रहे नही पर मर्द तो आज भी बाकि है। जो ख़ूब धड़ल्ले से अपनी हवस का बोझ इन गलियों की चौखट पर उतारने आते है। पर असल मे ये कहानी इन गलियों की नही है। ये कहानी है फूलपुर के चौधरी साहब की जिनके बेटे की शादी है। तो आइये चलते है शादी वाले घर की चौखट पर।

"अरे सत्तू चौबारे को सही से पुतवा दियो दीवारों पर इस्तिहार वालो ने न जाने क्या क्या लिखा दिया है।"
"अरे भौजाई घबराये नाही हम सब सँभाल लेंगे।" सत्तू ने दृढ़ता के साथ कहा।

"न जाने सारे हक़ीम डॉक्टर चार दिन में मर्दानगी बढ़ाने का ही इश्तहार क्यों करते है। कोई कमबख्त इंसानियत भी बढाये भले ही चार महीने लग जाये।" बड़ी चौधराइन दीवार पर लिखे इश्तहार पढ़कर बड़बड़ाते हुए चली गई।

"देखो पेंटर बाबु हमरे बिटवा की शादी है। कोनो कसर बाकी न रहे। अइसन पेंट करो की दीवारों की सारी कालक सफेदी में बदल जाये। सत्तू ने रंग वाले के कंधे पर हाथ रखकर दीवारों पर लिखे इस्तेहार पढ़ते हुए कहा।
"चार दिनों में मर्दाना ताकत बढाइये।
शर्तिया लड़का ही होगा।
शादी से घबराना क्या। समस्त रोगों का इक इलाज़
मिले डॉ. सम्राट गुपत रोग विशेषयज्ञ लाल चौक बस अड्डे के बराबर में फूलपुर,
"हे ससुरे का नाती शादी से कौउन घबराता है।" सत्तू ने बड़बड़ाते हुए कहा।
"पेंटर बाबु ये सब साफ़ चाहिए हम का ठीक से।" रंग वाले को हिदायत देते हुए आगे बढ़ गए सत्तू।
ये चौधरी साहब के छोटे भाई है सुजान सिंह उर्फ सत्तू सुना है इनकी बीवी शादी के दस दिन बाद ही इन्हें छोड़कर भाग गई थी। खैर.....

सामने चौधरी दिलवार सिंह का दरबार सजा है। यहाँ बैठ कर चौधरी साहब सारा दिन चिलम पीते रहते है और गरीबो की किस्मत अपने रजिस्टर में लिखते रहते है। बियाज़ पर पैसे देते है ना, छोटे किसानों और मज़दूरों को। जिसने बख्त में दे दिया ठीक नही तो भईया। चौधरी साहब प्राण भी ले लेते है।
चौधरी साहब की दो बीवी है एक जो अभी आप को गेट पर मिली यानी बड़ी चौधराइन दुर्गा रानी और दूसरी छोटी  चौधराइन कमलेश देवी। बड़ी चौधराइन से चौधरी साहब की शादी की रात से ही नही बनी, न जाने एक रात में ऐसा क्या हुआ कि चौधरी साहब का दिल दुर्गा देवी से ऐसा खट्टा हुआ कि तीन महीने बाद ही दूसरी शादी कर ली। पहले तो दुर्गा को छोड़ने का मन था पर दहेज़ में मिली 30 एकड़ जमीन और एक एम्बेसडर कार ने चौधरी को फ़ैसला बदलने पर मजबूर कर दिया। पर ईश्वर की करनी देखिये चौधरी साहब के यहाँ एक ही लड़का है और वो भी बड़ी चौधराइन दुर्गा रानी की कोख से। और बाकी 3 लडकियाँ है जो छोटी चौधराइन से है।

तो भैय्या चौधरी साहब के इकलौते बेटे की शादी है। दहेज़ से लेकर दुल्हन तक सब बहुत सोच समझकर चुनी है चौधरी साहब ने। दुल्हन मीठापुर के सांसद चौधरी ओम सिंह की एक लौती कन्या है। एक साथ दो निशाने साधे है चौधरी ने अपने निकम्मे आवारा बेटे के लिए एक तो आने वाले विधान सभा मे अपनी उम्मीदवारी पक्की कर ली दूसरे दहेज़ के रूप में इकलौती होने की वजह से सारा कुछ बेटे को ही मिलना है। इसीलिए चौधरी साहब आजकल हवाओ में उड़ रहे है।

और ये है दूल्ह राजा श्रीमान बहादुर सिंह जी 24 घण्टे अपनी मस्ती में मस्त, जिधर से भी निकलते है औरतो को अपना पल्लू बचाना भारी हो जाता है। हर वक़्त अय्यासी और दादागिरी इनका शौक़ है। बड़ी चौधराइन ने बहुत चाहा कि बेटा किसी तरह पढ़ लिख जाए पर चौधरी साहब से मिली बेपनाह छूट के सामने उनकी एक न चली ।
"ओये बिरजू ज़रा सपना को फोन तो लगा माल तैयार है या नही ।" बहादुर  सिंह ने अपने लपाटी दोस्त को नशे में झूमते हुए कहा।

"अभी पूछता हूँ भाई जी"
"हेलो सपना रानी बिरजू बोलूं हूँ। छोटे चौधरी साहब का खास सुनो आज भाई का मूड है माल तो तैयार है जैसा बोला था।"
"भाई सपना ने नमस्ते कही है थारे से और बोली है कि मामला पूरा सेट है।" बिरजू ने आंख दबाते हुए कहा।

"ठीक है तो फेर आज की शाम सपना डार्लिंग के नाम।" छोटे चौधरी ने हिचकी ली।

"कोई कही नही जायेगा। बहादुर  बहुत हुई तुम्हारी ये आवारा गर्दी अब तेरी शादी है कुछ अक्ल और होश की दवा कर समझा।" बड़ी चौधराइन जाने कब वहां आ गई थी और उसने उनकी बातें सुन ली थी।

"ओये मेरी माते रानी ये ही तो दिन है मेरे खेलने खाने के अब मस्ती नही करूँगा तो कब करूँगा, फिर तो बापू की तरह सारा दिन बहीखातों में ही बीतने है।" बहादुर  सिंह ने नशे में झूमते हुए कहा।
"शादी के दो दिन बचे है और तू नशे में धुत इन निकम्मे दोस्तो के साथ अय्याशियों के प्लान बना रहा है। शर्म कर शर्म।" चौधराइन ने शराब की बोतल को ठोकर मरते हुए कहा।

"शर्म, कैसी शर्म,मर्द है हम मर्द, शर्म औरतो के पास मिलती है यहाँ सिर्फ मर्दानगी और ज़िगर मिलता है माता।" बहादुर सिंह ने नशे में लड़खड़ाते हुए अपनी छाती पीटते हुए कहा।

"तेरे जैसे पूत से तो में कुपूत ही रह लेती ना जाने कौन से कर्मो का फल मेरे सामने आ रहा है। सारी उम्र इस उम्मीद पर जीती रही कि तू अपने बाप के जैसा नही बनेगा पर हाई री मेरी किस्मत एक अंडा और वो भी गंदा निकला।" चौधराइन अपने नसीब को कोसते हुए कमरे से बहार निकल गई।
कितनी मुसीबतों से इस घर में खुद को संभाला था दुर्गा रानी ने एक तो पति के होते हुए भी कभी सुहागन सा सुख ना भोग पायी थी। दूसरा पूरे घर का बोझ भार बस एक इस उम्मीद पर संभाल रखा था। कि बेटा बड़ा होगा तो उसके भी दिन बदलेंगे। वरना दिलावर सिंह ने क्या कुछ ज़ुल्म नही किये थे उसके साथ। दूसरी शादी से पहले हर रोज़ उसी के सामने बाज़ारू औरतो के साथ मुंह काला करता। दोस्तो की महफ़िलो में उससे जाम पे जाम बनवाता। कभी गुस्से में पीटता तो कभी घर के नौकरो के सामने गाली देता और ज़लील करता। वैसे तो बेटे से दुर्गा को कुछ खास उम्मीद नही थी मगर फिर भी उसे लगता था कि शादी के बाद शायद कुछ बदल जाये। पर आज की बातों से उसकी वो उम्मीद भी जाती रही।

शाम थोड़ी सी जवान क्या होती सपना के घर की तरफ जाने वाली बदनाम पगडंडियों पर मर्दानगी का खुमार चढ़ने लागता। छोटे चौधरी हो या बड़े चौधरी सब सपना के खासम खास थे। आज छोटे चौधरी की फ़रमाइश पर सपना ने खास तैयारी की थी। मीना जो अभी अभी जवान हुई थी या सपना की जुबान में कहे तो मार्कीट में बिल्कुल जीरो मीटर थी। खास आज छोटे चौधरी के लिये तैयार थी। वैसे तो पिछले महीने ही मीना की नत उतारी हो चुकी थी पर सपना नए पैकिट में पुराने माल को बेचने का हुनर बख़ूबी जानती है।

"आइये आइये सरकार नाचीज़ के गरीब खाने पेे स्वागत है।" सपना ने बहादुर  सिंह को देखते ही जोरो-खरोश से स्वागत किया।
"वो सब तो ठीक है पर हमारा माल रेडी है या नही?" चौधरी ने अपनी हवस भारी आवाज़ में सपना को अनदेखा करते हुए कहा।
"उफ्फ मेरे सरकार जरा दम तो ले। ऐसा पटाखा लाई हूँ आप के लिए की तमाम उम्र याद राखोंगे एक दम जीरो मीटर है।" सपना ने अपने अंदाज में आंखे मटकाते हुए कहा।
"फिर तो तुम इनाम की हक़दार हो सपना।" और चौधरी ने जेब से करारे नोटो की गड्डी निकाल कर सपना की तरफ उछाल दी।
"आप अपने खास कमरे में तशरीफ़ ले चलिये मैं अभी आप की अमानत भेजती हूँ।" सपना ने गेंदे के फूलों से सजे एक कमरे की तरफ इशारा करते हुए कहा।
कमरे में एक पलंग पर सफेद चादर बिछी थी। अगरबत्ती के धुंए से तर कमरा गेंदे के फूलों की अजीब गन्ध से महक रहा था।
सपना झट से दूसरे कमरे में गई और मीना को कुछ खास हिदायत देते हुए बोली देख कमरे की लाइट बंद रखना और जैसा बोले ठीक वैसा ही करना समझी और थोड़ा जोर जोर से चिल्लाना। और हाँ ये ले सपना ने एक कांच की शीशी मीना की तरफ बढ़ते हुए कहा।
"ये क्या है ? मीना ने पूछा।
सपना ने मुँह मीना के कान के पास ले जाकर धीरे से फुसफुसाया इसमें आज जो मुर्गा फ्राई करके तुझे खिलाया है ना उसका खून है। चुपके से चादर पर गिरा देना। ताकि तेरा जीरो मीटर और चौधरी की मर्दानगी दोनों का भरम बना रहे। और हाँ बाद में लाइट जलाना मत भूलना आख़िर चौधरी को सफेद चादर पर दाग नज़र भी तो आना चाहिये। सपना ने ठहाका लगाया।

बड़ी धूमधाम से चौधरी की चौखट से सजी धजी बारात बैंड बाजो की धुन के साथ निकली । चौधरी दिलावर सिंह ने दिलखोल कर ख़र्च किया था आखिर इकलौता बेटा जो था बहादुर  सिंह उनका ऊपर से सिमधी भी पैसे वाला तो जो भी खर्च कर रहे थे वो सब सूद समेत आने वाला था। बहादुर  सिंह अपने पिस्टल से और चौधरी साहब अपनी दो नली पुस्तैनी बंदूक से हवा में धायं धायं गोलिया दाग रहे थे। बारात की आन बान देखते ही बन रही थी। ऐसे ही नाचते गाते बारात दुल्हन के दरवाजे तक पहुंच गई। बड़ी धूमधाम से स्वागत हुआ चौधरी साहब के सिमधि ने कोई कोर कसर बाकी नही छोड़ी थी। ख़ूबखातिर दारी हुई। जय माला और फेरो के बाद आखिर बिदाई का बख्त भी आ गया । चौधरी ओम सिंह ने दहेज़ में दी गाड़ी की चाबी चौधरी दिलावर सिंह को देते हुए कहाँ। "देख चौधरी मुझे दामाद के सारे लच्छन पता है। पर मैंने फिर भी अपनी बेटी खुशी खुशी बियाह दी पर अब ध्यान रहे । मेरी बेटी को कोई कष्ट ना हो। वैसे मैं समझ सकता हूँ। जवानी में नादानी हमने भी की है पर अब दामाद को मैं खुद का उत्तराधिकारी समझ रहा हूँ। और विधान सभा चुनाव सर पर है तो कोई ऐसी हरकत ना हो जिस से हमारी साख पर आंच आये।"
अरे ओम सिंह जी ऐसी शुभ घड़ी में आप भी कैसी बाते लेकर बैठ गए। बेफिक्र रहिये आप की बेटी अब हमारी बेटी है। और रही बहादुर  की बात उसे मुझ पर छोड़ दीजिए। ये कहकर दिलावर सिंह ने ओम सिंह को गले लगा लिया।

नई दुल्हन की डोली चौधरी दिलवार की चौखट पर पहुंच गई। बड़ी धूमधाम से मंगल गीतों के साथ दुल्हन का स्वागत हुआ। दुल्हन क्या चाँद का टुकड़ा थी जिसने भी देखा देखता ही राह गया। बड़ी चौधराइन फूली न समाती बेटा भले ही कितना नकारा था पर सास बनने की खुशी तो अपनी जगह है। छोटी चौधराइन ने मुहँ दिखाई में सोने के कंगन पहनाये तो सबने बड़ी प्रसंशा की
"सौतेली होते हुए भी इतना प्यार बड़े दिल वाली है छोटी चौधराइन।"
उधर नई दुल्हन की मुँह दिखाई चल रही थी और यहाँ चौधरी बहादुर  सिंह की चाण्डाल चौकड़ी जमी हुई थी।

"भैय्या असली मर्दानगी दिखाने का बख्त तो आज आया है।" एक ने शराब गटकते हुए कहा।
"तेरा भाई मर्द है मर्द, तुझे कोई शक है क्या? छोटे चौधरी ने गर्व से सीना फुला कर पूछा।
"भैया जी शक तो कोई न पर नारी के सामने अच्छे अच्छे मर्द पानी भरते देखे है हमने और भाभी तो वैसे भी सुना है बी.ए. पास है।" दोस्तो ने ठहाका लगाया।
"अबे चल साले चौधरी बहादुर  सिंह उनमे से नही जो बीवी के गुलाम होते है।"
"अच्छा भैया भाभी कॉलेज पढ़ी है ज़रा चेक कर लियो कही सेकेण्ड हैंड माल न निकले।" और जोर से ठहाका गूंजा।

खूबसूरत लाइट से सजे और फूलो से महकते कमरे में अपने लड़खड़ाते कदमो के साथ बहादुर  सिंह दाखिल हुआ। सामने बेड पर लंबा सा घूंघट निकाले उसकी नई दुल्हन अनीता बैठी थी। ये पर्दा हटा दो ये..य...य मुखड़ा दिखा दो बहादुर  सिंह ने नशे में झूमते हुए अपनी बेसुरी आवाज़ में गाना गाया। और झट से दुल्हन के सर से दुपट्टा उतार कर दूर फैंक दिया। अनीता ने सकपका कर खुद को घुटनों में समेट लिया। बहादुर  सिंह ने ठहाका लगाया। "रे डर गई क्या तू हमरी पत्नी है और हम तुम्हारे पति परमेश्वर।" इतना कहकर बहादुर  सिंह ने लाइट का स्विच ऑफ कर दिया।

सुबह सारी हवेली में तहलका मच गया। बहादुर  सिंह को दुल्हन पसन्द नही आई थी और वो उसे छोड़ने की जिद्द पर अड़ गया। "रे बुलाओ इसके बाप नु ससुरे ने नए पैकिट में सेकंड हैंड माल थमा दिया।" बहादुर  सिंह एक हाथ मे शराब की बोतल और दूसरे में रिवाल्वर लहराता हुआ चिल्ला रहा था। किसी की समझ मे कुछ नही आ रहा था कि बात क्या है।

"रे शांत हो जा बात तो बता क्या हुई क्यों नशे में अनाप शनाप बोले है। सत्तू ने बहादुर  के पास जाकर कहा।"
"चाचा हमारे मथ्थे सेकंड हैंड माल मढ़ दिया है। छोरी खेली खाई है। कॉलेज से पढ़ी है जाने कितने यारो के साथ मुँह काला किया है। कुलटा ने" बहादुर  सिंह ने बदहवासी में अपना सिर पीटते हुए कहा।
"रे बावले चुप हो जा ज्यादा चढ़ गई है तुझे। किसी ने तेरे कान भर दिए। भैय्या को पता चल गया तो कयामत आ जायेगी " सत्तू ने बहादुर  सिंह को समझाते हुए कहा।
"बापू ने ही अपनी विधायकी के चक्कर मे ये किया है। और हमे किसी ने नही बहकाया खुद अपनी आंखों से देखा है यकीन ना आवे तो लो तुम भी खुद देख लो।" बहादुर  सिंह ने एक सफेद चादर सत्तू के ऊपर फेंकते हुए कहा।
"ध्यान से देख चाचा, है कोनो लाल दाग चादर पर, रात ये ही चादर बिछी थी हमरी सेज़ पर।"
सत्तू निःशब्द सा कभी मसले हुये फूलो के दागो से भरी चादर को देखता ओर कभी दरवाज़े में शांत खड़ी बड़ी चौधराइन दुर्गा देवी को। सत्तू ने एक शब्द नही कहा ओर चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया। बड़े चौधरी बैचेनी से इधर उधर टहल रहे थे। उन्हें अपने विधायक बनने के सपने की चिंता सता रही थी। उन्होंने दुर्गा देवी से नज़र बचा कर कहा।
"समझाओ अपने लाट साहब को वरना बहुत बुरा होगा।"

दुर्गा देवी ने एक तीखी चुभती नज़र से बहादुर  सिंह के कमरे की तरफ बढ़ते हुए बड़े चौधरी की तरफ देखा । चौधरी ने नज़रे झुका ली।
दुर्गा देवी कमरे में दाखिल हुए और दरवाज़ा अंदर से बन्द कर लिया।
"हवस ने तोड़ दी बरसों की साधना मेरी
गुनाह क्या है ये जाना मगर गुनाह के बाद।"

"यहाँ हमारी लंका लगी पड़ी है और आप को शायरी सूझ रही है।" बहादुर  सिंह ने गुस्से से कहा।

दुर्गा ने हल्का सा ठहाका लगाया। और फिर शांत स्वर में बोली। "तुझे पता है। बहादुर  तेरे बापू ने दूसरी शादी क्यों कि थी, क्यों पहली रात से ही तेरा बापू मुझसे नफरत करता है। क्योंकि मेरी सेज़ पर जो सफेद चादर बिछी थी उस पर भी लाल दाग नही थे। मैं भी तेरी पत्नी की तरह कुल्टा थी तेरे बापू की नज़र में। मैं भी तेरे बापू की मर्दानगी की कसौटी पर खरी नही उतरी थी।"
दुर्गा देवी ने धीरे धीरे बहादुर  की तरफ बढ़ते हुए कहा।

"और मज़े की बात तो ये थी है कि तेरी चाची सत्तू की बीवी वो भी कमीनी कुल्टा निकली। और उसने ऊपर से बेशर्मी ये की। कि तेरे चाचा को छोड़कर भाग भी गई।" काश! मैं भी उसकी तरह भाग जाती। दुर्गा ने ठंडी आह भरी।
"तो आप हमें यहाँ ये रामायण सुनाने आई है।" बहादुर  के स्वर में अब भी गुस्सा था।
"आप कुछ भी कहो में इस कुलटा को अपनी पत्नी नही मानूँगा ये मेरी मर्दानगी पर दाग़ है।" बहादुर  सिंह ने मेज़ पर हाथ मरते हुए कहा।

"अरे हां रामायण से याद आया उसमे भी तो नारी ने ही अग्निपरीक्षा दी थी। खैर वो सतजुग था और ये कलजुग
है। अब कलजुग है तो क्या पता तेरी पत्नी ही तुझे सबके सामने नामर्द घोषित कर दे। वो कह दे कि जब तुमसे कुछ हुआ ही नही तो दाग कहाँ से आएंगे।" दुर्गा देवी ने बेटे की आंखों में आंखे डालते हुए कहा।
बहादुर  सिंह के शरीर मे एक बार को बिजली सी कौंध गई।
"औरत अगर अपनी पर आ जाये तो अच्छे-अच्छोे की घिघि बंध जाती है। डर गए न छोटे चौधरी" दुर्गा देवी ने बहादुर  के चेहरे के बदलते भाव को पढ़ते हुई तंज़ के साथ कहा।
"आप कुछ भी कहे कोई भी दलील दी लें पर मैं उसे अपनी पत्नी नही स्वीकार करूँगा।" बहादुर  ने दुर्गा देवी के तंज़ भरे शब्दो से खीज़ कर कहा।
"क्यों नही स्वीकार करोगें?..क्योंकि चादर पर दाग नही?" दुर्गा देवी ने सवाल किया
"कभी खुद को आईने में देखा है। कभी झाँका है अपने गिरेबान में कितने दाग है तुम्हारे दिमाग़ में तुम्हारी आत्मा पर,औरतो के प्रति तेरी गिरी हुई सोच देख कर तो लगता है तू खुद एक दाग़ है मेरी कोख़ पर बहादुर  और तेरा बापू दो-दो बीवी रख कर बाहर मुहँ काला करता है। तुम खुद रात रात भर उन बदनाम गलियों में जाकर न जाने कितने बेजान जिस्मों को रौंदते हो। क्या इसे ही मर्दानगी कहते हो। बहादुर , दुःख होता है मुझे तुम्हे अपना बेटा कहते हुए। कभी कभी तो लगता है कि दीवाली पर हर साल जलने वाला रावण तुम जैसो से लाख दर्जा अच्छा था। हम हर साल उसे जलाते है बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में पर असली रावण और असली बुराई तो हमारे घरों में है। ना जाने बहादुर  तेरे जैसीे गंदी सोच के कितने हज़ारों रावण आज भी सड़को पर खुला घूमते है और हम उन्हें रिश्तों की आड़ में छुपाए रखते है। एक दशहरा तो तुम लोगो के लिए भी मनना चाहिए।" दुर्गा देवी ने धिक्कारते हुए कहा। "अरे अगर मर्द बनना है तो औरत की इज़्ज़त करनी सीखो उसको सम्मान दो उसे खिलौना या समान ना समझो।और अगर पति बनना है तो पत्नी को पत्नी का दर्जा दो उसे अपनी हवस का सामान न समझो उसे प्यार की कसौटी पर परखो अपनी दकियानूस और बेग़ैरत मर्दानगी के तराजू में मत तौलो और हां बहादुर  दुर्गा देवी ने दृढ़ता के साथ बहादुर  की आँखों मे देखते हुए कहा "जो कुछ मैं भुगत चुकी हूँ उसे दोबारा नही होने दूंगी चाहे कुछ भी हो जाये।"
"अब आप मुझे गुस्सा दिला रही है माँ " बहादुर  सिंह ने अपनी पिस्तौल हाथ मे लेकर कहा।
"अच्छा बेटा खुद के कर्मो का चिट्ठा सुना तो गुस्सा आ गया। पिस्तौल निकल आयी। इस गुस्से को छोड़कर कभी ठंडे दिल-दिमाग़ से सोचो अपनी हैवानियत को छोड़कर कर इंसानियत को अपनाओ।"
"जिस चरित्रहीन के लिए तुम भाषण दे रही हो ना मैं उसका ही खेल खत्म करता हूँ। और इतना कहकर बहादुर  सिंह हाथ में पिस्तौल लेकर दरवाज़े की तरफ लपका। दुर्गा देवी झट से उसके सामने आ गई "पहले मुझे मार"
"हट जा......माते....." दुर्गा को धक्का देकर बहादुर  ने कदम आगे बढ़ाए। आवाज़ सुनकर बड़े चौधरी बाहर से दरवाज़ा पीटने लगे " बहादुर  दरवाज़ा खोल।"
दुर्गा देवी ने बहादुर  को झंझोड़ते हुए कहा। अब तो शर्म कर त्याग दे अपना ये झूठा मर्दानगी का अहंकार और उसके हाथ से पिस्तौल छीनने की नाकाम सी कोशिश करने लगी पर बहादुर  के सिर पर खून सवार था उसने दुर्गा को झटका दिया। और अचानक इसी खींचातानी में धायं की आवाज़ के साथ गोली चली। हड़बड़ाए चौधरी दिलावर सिंह ने बाहर से गोली की आवाज़ सुनकर बंद दरवाज़े को धक्का देकर खोल दिया। सामने फर्श पर बहादुर  सिंह का बेजान ज़िस्म पड़ा था। और उससे उबल उबलकर निकलने वाले खून से पास पड़ी सफेद चादर पर लाल दाग उभर आये थे।

Saturday, March 11, 2017

बाँझ


“अरे….आओ आओ रामदुलारी बहन आज हमारे घर का रास्ता कैसे याद आ गया। जब से मौहल्ला छोड़ा है तुम तो जैसे हमे भूल ही गई।”
“नही बिलक़ीस आपा कैसी बाते करती हो। अपनों को भी भला कोई भूलता है। वो तो बस काम में वक़्त ही नही मिल पता। खैर छोडो ये लो मिठाई खाओ रामदुलारी ने मिठाई का डब्बा आगे करते हुए कहा।
“अरे मिठाई ये किस ख़ुशी में?”
“बताती हूँ पहले आप मुहँ मीठा करो।”
“चलो अब बताओ।” बिलक़ीस ने बर्फी का टुकड़ा मुहँ में रखते हुए कहा।
“तुम दादी बन गई हो आपा। दिनेश के यहाँ लड़का हुआ है। रामदुलारी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“माशाल्लाह अल्लाह लम्बी उम्र दे बच्चे को। ये तो तुमने बहुत अच्छी खबर सुनाई दुलारी। और बिलक़ीस ने एक सौ का नोट पर्स से निकाल कर रामदुलारी की तरफ बढ़ा दिया।
“नही…नही…. आपा इसकी कोई जरूरत नही है।” दुलारी ने हिचकते हुए कहा।
“अरे तुझे नही दे रही ये तो मेरे पोते के लिए है।” बिलक़ीस ने आँखे मटकाते हुए कहा।
“जब आप घर आओगी तभी देना।”
“अरे दुलारी रख ले घर जब आऊँगी तब तो में पोते को गोद में लेकर ढेरे दुआएँ दूंगी।” बिलक़ीस ने नोट दुलारी के हाथ में रखते हुए कहा।
“हाँ…हाँ क्यों नही आपा, वैसे बहु नज़र नही आ रही कही बाहर गई है क्या?” दुलारी ने अंदर झाँकते हुए कहा।
“होगी यही कही बाँझ।” बहू के नाम पर बिलक़ीस ने मुँह बनाते हुए कहा।
“ऐसे नही बोलते आपा ऊपर वाले पर भरोसा रखिये भगवान ने चाहा तो जल्दी ही आप के घर में भी किलकारियां गूंजेगी।” दुलारी ने बिलक़ीस को तसल्ली देते हुए कहा।
“हम्म पिछले 4 साल से ये ही उम्मीद किये जा रही हूँ दुलारी।” बिलक़ीस ने गहरी सांस लेते हुए कहा।
“तुम्हे तो पता है दुलारी, आसिफ के अब्बू की मौत के बाद कितनी मुसीबतों से ज़िन्दगी बसर की है मैंने’ सिर्फ आसिफ को क़ाबिल बनाने के लिए। इकलौते बेटी की शादी के कितने अरमान थे। पर आसिफ की ख़ुशी के लिए उनका भी गला घोट दिया मैंने, जहाँ उसने कहा वही शादी कर दी। पर क्या अब पोता-पोती को गोद में खिलाने का अरमान भी सीने में दफ़न कर दूँ।”
बिलक़ीस ने दुपट्टे से आँसू पोछते होये आह भरी।
“बिलक़ीस दिल छोटा नही करो भगवान के घर देर है अंधेर नही।” दुलारी ने उसको तसल्ली देते हुए कहा।
“लो मैं भी किन बातों में लग गई, तुमको को चाय नाश्ता भी नही पूछा, मरियम…..अरी… ओ मरियम कहाँ मर गई। बाहर  आ जल्दी।”
बिलक़ीस ने बहु को आवाज़ लगाई।
अंदर से एक नाज़ुक सी लड़की अपना दुपट्टा सही करते हुए सकपकाई सी जल्दी से बहार आई।
“जी अम्मी कहिये।”
“अरे कहना क्या है। दिखता नही दुलारी बहन आई है। इनके लिए कुछ चाय नाश्ते का इंतज़ाम करो। वैसे किसी से सलाम दुआ की तो, तुम्हे तौफ़ीक़ है नही, कि किसी बड़े छोटे को देखकर सलाम कर ले।”
बिलक़ीस ने कड़वे लहज़े में कहा।
“आदाब आंटी” मरियम ने दुलारी की तरफ देखते हुए कहा।
“जीती रहो बेटी दूधो नहाओ पूतो फलो।” दुलारी ने सिर पर हाथ रखते हुए बड़ी मोहब्बत से कहा।
“अब यही खड़ी रहोगी या चाय भी लेकर आओगी।” बिलक़ीस ने एक बार फिर से बहु को झिड़की लगाई। और मरियम चुपचाप वहाँ से चली गई।
“बिलक़ीस क्यों खामा खा उस बिचारी पर गुस्सा होती रहती हो। कितनी प्यारी बच्ची है। भगवान ने चाहा तो बच्चे भी हो जायेंगे।” दुलारी ने बहु के साथ बिलक़ीस के रवैय्ये को देखते हुए समझाने के लहजे में कहा।

मरियम की शादी 4 साल पहले बड़ी धूम-धाम से आसिफ़ से हुई थी। दरअस्ल ये एक लव मैरिज थी। आसिफ और मरियम एक ही कॉल सेंटर में जॉब करते थे। वही दोनों में प्यार हुआ और घर वालो की मर्ज़ी से दोनों ने शादी कर ली। पर शादी के 4 साल बाद भी मरियम माँ नही बन सकी। जिसकी वजह से उसकी सास बिलक़ीस उस से काफी नाराज़ रहती थी। आसिफ उनकी एकलौती औलाद थी और वैसे भी बिलक़ीस की बेटे के लिये अपनी मर्ज़ी की दुल्हन लाने की ख्वाहिश पहले ही अधूरी रह गई थी। और अब पोते पोती की शक्ल देखने की उम्मीद भी पूरी होती नजर नही आ रही थी। इसीलिए जब भी किसी के यहाँ से बच्चे होने की खबर आती बिलक़ीस मायूस हो जाती और सारी भड़ास बिचारी मरियम पर निकालती।

रामदुलारी पहले इसी मोहल्ले में रहती थी। पर पिछले साल अपना मकान बेच कर वो दूसरे मोहल्ले में रहने लगी थी। बिलक़ीस उसे प्यार से दुलारी कहती और दुलारी बिलक़ीस को हमेशा आपा बुलाती। बिलक़ीस और दुलारी पड़ोसन होने के साथ एक दूसरे की हमदर्द भी थी। इसीलिए दोनों एक दूसरे को दुःख-सुख में हमेशा याद रखती थी। जब से बिलक़ीस ने दुलारी के यहाँ पोता होने की बात सुनी थी। दादी बनने की उसकी ख्वाहिश और भी बढ़ गई थी। इसीलिए उसके सिर पर आजकल बेटे की दूसरी शादी का भूत सवार था। उठते बैठते खाते-पीते अब बस ये ही रट लगाये रखती, मरियम उनकी इस बात पर वैसे तो कभी कोई जवाब नही देती और अगर गलती से कोई जवाब दे देती तो कई दिनों तक उसे खरी खोटी सुन्नी पड़ती। अक्सर वो आसिफ़ को उनकी अम्मी की ये बात बताती पर आसिफ हमेशा उसे बड़ी मोहब्बत से समझाता। “मरियम तुम अम्मी की बात का बुरा मत माना करो। तुम्हे तो पता है कि उन्हें बच्चो से कितना प्यार है। इसीलिए कभी-कभी अपने जज़्बातों पर काबू नही रख पाती है।”
“तो आसिफ इसमें मेरी क्या गलती है। उन्होंने जिस डॉक्टर को कहा मैं वहाँ गई। जिस हकीम को बोला उसकी कड़वी दवाई खाई। यहाँ तक के कई झोला छाप और मौलवी मुल्लाओं से भी ना चाहते हुए इलाज़ कराया। सिर्फ उनकी खुशी के लिए। फिर भी बच्चे नही हुए तो इसमें मेरा क्या कुसूर है। क्या मेरा दिल नही करता की मैं भी माँ बनू, मेरे भी बच्चे हो जो मुझे अम्मी कहे। मरियम की आँखों से आंसू झरने लगे।
“पागल क्यों दिल छोटा करती हो मैं हूँ ना तुम्हारे साथ तुम अम्मी की बात दिल से न लगाया करो वो जुबान की कड़वी जरूर है पर दिल की बहुत अच्छी है। तुम परेशान न हो मैं अम्मी से बात करूँगा।” आसिफ ने मरियम को अपनी बाहों में भरते हुए कहा।

दिन ऐसे ही बीतते रहे मरियम और आसिफ ने बहुत से डॉक्टर्स को दिखाया बहुत सारी जाँच कराई पर कोई फायदा नही हुआ। पर बिलक़ीस की पोते-पोती की चाहत उम्र के साथ-साथ और बढ़ती जा रही थी। और मरियम के लिए उसके ताने और तीखे हो गये थे। पर मरियम आसिफ़ की मोहब्बत की वजह से कुछ नही बोलती। शायद उसने भी वक़्त और हालात से समझौता कर लिया था। अब बच्चो के लिए मरियम की बेकरारी भी उतनी नही रही थी। आसिफ और बिलक़ीस के लाख कहने पर भी वो डॉक्टर के पास नही जाती। बिलक़ीस के बाँझ कहने पर उसकी आँखों से अब आंसू नही गिरते। नाजुक सी मरियम अब बहुत मज़बूत हो गई थी। या शायद होने का दिखावा करती थी। क्योंकि आसिफ की मोहब्बत हमेशा उसकी ढाल बन जाती थी। पर एक दिन आसिफ़ की बात सुनकर वो अंदर तक टूट गई। उसके सारे भर्म रेत की दिवार की तरह ढह गए।
“मरियम, देखो तुम्हे तो पता है कि मुझे अम्मी ने अब्बू की मौत के बाद कितनी मुसीबतो से पाला है। उनके और तुम्हारे सिवा मेरा इस दुनिया में कोई नही है। अम्मी ने आजकल फिर से दूसरी शादी की जिद लगा रखी है। और तुम तो जानती हो। कि कितने दिनों से मैं अम्मी को टालता आ रहा हूँ। पर अब अम्मी ने खाना पीना भी छोड़ दिया है। और जिद लगा कर बैठी है कि जब तक मैं दूसरी शादी के लिए हाँ नही करूँगा वो खाना नही खायेगी। अब मैं अपना मुकदमा तुम्हारी अदालत मैं लेकर आया हूँ। तुम ही बताओ अब मैं क्या करूँ एक तरफ माँ की ममता है और दूसरी तरफ तुम्हारी मोहब्बत।” आसिफ ने मरियम के हाथो को थामते हुए कहा।
मरियम किसी बुत की तरह एकटक आसिफ का चेहरा देख रही थी।
“बोलो मरियम ” आसिफ ने मरियम की ख़ामोशी से परेशान होकर पूछा।
“क्या बोलूं आसिफ़ तुम्ही बताओ? क्योंकि इन्कार शायद तुम्हे पसन्द नही आएगा और हाँ मेरे होंटो से निकलेंगे नही। तो अब तुम ही बताओ आसिफ क्या बोलूं ? ” मरियम ने खुद को सँभालते हुए कहा।
“तुम्हे क्या लगता है मरियम की ये सब मेरे लिए आसान है। क्या ये मैं अपने लिए कर रहा हूँ?” आसिफ ने सवाल करते हुए कहा।
“तो फिर ठीक है कर दो हमेशा की तरह इंकार दूसरी शादी से”
“मरियम बहुत इंकार किया मैंने, पर अम्मी को तो तुम जानती हो की वो जिद की कितनी पक्की है।”
“तो कर लो शादी, फिर मेरी इज़ाज़त की क्या जरूरत है।” मरियम ने सपाट लहजे में कहा।
“समझने की कोशिश करो मरियम वो माँ है मेरी, उन्होंने पूरी जावनी मेरे ऊपर कुर्बान की है मरियम, मेरे ऊपर। मैं उनकी एकलौती औलाद हूँ। मुझसे उनका दुःख नही देखा जाता।” आसिफ ने मरियम को झंझोड़ते हुए कहा।
“उनकी तो एक औलाद है। जो कम से कम उन्हें माँ तो कह सकता है। पर मेरा, मेरा कौन है आसिफ? मुझे तो एक भी माँ कहने वाला नही है। मैं किस से जिद करूँ?” मरियम ने आँसूओ को रोकते हुए सवाल किया। कुछ देर के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।
“मरियम तुम तो इतनी बेहिस और बेदर्द नही थी। ” आसिफ ने कमज़ोर सी आवाज़ में कहा। “अब तुम बेहिस कहो या बेदर्द पर मैं तुम्हे दूसरी शादी नही करने दूंगी। क्योंकि अगर बात अम्मी की ख़ुशी की होती तो मैं कभी तुम्हारी दूसरी शादी के लिए इंकार नही करती। पर बात है उनके विश्वास की उनकी ममता की उनकी सारी जिद बच्चों के लिए है। पर तुम्हारी दूसरी शादी से क्या उनकी ये चाहत पूरी हो सकेगी?” मरियम ने आसिफ़ की आँखों में आँखे डालकर चुभते लहज़े में पूछा।
“आसिफ़ मैं अपने दिल पर पत्थर रखकर तुम्हारी मोहब्बत बाँट लेती तुम्हे ख़ुशी ख़ुशी दूसरी शादी की इज़ाज़त दे देती। पर जिस वजह से ये सब हो रहा है क्या वो वजह खत्म हो सकेगी? क्या तुम अम्मी को दादी बनने का सुख दे सकोगे?” मरियम ने आँसूओ से भरी आँखों से आसिफ़ की तरफ देखते हुए पूछा। आसिफ बुत बना बैठा रहा।
“आसिफ तुमने ये बात हमेशा मुझसे छुपाई है कि कमी मुझमे नही तुम में है और तुम्हारी मोहब्बत की जमानत पर मैंने कभी तुम्हे जाहिर ही नही होने दिया कि मुझे ये पता है कि तुम कभी मुझे माँ नही बना सकते। पर आज तुम्हारी बातो ने मुझे बोलने के लिए मजबूर कर दिया। मैंने आजतक तुम्हे ये जाहिर नही होने दिया की वो सारी रिपोर्ट्स मैंने पढ़ी है। जिनमे साफ़ साफ़ लिखा है कि तुम कभी बाप नही बन सकते। फिर भी मैं तुम्हारी मोहब्बत में ये सोच कर चुप रही की तुम्हे कमतरी का एहसास न हो। अपनी ममता का गला उसी दिन घोट लिया था मैंने। अम्मी के और दुनिया वालो के ताने सुनती रही। सिर्फ तुम्हारी खातिर, हमेशा सोचती रही की शायद तुम खुद मुझे एक दिन ये सच बता दोंगे। पर तुम में शायद सच कहने की हिम्मत ही नही थी। हाँ तुम मुझे बेदर्द कह सकते हो आसिफ क्योंकि अब मुझे दर्द का एहसास नही होता। हूँ मैं बेहिस क्योंकि जिससे मैंने बेपनाह मोहब्बत की थी उसे शायद मुझ पर यकीन ही नही था।” मरियम बदहवास बोले जा रही थी और आसिफ बेदम सा बैठा सब सुन रहा था।
“और सुनो आसिफ ये सिर्फ दूसरी शादी की इज़ाज़त और इनकार का मसला नही। ये बात है औरत के सम्मान की .. उसके वजूद की .. उसकी अना की ..  इसलिए मैं तुम्हे इस शादी की कभी इज़ाज़त नही दे सकती। क्योंकि मैं नही चाहती की मेरी तरह, तुम्हारी दूसरी बीवी भी अपने माथे पर बाँझ का तमगा लगाकर अपनी सारी उम्र घुट-घुट कर काट दे।”
मरियम ने हिचकी लेते हुए कहा।
आसिफ़ को काटो तो खून नही। वो बदहवास सा बैठा मरियम को देख रहा था। और दरवाज़े पर खड़ी बिलक़ीस अपने बिखरते वजूद को संभालने की नाकाम सी कोशिश करते हुए जमीन पर ढह गई।

Sunday, January 1, 2017

नोटबंदी

आज दिनाँक ०७-नवम्बर  २०१६ :

"लाला बेटा बहुत बिमार है। थोड़े पैसे चाहिए। आप चाहे तो मेरी मज़दूरी से काट लेना" धन्नी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। 

"सरकारी अस्पताल में दिखा ले फ्री में सही इलाज़ होता है वहाँ।" लाला ने हरे-लाल नोट गिनते हुए कहा।

"गया था वहाँ, पर वो बोले बेड खाली नही है। इसीलिये आप के पास आया हूँ।" धन्नी ने दोनों हाथ जोड़कर, कमर को  झुकाते हुए कहा। 

"परसो 9 तारिख़ को मजदूरी मिलेंगे तब आना।" लाला ने चश्मे को सही करते हुए बेपरवाही से जवाब दिया। 

"पर लाला जी मेरा बेटा बहुत ही बिमार है। परसो तक तो शायद......" धन्नी की रुंधी हुए आवाज़ शायद से आगे कुछ ना कह सकी। 
धन्नी क्या बच्चो वाली बात करता है। मौत को कौन रोक पाया है। जिसकी परमात्मा ने लिख दी उसकी निश्चित है।" लाला ने फिर से बेदर्दी के साथ कहा। 

"पर लाला जी कुछ तो दया करो." धन्नी के माथे पर नवम्बर की हलकी सर्दी में भी पसीने की बुँदे साफ़ नज़र आ रही थी। 

"बोला है न परसो आना,आज 7 तारिख है कल 8 और परसो 9 बस कल का ही तो दिन बीच में है। चल भाग यहाँ से " लाला ने गुस्से से छिड़की लगते हुए कहा। 

आज दिनांक  ०९-नवम्बर २०१६-

आज  गाँव मैं पैसे की वजह दो मौत हुई है। एक लाला सुखीराम की दूसरा धन्नी मजदूर के बेटे की। एक पर अधिक थे और एक पर नही थे।

Thursday, October 13, 2016

मोहिनी



"देखो बाबू मोहिनी अभी ग्राहक के साथ बिजी है। वो नही मिल सकती। ज्यादा आग लगी है तो इनमें से कोई ले जा।" उसने कतार में खड़ी लड़कियों की तरफ इशारा किया।
"नही,मुझे मोहिनी ही चाहिए।"
"ऐ ! ऐड़ा हे क्या,बात समझ में नही आती तेरे, बोला न मोहिनी बिजी है।और सुन और कोई नही चाहिए तो फूट यहाँ से"
"नही में बिना मिले नही जाऊँगा।" और वो ढीट बनकर वही बैठ गया। "
"हेल्लो...... औरत ने चुटकी बजाते हुए कहा। ज्यादा अन्ना हज़ारे बनने की कोशिश ना कर वरना ऐसी मार पड़ेगी के बाबा को तो स्त्री के कपडे भी नसीब हो गए थे। तुझे नंगा ही भागना पड़ेगा। हरामी साला....। धंधा तो पहले ही मंदा है ऊपर से ये ऐसे ढीठ ग्राहक सालो ने दिमाग का कश्मीर बना के रख दिया।"
"प्लीज...सुन ना,मिलवा दे ना मोहिनी से कुछ ले दे ले मैं 1000 दे सकता हूँ।अगर तू उस से मिला दे।"
"ओये सुन बे दल्ले साले हम यहाँ जिश्म बेचते है। हमारे भी कुछ कायदे है। ईमान खरीदना है तो बराबर में पुलिस स्टेशन है वहाँ जा समझा।और तू एक बात तो बता इतना पागल क्यों है तू मोहिनी के पीछे ऐसा क्या है उसमें जो इन सब में नही है।"
"आप जैसा समझ रही है ऐसा कुछ नही है मुझे कोई गलत काम नही करना है बस में तो उसके लिए कुछ अच्छा करना चाहता हूँ।"
"हा...हा...हा...उसने पान से लाल दांतो को दिखाते हुए बेहूदा सा ठहाका मारा। कुत्ते..नेता है क्या ? जो वोट से पहले ही मदद करना चाहता है।और वो भी पैसे देकर।"
"देखिये आप मुझे गलत समझ रही है मैं ऐसा नही हूँ। मैं शरीफ आदमी हूँ।"
"हुंन..न..न.. सारे शरीफजादे रंडियों के कोठो और संसद में ही तो आते है। भाग साले नोटंकी कही का।" उसने पान की पिचकारी पास रखे थूकदान में मारते हुए झिड़की लगाई। "अच्छा एक बता तुझे जब कुछ करना नही तो मिलना क्यों है? काम क्या है मोहिनी से ?"
"जी वो...वो....कुछ बात करनी है उसने हकलाते हुए कहा।"
"देख सुन बे तू जो भी है सही-सही बता दे अब, नही तो अपनी तशरीफ़ लेकर दफा हो जा यहाँ से मुझे गुस्सा आ गया तो तेरा ऐसा हाल करूंगी की रेलगाड़ियों में बधाई मांगता फिरेगा। ये कोठा है कोई मोबाइल बूथ नही कि बात करनी है"
"देखिये बहन जी आप मिलवाने के पैसे लेती है ना, तो आप मेहरबानी करके उस से मिला दे। मैं आप को जितना टाइम उसके साथ रहूँगा उसके पैसे दूँगा।" "ओये बिन बरसात के मेंढक बहन होगी तेरी माँ, पर ये बात तूने सही कही कि हम अपने वक़्त के पैसे लेते है।"औरत ने सोचते हुए कहाँ। "चल ठीक है। ढिल्ले मिलवाती हूँ।पर एक बात कान खोल कर सुन ले अगर तुने कोई चालाकी की या तू कोई फालतू का समाजसेवी निकला तो मेरे से बुरा कोई नही होगा। मुझे कोई लफड़ा नही मांगता मेरे कोठे पर।" औरत ने आँखों में आँखे डालते हुए कहा।
"जी...जी.. ऐसा कुछ नही है।आप निश्चिन्त रहे।"
"सुन दीपा देख तो मोहिनी फ्री हुई या नही, फ्री हो तो बोल के तुझसे देवदास मिलने आया है। हा..हा..हा..हा। साला हलकट।" पान का बीड़ा गाल में दबाते हुए उसने फिर से ठहाका मारा" एक लड़की मटकते हुए छम छम करती और तिरछी नज़रो से आदमी को घूरते हुए कमरे से बाहर चली गई।
"आपा........  फ्री है। पर कह रही है। कि अभी थकी हुई है। सांस ठिकाने आने दे जब ही कोई नया मुर्गा भेजना।" लड़की ने औरत से आकर कहा।
"ह्म्म्म.. ठीक है ठीक है। जा जाकर कोई ग्राहक फंसा सुबह से तेरी बोहनी नही हुई दीपा। बहुत ठंडी जा रही है तू आजकल।" उसने लड़की को फटकारते हुए से लहज़े में कहा। और आदमी से बोली। " दस मिलट रुक बे! मिलवाती हूँ। 500 की पत्ती दिल से जुदा कर" आदमी ने चुपचाप अपने बटुए से 500 का एक नोट निकाल कर औरत के हाथ पर रख दिया।
"पानी पियेगा या कुछ ठंडा मंगाऊँ।"
"जी..जी नही.. कुछ नही शुक्रिया।" आदमी पता नही किन सोचो में गुम था औरत की बात सुनकर थोड़ा हड़बड़ा कर बोला।
"डर मत इस मेहमान नवाजी के हम पैसे नही लेते।" और उसने आवाज़ लगाई "जुगनी दो पेप्सी लाना ठंडी सी।"
"आपा मोहिनी ने कहा है कि वो अब ठीक है मुर्गा भेज दे।" लड़की ने कोल्डड्रिंक की बोतल देते हुए कहा।
"जाओ जी आप की मुलाकात का वक़्त आ गया यहाँ से तीसरा कमरा मोहिनी का ही है। जा बे  ठंडे ये पेप्सी भी वही जाकर पी लेना।" औरत ने पेप्सी का घूँट गले से उतारते हुए कहा। "और सुन एक बार फिर कह रही है कुछ गड़बड़ नही चाहिए मुझे समझ लेना वरना नाम गुलाबबाई है पर में गुलाब जैसी हूँ नही।" औरत ने धमकी भरे अंदाज़ में आदमी को सिर से पांव तक ताड़ते हुए कहा।

"जी समझ गया।"
ठक-ठक... उसने तीसरे कमरे के सामने जाकर धीरे से दरवाजा खट खटाया।
"ज्यादा शरीफ ना बन अंदर आ जा दरवाज़ा खुला है ।" अंदर से एक चटकीली सी आवाज़ आई।
आदमी दरवाज़ा खोल कर अंदर चला गया। पूरा कमरा बीड़ी के धुंए से भरा हुआ था। सामने एक बेड पड़ा था और उस पर सिलवटों भरी एक मटमैली सी चादर जो कुछ देर पहले ही गुजरे लम्हो की दास्तान बयान कर रही थी। बेड के बगल में कुर्सी पर लगभग 25 -26  साल की लड़की अपने मुहँ से भट्टे की चिमनी की तरह धुंआ निकाल रही थी। कमरे में एक तो रौशनी कम थी ऊपर से धुआं इसिलए चेहरा साफ़ नज़र नही आ
रहा था। आदमी ने दरवाजा धीरे से बंद किया और लड़की की तरफ बढ़ा।
"रुक जा रुक जा इतनी भी क्या गर्मी चढ़ी है थोड़ा सब्र रख बीड़ी तो आराम से पीने दे। तू भी पियेगा क्या?" लड़की ने बीड़ी का लंबा सा कस मारते हुए कहा। आदमी कुछ नही बोला चुप-चाप आराम से बेड के एक कोने पर बैठ गया।
"इस उम्र में भी गर्मी नही गई तेरी।" लड़की ने बीड़ी बुझाते हुए कहा।
"चल अब ज्यादा टाइम कल्टी ना कर काम पे लग जा और भी कस्टमर है मेरे" उसने कॉन्डोम का पैकिट आदमी के ऊपर फेंकते हुए कहा।
"बि..ट... बिट्टू...." आदमी ने आँसूओ के साथ सिसकी लेते हुए मुश्किल से कहा।
कुछ देर के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया सांस लेने की भी आवाज़ नही आ रही थी। "कौन हो तुम ?" कहते हुए लड़की ने जल्दी से कमरे की खिड़की खोल दी। और फटी आँखों से देखते हुए जमीन पर ढह गई। कुछ देर बाद अपने बेतरतीब कपड़ो को सही करते हुए लड़की ने सिसकी भरी आवाज़ में बस इतना कहा "बाबा" ये सुनते ही आदमी दहाड़े मार-मार कर रोने लगा। लड़की जिसका नाम कुछ देर पहले तक मोहिनी था और जो बड़ी बेशर्मी से बक बक कर रही थी बहते आंसू और पथराई नजरो से उस आदमी को देख रही थी। कुछ देर तक दोनों एक दूसरे को देखते रहे और रोते रहे।
"आज अचानक यहाँ क्यों,कैसे?"
आदमी गर्दन झुकाये बैठा रहा कुछ नही बोला।
"भईया कैसा है" लड़की ने सिसकी दबाते हुए फिर पूछा। आदमी अब भी चुप ऐसे ही बैठा रहा ।
"हमारा घर, वो नीम का पेड़, मेरा झूला, गाँव की वो कच्ची कीचड़ से भरी गालियां,वो आम का बाग़ और बाबा वो मेरे सब दोस्त , सब कैसे है बाबा ?"  लड़की एक सांस में सब कुछ बोल गयी , मानो एक पल में सब कुछ जो पीछे छूट गया था उसे पाना चाहती हो जीना चाहती हो सब कुछ फिर से।
"बिट्टू मेरी बच्ची" आदमी ने उठ कर लड़की को गले से लगा लिया।

"आप यहाँ कैसे और क्यों आये है?" उसने डब बाई आँखों से देखते हुए कहा। 
"बिट्टू मैं तुम्हे लेने आया हूँ मेरी बच्ची।" आदमी ने सिसकी लेते हुए कहा।
"हरिपुर में लाला के बेटे की शादी में तुम्हे नाचते हुए देखा था। वहां बिरादरी की शर्म से कुछ ना कह सका बड़ी मुश्किल से पता ढूँढ़ते ढूँढ़ते आया हूँ बेटी मेरे साथ चलो घर।"

"बिरादरी की शर्म  ह्म्म्म....." इतना कहकर लड़की छत को घूरने लगी। 
"बिट्टू अब में तुझे यहाँ  से घर ले जाऊंगा।" आदमी ने उसके सर पर हाथ रखते हुए कहा।
"घर...... हुं.... घर..." कहते कहते लड़की की हिचकी बंध गई। थोड़ी देर बाद खुद को संभालते हुए उसने कहा "देखिये आप अच्छे घर के नैक इंसान मालूम पड़ते है। मुझे ऐसे बार बार मत छुइए आप अपवित्र हो जायेंगे। और शायद आप को कोई गलतफेमी हुई है। मैं कोई बिट्टू सिट्टू नही हूँ मैं मोहिनी हूँ।
"नही नही ऐसे मत कहो" आदमी ने तड़प कर कहा उसका हाथ पकडते हुए कहा।

"अभी तो तुमने मुझे बाबा कहा था।"
"वो शायद आप को रोता देख कर मेरे मुहँ से निकल गया।" उसने हाथ छुड़ाते हुए कहा।
"नही बेटी तुम मेरी बिट्टू ही हो अभी तुमने भईया को और सबको पूछा तुम मेरी बिट्टू ही हो।" आदमी ने लड़की का हाथ पकड़ते हुए बेचैनी से कहा।
"बेटी मुझे मेरी गलती की सजा मिल चुकी है। तेरी सौतेली माँ और भाई सब केदारनाथ में आई बाढ़ में बह गए मेरा अब तुम्हारे सिवा कोई नही है।" और वह घुटनों के बल जमीन पर बैठ गया।
"देखिये मैं आप को नही जानती आप यहाँ से चले जाइए वरना में धक्के देकर आप को यहाँ से निकलवा दूंगी आप एक शरीफ और अच्छे आदमी है आप की बेटी इस कोठे पर कैसे हो सकती है। आपा..... आपा...लड़की ने चिल्लाकर आवाज़ लगाई। एक साथ कई लड़कियां दौड़ी आई क्या हुआ मोहिनी, आपा इसे निकल दीजिये बड़ा बेहूदा इंसान है शायद पागल है मुझे अपनी बेटी बता रहा है।"
 आदमी रोता रहा गिड़गिड़ाता रहा पर मोहिनी या और लड़कियों ने एक न सुनी और उसे धक्के मार कर गली से बहार पटक आये। मोहिनी खिड़की से देखती रही। बीते 12 सालों की एक-एक बात उसके जहन में घूमने लगी।
"बाबा मुझे नही जाना इनके साथ ये मेरे सगे मामा नहीं है। माँ की बातों में मत आइये मैं सारे काम करूंगी सब बात मानूँगी आप की, मुझे इनके साथ मत भेजिए मैं आप की बेटी हूँ।  मैं बिट्टू हूँ आप की बिट्टू।"
"अरे देखा मुझे माँ नही समझती तो मेरे भाई को मामा कैसे समझेगी, मैं तो इसके भले के लिए ही भेज रही हूँ। शहर में रहेगी कुछ तौर तरीके सीख लेगी फिर किसी अच्छे घर इसकी शादी कर देंगे। बाकि आप की मर्जी वैसे सौतेली माँ की कौन सुनता है ।"
"चटाक...चटाक...  दो थप्पड़ गालो को लाल कर गए। चुपचाप चली जा तेरे भले के लिए ही भेज रहा हूँ मै। बाबा....बाबा........
"क्या हुआ मोहिनी ?" दीपा दौड़ी हुई आई । मोहिनी जैसे नींन्द से जाग गई।
"नही कुछ नही बस ऐसे ही  इस आदमी को देख कर कुछ भूली बाते याद आ गई " उसने बेड की चादर से आँसू पोछते हुए कहाँ।

क्यों दिल छोटा करती है। हम सब है न यहाँ और वो तो कोई सटका हुआ आदमी था। चला गया। और सुन तेरा चहेता कस्टमर आया है राकेश, भेज दूँ क्या ?" दीपा ने आँख मरते हुए कहा।
"हाँ भेज दें।"

ना जाना कि दुनिया से जाता है कोई। 
बहुत देर की मेहरबाँ आते आते।।
क़यामत भी आती थी हमराह उनके।
मगर रह गई हम-इना* आते आते।।


(लगाम, बंधी हुई, same rein, common bridle)



Sunday, October 2, 2016

मोहिनी (नाट्य रूपांतर )


                
पात्र: ५५ साल का अधेड़ आदमी, कोठे वाली आपा (गुलाबबाई), मोहिनी, दीपा, जुगनी, ३ चार लडकियां, शराबी आदमी (दलाल)

सूत्रधार :- (स्टेज पर सूत्रधार आता है। पुरे स्टेज पर अन्धकार है। केवल सूत्रधार के ऊपर ही प्रकाश है। सूत्रधार बोलता है।) आज हम आपके सामने एक ऐसा नाटक प्रस्तुत करने जा रहे है। जो सत्य घटना पर तो आधारित नही, परन्तु सत्य के बहुत करीब है। जो आधारित है। हमारे समाज की एक ऐसी डरावनी और काली सच्चाई पर जो आज भी खूब फूल फल रही है। जहाँ नारी केवल मनोरंजन का साधन मात्र है। केवल भोग की वस्तु है। जो हमारे बनवाटी समाज के झूठे रिश्तो और हमारी बीमार मानसिकता का प्रमाण है। तो पर्दा उठाते है उसी काली सच्चाई से। (इतना कहकर सूत्रधार अँधेरे में विलुप्त हो जाता है।)

                     (पहला दृश्य)

धीरे-धीरे पर्दा उठता है। स्टेज पर तवायफ के कोठे का सेट लगा है। शाम का समय है। कोठे पर मद्धम रौशनी है। नैपथ्य में कुछ फ़िल्मी गीतों की आवाज़ आ रही है। सामने ही एक तगड़ी सी औरत दीवान पर बैठी सरोते से छालिया (सुपारी) काट रही है। उसकी बगल में एक पानदान रखा है। कुछ लडकिया सजी धजी हाथो में अपनी चोटिया घूमाते इठलाती इधर से उधर घूम रही है। गलियो में राहगीर आ जा रहे है और लडकिया उन्हें अश्लील इशारे कर रही है।
स्टेज पर एक अधेड़ आदमी का प्रवेश होता है। उसने सफेद धोती और कुरता पहना रखा है। लडकिया उसे देखकर खिलखिला कर हंसती है। आदमी थोड़ा सा सहमकर इधर उधर देखता है। और लडकियो से पूछता है। 

अधेड़ आदमी - बी/१६३ ये ही है?

लडकियाँ (खिलखिलाकर)- डाकिया है क्या ?

अधेड़ आदमी - नही डाकिया नही हूँ पर मुझे बी/१६३ पर जाना है। (आदमी थोड़ा सा सकपकाकर बोलता है)
लडकियाँ (एक साथ बोलती है।) - डर मत तू सही जगह पर आया है। 

आपा- (गुलाबबाई जो दूर से ही इनकी बात सुन रही थी)- ऐ क्यों ग्राहक का टाइम खोटी करती हो, आने दो। आओ साहब (हाथ से इशारा करती है।) बोलो कौन सी चाहिए। सामने खड़ी लड़कियों की तरफ इशारा करके पूछती है। 

आदमी - जी मुझे मोहिनी चाहिए।

आपा - (आश्चर्य से घूरते हुए) तू पहले तो कभी नही आया यहाँ, फिर मोहिनी को कैसे जनता है?

अधेड़ आदमी - जी दोस्तों से काफी नाम सुना है, उन्ही से पता पूछ कर आया हूँ। 

आपा - (मुस्कुराते हुए लड़कियों की तरफ हाथ करके) देखा इसलिए मैं मोहिनी को तुम सब से जायदा प्यार करती हूँ। ग्राहक जाकर तारीफ करते है उसकी। सीखो कुछ हराम खोरो। (फिर आदमी की तरफ देख कर बोलती है) सारी साहब पर मोहिनी नही मिल सकती इस बख़्त। 

अधेड़ आदमी - पर मुझे तो मोहिनी ही चाहिए। 
आपा - पर साहब ये सब भी तो काफी अच्छी है। इनमे से ले जाओ कोई। देखो वो सनम है। कमाल की लड़की है उसे ले जाओ। 

अधेड़ आदमी - (थोडे उतावले पन से) आप समझ नही रही मुझे मोहिनी ही चाहिए। 

आपा - (थोड़े से तल्ख़ अंदाज में) - देखो बाबू मोहिनी अभी ग्राहक के साथ बिजी है। वो नही मिल सकती। ज्यादा आग लगी है तो इनमें से कोई भी ले जा।" (कतार में खड़ी लड़कियों की तरफ इशारा करते हुए कहती है।)

अधेड़ आदमी- (बैचेन सा होकर) नही, मुझे मोहिनी ही चाहिए।
आपा - (गुस्से से झल्लाकर) ऐ! ऐड़ा है क्या, बात समझ में नही आती तेरी, बोला न मोहिनी बिजी है। और सुन और कोई नही चाहिए तो फूट यहाँ से"

आदमी - (थोडी सी हठधर्मी के साथ) नही में बिना मिले नही 
जाऊँगा। (और वो ढीट बनकर वही बैठ गया।)

आपा - (गुस्से से खड़ी हो जाती है। और चुटकी बजाते हुए कहती है) "हेल्लो...... ज्यादा अन्ना हज़ारे बनने की कोशिश ना कर वरना ऐसी मार पड़ेगी के बाबा को तो स्त्री के कपडे भी नसीब हो गए थे। तुझे नंगा ही भागना पड़ेगा। हरामी साला....। धंधा तो पहले ही मंदा है ऊपर से ये ऐसे ढीठ ग्राहक सालो ने दिमाग का कश्मीर बना के रख दिया।"

अधेड़ आदमी - (आपा की बातो को अनसुना करके ढीटता के साथ) अगर आप मुझे मोहिनी से मिलवा देगी तो मैं 1000 दे सकता हूँ। सोच लो ।

आपा- (गुस्से से थोड़ी तेज़ आवाज़ में) ओये सुन बे दल्ले साले हम यहाँ जिस्म बेचते है। हमारे भी कुछ कायदे-कानून है। ईमान खरीदना है तो बराबर में पुलिस स्टेशन है वहाँ जा समझा। और तू एक बात तो बता इतना पागल क्यों है तू मोहिनी के पीछे ऐसा क्या है उसमें जो इन सब में नही है। (पास खड़ी लड़कियों की तरफ देखते हुए कहती है।)

अधेड़ आदमी - आप जैसा समझ रही है ऐसा कुछ नही है मुझे कोई गलत काम नही करना है। बस में तो सिर्फ एक बार उस से मिलना चाहता हूँ।

आपा - (हा...हा...हा... पान से लाल दांतो को दिखाते हुए बेहूदा सा ठहाका मारती है।) साले हरामी तू..नेता है क्या? जो वोट से पहले ही मदद करना चाहता है। और वो भी पैसे देकर।

अधेड़ आदमी - (थोड़ा सा शर्मिदा होकर) देखिये आप मुझे गलत समझ रही है मैं ऐसा नही हूँ। मैं शरीफ आदमी हूँ।

आपा - (हुंन.न..न.. गहरी सांस लेकर पान की पिचकारी पास रखे थूकदान में मारते हुए) सारे शरीफजादे रंडियों के कोठो और संसद में ही तो आते है। भाग साले नोटंकी कही का। और हाँ एक बात तो बता तुझे जब कुछ करना नही तो मिलना क्यों है? काम क्या है मोहिनी से?"

अधेड़ आदमी - (हकलाते हुए) जी वो...वो....कुछ बात करनी है उसने हकलाते हुए कहा।"
आपा- (हाथ की ऊँगली हिलाते हुए) अच्छा देख अब यहाँ से फूट जा कल्टी मार वरना लड़कियों से बोल कर तेरा वो हाल करुँगी के सारी उम्र याद रखेगा। 
अधेड़ आदमी औरत की बात सुनकर चुपचाप वहां से चला जाता है। हरामी पता नही कहाँ-कहाँ से आ जाते है। नामुराद बोहनी के टाइम दिमाग की दही कर दी आपा के बड़बड़ाने की आवाज़ आती है। अब स्टेज पर धीरे धीरे अंधकार होने लगता है। और अन्धकार से सूत्रधार की आवाज़ उभरती है। 


सूत्रधार - कौन था ये आदमी, जो इस उम्र में भी इन बदनाम गलियो में अपनी हवस का बोझ लिए घूम रहा है। क्या वो कोई समाज सेवक था। जो मोहिनी को इस जहन्नुम से आजाद कराना चाहता है। या हवस की आग में जलता कोई ग्राहक जिसे सिर्फ मोहिनी ही चाहिए थी। आये देखते है।
                            
                    (दूसरा दृश्य)

स्टेज पर धीरे धीरे रौशनी होने लगती है। सामने गली के नुक्कड़ पर एक चाय के ठेले के पर वो ही अधेड़ आदमी हाथ में चाय का कप लिए बैठा है। और गुलाब बाई के कोठे की तरफ देख रहा है। नेपथ्य में फ़िल्मी गानो की आवाज़ आ रही है। एक शराबी किस्म का आदमी अधेड़ के पास आता है। 
शराबी आदमी - (अधेड़ की तरफ आँख मरते हुए) क्यों साहब मोहिनी पर दिल आ गया क्या? खैर आपकी ही क्या गलती मोहिनी माल ही ऐसा है। मुलाकात हुई या नही। (खिलखिलाकर भँवरे मटकाता है।)

अधेड़ आदमी - आप कौन हो और आप को कैसे पता की मुझे मोहिनी से मिलना है। 

शराबी आदमी - (ठहाका लगते हुए) मैं इन बदनाम गलियो का ठेकेदार हूँ। मोहिनी से मिलना है है तो एक ५०० सो का हरा पत्ता निकाल। 

अधेड़ आदमी - (उसकी तरफ बेयक़ीनी से देखते हुए) तुम दलाल हो? 

शराबी आदमी - (खिस्यानी सी हंसी के साथ) बाबु तमाशा देखना है तो पैसे निकाल। मैं कौन हूँ ये छोड़। 

अधेड़ आदमी - (चाय का कप रखते हुए) ठीक है पहले मिलवाओ फिर पैसे दूंगा। 

शराबी आदमी - देख बाबु ये धंधा गन्दा जरूर है। पऱ यहाँ जिस्म के साथ जुबान का भी मोल है। कह दिया मिलवा दूंगा तो मिलवाऊंगा समझे। 

अधेड़ आदमी - (जेब में हाथ डालकर पैसे निकालने लगता है।) ये लो। 

शराबी आदमी - (500 का नोट चूम कर जेब में रख लेता है) देख बाबु अपने रिस्क पर तुझे गुलाबो के कोठे पर दोबारा ले जा रहा हूँ। कोई गड़बड़ की तो समझ लेना यहाँ इज़्ज़त का कोई मोल नही। 

अधेड़ आदमी- पता है मुझे ।

और चुप-चाप उस दलाल के साथ चल देता है। अब प्रकाश उन पर से हटकर स्टेज के दूसरी और चला जाता है। जहाँ गुलाब बाई का कोठा है। कोठा पहले की तरह ही है। दोनों आदमी अंदर दाखिल होते है। 

शराबी आदमी - (जबरदस्ती से मुस्कुराते हुए) आपा क्या हाल चाल। 

आपा - (शराबी के साथ अधेड़ को देखकर कुछ गुस्से में) साले हलकट तू फिर ले आया इस सनकी को। 

शराबी आदमी - अरे आप क्यों काम के टाइम दिमाग को परेशान कर रही है। (धीरे से कान के पास जाकर) मोटी चिड़िया है फंसा लो, एक बार मोहिनी का चस्का लग गया न तो सोने की मुर्गी साबित होगा। जमीन जायदाद सब लुटा देगा। 

आपा - (शराबी की बातो से थोड़ी सी प्रभावित होकर अधेड़ से) देखो बाबु वैसे तो जिसे हम एक बार अपनी दहलीज से दुत्कार देते है। उसे फिर दुबारा फटकने नही देते। पर जब ये मुआ (शराबी की तरफ देखकर) आप को दोबारा ले ही आया तो आ जाओ। पर मोहिनी अभी भी व्यस्त है। 

अधेड़ आदमी - देखिये मुझे मोहिनी ही चाहिए। और मुझे कोई गलत काम नही करना बस मैं उसे देखना चाहता हूँ बाते करना चाहता हूँ उससे।

आपा- (थोड़ा सा मुस्कुराकर) शर्माओ नही यहाँ शर्म नही रहती, और तेरे जैसे खूसट यहाँ बात करने के हज़ारो रुपाये नही लुटाते। 


अधेड़ आदमी - देखिये में ओरो की तरह नही हूँ। 

आपा - (फिर से गुस्से से तन तनाकर) देख सुन बे तू जो भी है सही-सही बता दे अब, नही तो अपनी तशरीफ़ लेकर दफा हो जा यहाँ से मुझे गुस्सा आ गया तो, तेरा ऐसा हाल करूंगी की रेलगाड़ियों में बधाई मांगता फिरेगा। ये कोठा है कोई मोबाइल बूथ नही कि बात करनी है। 

अधेड़ आदमी - (थोड़ा सा घबराकर) देखिये बहन जी आप मिलवाने के पैसे लेती है ना, तो आप मेहरबानी करके उस से मिलावा दे। मैं आप को जितना टाइम उसके साथ रहूँगा उसके पैसे दूँगा।

आपा - (थोड़ा सा चिढ़कर) ओये बिन बरसात के मेंढक बहन होगी तेरी माँ, पर ये बात तूने सही कही कि हम अपने वक़्त के पैसे लेते है। चल ठीक है। ढिल्ले मिलवाती हूँ। पर एक बात कान खोल कर सुन ले अगर तुने कोई चालाकी की या तू कोई फालतू का समाजसेवी निकला तो मेरे से बुरा कोई नही होगा। मुझे कोई लफड़ा नही मांगता मेरे कोठे पर। (अधेड़ के साथ साथ शराबी आदमी की तरफ भी ऊँगली घुमाकर आँखों में आँखे डालते हुए कहती है।)
अधेड़ आदमी - (खुश होकर) जी...जी.. ऐसा कुछ नही है। आप निश्चिन्त रहे।
आपा - (एक लड़की को आवाज़ लगाकर) ऐ..... दीपा देख तो मोहिनी फ्री हुई या नही, फ्री हो तो बोल के तुझसे देवदास मिलने आया है। हा..हा..हा..हा। साला हलकट। (पान का बीड़ा गाल में दबाते हुए ठहाका मारती है)

(एक लड़की जिसका नाम दीपा है। मटकते हुए छम छम करती और तिरछी नज़रो से आदमी को घूरते हुए कमरे से बाहर चली जाती है। आदमी चुप-चाप ऐसे ही खड़ा रहता है। थोड़ी देर बाद वो ही लड़की अंदर आती है।)

दीपा - आपा........  फ्री है। पर कह रही है। कि अभी थकी हुई है। सांस ठिकाने आने दे जब ही कोई नया मुर्गा भेजना।
आपा - ह्म्म्म.. ठीक है ठीक है। जा जाकर कोई ग्राहक फंसा सुबह से तेरी बोहनी नही हुई दीपा। बहुत ठंडी जा रही है तू आजकल। (लड़की को फटकारते हुए से लहज़े में कहती है)

आपा- (अधेड़ आदमी से) "दस मिलट रुक बे! मिलवाती हूँ। तब तक १००० रुपए दिल से जुदा कर। 

(आदमी चुपचाप अपने बटुए से ५००-५०० के दो  नोट निकाल कर औरत के हाथ पर रख देता है। शराबी आदमी आपा की तरफ देखता। आपा उसका आशय समझ जाती है और एक सो का नोट उसे पकड़ा देती है। शराबी खुश होकर दीपा के साथ मुस्कुराता हुआ वहां से बहार चला जाता है।) 
कमरे में केवल गुलाब बाई (आपा) और अधेड़ आदमी ही रह जाते है।)
आपा- पानी पियेगा या कुछ ठंडा मंगाऊँ।"
अधेड़ आदमी - (थोड़ा सकपकाते हुए) जी..जी नही.. कुछ नही शुक्रिया।
आपा- डर मत इस मेहमान नवाजी के हम पैसे नही लेते। (और आवाज़ लगाती है) जुगनी..... दो पेप्सी लाना ठंडी सी।

(दूसरे कमरे से मेकअप से पुते चेहरे वाली एक लड़की जिसका नाम जुगनी है। ट्रे में दो पेप्सी की बोतल रखे हुए अंदर आती है।)

जुगनी - (कोल्डड्रिंक की बोतल देते हुए) आपा मोहिनी ने कहा है कि वो अब ठीक है। कस्टमर को भेज दे।

आपा- (आदमी की तरफ कोल्ड्रिंक की बोतल बढ़ाते हुए) जाओ जी आप की मुलाकात का वक़्त आ गया। यहाँ से तीसरा कमरा मोहिनी का ही है। ये पेप्सी भी वही जाकर पी लेना। और सुन एक बार फिर कह रही है कुछ गड़बड़ नही चाहिए मुझे समझ लेना वरना नाम गुलाबबाई जरूर है पर में गुलाब जैसी हूँ नही। (धमकी भरे अंदाज़ में आदमी को सिर से पांव तक ताड़ती है)

अधेड़ आदमी - जी बेफिक्र रहिये।

(आदमी धीरे धीरे दूसरी तरफ चल देता है। स्टेज पर अँधेरा होने लगता है। नेपथ्य में गानो की आवाज़ आती रहती है। एक बार फिर सूत्र धार की आवाज़ आती है।)

सूत्रधार- आखिर इस अधेड़ का मसला क्या है। क्यों ये मोहिनी (जिसे इसने पहले देखा तक नही बस दोस्तों से नाम ही सुना है) मिलने के लिए इतना बेकरार है। क्या गुलाबबाई का शक सही है। कि ये कोई समाज सेवक है। या ये कोई बहरूपिया है। जो मोहिनी के बहाने अपना कोई हित साधना चाहता है। आये देखते है आखिर इस आदमी का सच क्या है। और कौन है मोहिनी।
                       
                    (अंतिम दृश्य)

स्टेज पर मद्धम सी रौशनी हो जाती है। अधेड़ आदमी एक दरवाजे के सामने खड़ा है। 

अधेड़ आदमी (ठक-ठक...दरवाज़ा खट खटाता)अं दर से एक चटकीली सी आवाज आती है। ज्यादा शरीफ ना बन अंदर आ जा दरवाज़ा खुला है। अधेड़ आदमी दरवाज़ा खोल कर अंदर चला जाता है। पूरा कमरा बीड़ी के धुंए से भरा हुआ है। सामने एक बेड पड़ा था और उस पर सिलवटों भरी एक मटमैली सी चादर बिछी है। बेड के बगल में कुर्सी पर लगभग 26-27 साल की लड़की जिसका नाम मोहिनी है वो बैठी है और अपने मुहँ से भट्टे की चिमनी की तरह धुंआ निकाल रही। कमरे में कम रौशनी और धुएं के कारण लड़की का चेहरा साफ़ नज़र नही आ रहा है। अधेड़ आदमी धीरे से दरवाजा बंद करता है। और लड़की की तरफ बढ़ता है।

मोहिनी - (हाथ से रुकने का इशारा करते हुए) रुक जा इतनी भी क्या गर्मी चढ़ी है थोड़ा सब्र रख बीड़ी तो आराम से पीने दे। तू भी पियेगा क्या?

अधेड़ आदमी कुछ नही बोलता है चुप-चाप आराम से बेड के एक कोने पर बैठ जाता है। 

मोहिनी- (आदमी के हाव-भाव और क़द काठी देखकर बोलती है) इस उम्र में भी गर्मी नही गई तेरी। 

(आदमी अब भी कुछ नही बोलता है।)
मोहिनी- बीड़ी को जमीन पर फेंकती है और कुर्सी से उठकर पास से एक कंडोम का पैकिट उठाकर आदमी के ऊपर फेंकती है) चल अब ज्यादा टाइम कल्टी ना कर काम पे लग जा और भी कस्टमर है मेरे।
अधेड़ आदमी-(रोते हुए सिसकी भरी आवाज में) बि..ट... बिट्टू....।
कुछ देर के लिए कमरे में सन्नाटा हो जाता है। सांस लेने की भी आवाज़ नही आती। 

मोहिनी- (चोंककर जल्दी से कमरे की खिड़की खोल देती है। और पास जाकर बोलती है।) कौन हो तुम? और अधेड़ का चेहरा फटी आँखों से देखते हुए जमीन पर ढह जाती। कमरे में फिर कुछ देर के लिए सन्नाटा हो जाता है। अब मोहिनी धीरे धीरे अपने बेतरतीब कपड़ो को सही करते हुए। जमीन से उठती है। आदमी पागलो की तरह मोहिनी को देख रहा है।

मोहिनी- (सिसकी भरी आवाज़ में) बाबा तुम ।

इतना सुनते ही आदमी दहाड़े मार-मार कर रोने लगता है। लड़की जिसका नाम कुछ देर पहले तक मोहिनी था और जो बड़ी बेशर्मी से बक बक कर रही थी बहते आंसू और पथराई नजरो से उस आदमी को देखती रहती है। कुछ देर तक दोनों एक दूसरे को देखते रहे और रोते रहे। फिर मोहिनी बोलती है।
मोहिनी- (हाथो से आंसू पूछते हुए) आज अचानक यहाँ क्यों, कैसे?"
अधेड़ आदमी गर्दन झुकाये बैठा रहता कुछ नही बोला।
मोहिनी- (सिसकी दबाते हुए एक सांस में बोलती है) भैय्या कैसा है? हमारा घर, वो नीम का पेड़, मेरा झूला, गाँव की वो कच्ची कीचड़ से भरी गालियां, वो आम का बाग़ और बाबा वो मेरे सब दोस्त, सब कैसे है बाबा?"
अधेड़ आदमी- (मोहिनी के पास आकर) मेरी बच्ची तू कैसी है?

मोहिनी- (अधेड़ आदमी की बात काटते हुए डब डबाई आँखों से) आप यहाँ इतने सालों के बाद कैसे और क्यों आये है? 

अधेड़ आदमी- (सिसकी भरते हुए) मैं तुम्हे लेने आया हूँ मेरी बच्ची। पिछले महीने हरिपुर में लाला के बेटे की शादी में तुम्हे नाचते हुए देखा था। वहां बिरादरी की शर्म से कुछ ना कह सका बड़ी मुश्किल से तेरा पता ढूँढ़ते ढूँढ़ते आया हूँ बेटी मेरे साथ घर चलो।

मोहिनी- (आदमी की तरफ देखते हुए) बिरादरी की शर्म  ह्म्म्म.....।

अधेड़ आदमी- (मोहिनी के सर पर हाथ रखते हुए) अब में तुझे यहाँ  से घर ले जाऊंगा बेटी।

मोहिनी- (तिरिस्कार भरी नजरों से आदमी को देखते हुए) घर...... हुं.... घर...(कहते कहते रोने लगती है)

आदमी बेबस सा मोहिनी की तरफ देखता रहता है। और उसके कंधों पर हाथ रख देता है।
मोहिनी- (आदमी की तरफ से मुंह फेरकर) देखिये आप अच्छे घर के नैक इंसान मालूम पड़ते है। मुझे ऐसे बार बार मत छुइए आप अपवित्र हो जायेंगे। और शायद आप को कोई गलतफेमी हुई है। मैं कोई बिट्टू सिट्टू नही हूँ मैं मोहिनी हूँ।

अधेड़ आदमी - (एकदम सकपका कर) नही नही ऐसे मत कहो बेटी, अभी तो तुमने मुझे बाबा कहा था।

मोहिनी- वो शायद आप को रोता देख कर मेरे मुहँ से निकल गया।
अधेड़ आदमी- (तड़पकर बेचैनी से) नही बेटी तुम मेरी बिट्टू ही हो अभी तुमने भईया को और सबको पूछा था। तुम मेरी बिट्टू ही हो। बेटी मुझे मेरी गलती की सजा मिल चुकी है। तेरी सौतेली माँ और भाई सब के सब केदारनाथ में आई बाढ़ में बह गए मेरा अब तुम्हारे सिवा कोई नही है। (और वह घुटनों के बल जमीन पर बैठ जाता है)

मोहिनी- (सपाट लहजे में) देखिये मैं आप को नही जानती आप यहाँ से चले जाइए वरना में धक्के देकर आप को यहाँ से निकलवा दूंगी आप एक शरीफ और अच्छे आदमी है आप की बेटी इस कोठे पर कैसे हो सकती है। (और चिल्लाने लगती है)
मोहिनी- आपा..... आपा...

एक साथ कई लड़कियां और गुलाबबाई (आपा) दौड़ीती हुई आती है।

आपा- (जमीन पर घुटने के बल बैठे अधेड़ की तरफ देखते हुए) क्या हुआ मोहिनी?

मोहिनी- (आदमी की तरफ ऊँगली से इशारा करते हुए) आपा इसे निकल दीजिये बड़ा बेहूदा इंसान है शायद पागल है मुझे अपनी बेटी बता रहा है।
आपा- (गुस्से से) साले हरामी मैं तुझसे पहले ही बोली थी कि कोई लफड़ा नही करना । पर तू माना नही। ऐ लड़कियों फेंक दो उठाकर इसे बहार। और अगर आइंदा इधर नज़र भी आये तो साले के कपडे फाड़ कर नंगा कर देना।

लडकिया अधेड़ को घसीटते हुए कमरे से बहार ले जाती है। आदमी बिट्टू मेरी बच्ची, बिट्टू…बिट्टू चिल्लाता रहता है। सब लडकिया और आपा स्टेज से चली जाती है। और मोहिनी बेदम सी वही बैठ जाती है। और रोते हुए बोलने लगती है।
मोहिनी- बाबा जब मुझे सौतेली माँ अपने भाई के साथ शहर भेज रही थी। मैं भी ऐसे ही बाबा..बाबा चिल्ला रही थी। काश! आपने उस दिन मेरी बात सुनी होती, काश! आपने उस दिन माँ की बात न सुनकर मुझे रोक लिया होता। तो आज आप की बिट्टू यूँ इन बदनाम गलियों की जीनत नही बनते। अब मै आप के साथ कैसे जा सकती हूं। अब बहुत देर से आये है बाबा काश आप पहले आ जाते। अब तो आप की बिट्टू मर चुकी है यहाँ अब बिट्टू नही सिर्फ मोहिनी है। और दहाड़े मार मार कर रोने लगती है। स्टेज पर धीरे धीरे अँधेरा होने लगता है।

और सूत्रधार की आवाज आती है।
ना जाना कि दुनिया से जाता है कोई। 
बहुत देर की मेहरबाँ आते आते।।
क़यामत भी आती थी हमराह उनके।
मगर रह गई हम-इना* आते आते।।

और पर्दा गिर जाता है।


हमसफ़र

"अम्मी क्यों ? आप खामा खा इतनी परेशान होती है। हो जाएगी मेरी शादी आप टेंशन न ले...। "अरे बेटी क्यों न लूँ टेंशन तेरी उम्र  की सब लडकियाँ अपने घर-बार की हो गई है। ओर बेटी  मैं तो माँ हूँ। मुझे फ़िक्र होती है। अल्लाह करे कल तुम उन्हें पसन्द आ जाए तो मैं शुकर की नमाज़ पढूंगी।" जैनब ने लंबी सांस लेते हुए कहा।
"बहुत मज़ा आता है आप को मेरी नुमाइश लगाते हुए।" उसने गुस्से से कहा।
"नुमाइश कैसी पगली ये तो रिवाज़ है और अच्छा ही तो है मिलकर पहले ही सारे मामले तय हो जाये बाद में कोई परेशानी नही होती है।"
"तो लगाती रहिये हर आठवे दिन मेरी नुमाइश जानवरो की तरह, कोई पूछेगी जरा चलके दिखाना ?  कोई बोलेगी,बाल खुले रखती हो या चोटी बनाती हो बेटी ? कमीनी सीधे ही पूछ ले बाल कितने लम्बे है। ऊपर से खाने पीने की चीज़ों पर नदीदो की तरह ऐसे टूटते है मानो कई दिन के भूखे है।" 
"बेटा ये सब करना पड़ता है और अब तुम इतनी भी जाहिल ना बनो।" 
"पर अम्मी आप को पता है इन रोज़-रोज़ के चक्करो में पूरे महीने का बजट गड़बड़ा जाता है। अब्बू की मुक्तसर तनख्वाह है। और पुरे महीने मैं देखती हूँ आप कैसे हलकान होती है एक-एक चीज़ के लिए...... ।" "रिदा गलत बात है बेटा ऐसे नाशुक्री नही भेजते अल्लाह का शुकर है दो वक़्त अच्छी रोटी खाते है।" 
"हाँ पता है मुझे, सब कुछ होने के बाद बात दहेज़ पर आ जाती है " उसने गुस्से से मुंह बनाते हुए कहा।
"अच्छा अपना ज्यादा खून न जला सब लोग बुरे नही होते अच्छे लोग भी दुनिया में है बेटा जो दहेज़ को तवज्जो नही देते।
 "ये जिन्हें आप अच्छे लोग कहती है न बस किस्से कहानियो में  ही मिलते है" 
"अच्छा बस अब ख़त्म कर अपनी ये बेहुदा तक़रीर,शकीला बोल रही थी के वे लोग सुबह जल्दी आएंगे। जाकर कुछ तैयारी कर ले और घर की साफ़-सफाई भी अच्छे से कर लेना।"
"ये शकीला खाला तो किसी दिन मरेगी मेरे हाथ से। ये ही लाती है रोज़-रोज़ नये रिश्ते, चटोरी कही की।"  "तौबा है रिदा शर्म करो बड़ी है वो तुम्हारी,जाओ अब यहाँ से जो मुंह में आता है बके जाती है।"

मुस्तकीम मियां डाकघर में बाबू  है। रिदा, सदफ फिर अली और आलम दो लड़की और दो लड़के चार औलाद है सब पढाई में मसरूफ है। रिदा सबसे बड़ी है अभी बी ए से फारिग हुई है और जैनब को उसकी शादी की फिक्र हो गई वैसे भी लोअर मिडिल क्लास में लड़कियों की शादी हमेशा से बड़ा मशलाह होता है। रिदा जॉब करना चाहती थी पर अम्मी को उसकी शादी की जिद्द है।  इसीलिये आये दिन कोई न कोई रिश्ता आता ही रहता है। और रिदा इन सब से परेशान हो जाती है।

"बाज़ी हमे आप की लड़की माशाल्लाह बहुत पसन्द है। एक मोटी सी खातून जो लड़के की माँ थी उसने समोसे को चटनी में डुबकी लगवाते हुए कहा।  "कमीनी तेरे से दस साल छोटी होगी मेरी अम्मी आयी कही से बाजी.......कहने वाली।" रिदा ने दिल ही दिल में दांत पीसते हुए कहा। "देखिये बाजी बस अच्छी शक्लो सूरत से तो घर नही चलता और भी बहुत कुछ  होता है जैसे खाना बनाना,कपडे धुलना सिलाई कढ़ाई वगैरह ये सब तो कर लेती हो न बेटा? अम्मी से मुखातिब होते हुए एक दूसरी खातून (जो लड़के की फुफ्फ़ो थी) ने मुझसे सवाल किया। "दिल तो किया बोल दूँ की बहु ढूंढ रही हो या नोकरानी पर अम्मी की आँखों ही आँखों में धमकी देख कर मैंने हाँ में गर्दन हिला दी।" "माशाल्लाह बहुत खूब मुझे अपने राहिल के लिए ऐसी ही बीवी चाहिए थी। बाजी हमारी तरफ से रिश्ता पक्का समझो बाकि अब आप के हाथ में है।" मोटी ने काजू कतली पर हाथ साफ़ करते हुए कहा।

"और राबिया माशाल्लाह हमारी रिदा ने बी.ए. भी किया है।" शकीला खाला जो अब-तक बस कोल्डड्रिंक और बाकि खाने की चीज़ों में ही मसरूफ थी पहली बार बोली और मुझे उनकी ये बात अच्छी लगी चलो कुछ तो ढंग की बात की इन्होंने मेरे बारे में। "देखिये जी हमे नौकरी तो करानी नही पढ़ी लिखी है सही है  पर अनपढ़ भी होती तो हमे कोई फर्क नही पड़ता हमे तो बस एक सलीकेमन्द बहु चाहिए। मोटी जिसका नाम अभी-अभी मुझे पता लगा कि राबिया है ने एक ही सांस में कोलड्रिंक के गिलास को गटकते हुए कहा।"
"दिल तो किया की मोटी के बाल नोच लू पर तहज़ीब और तरबियत आड़े आ गई।" अम्मी तो जैसे निहाल ही हुई जा रही थी उनकी तो दिली मुराद पूरी हो रही थी। "जी बहुत शुक्रिया आप ने हमारी बेटी को अपने घर की बहु बनने के काबिल समझा पर अगर सब कुछ तय करने से पहले लेन- देन की बात भी कर ले तो मैं समझती हूँ बेहतर रहेगा। वैसे तो अल्लाह के करम से हम से जो बन सकेगा हम देंगे पर फिर भी अगर आप की कोई ख्वाईश हो तो बताइये।" अम्मी ने मसनवी अपनी तरफ से दहेज़ की बात की। "देखिये बाज़ी हमारा राहिल माशाल्लाह बैंक में मैनेजर है। और हमारे घर में किसी भी चीज़ की कमी नही बस हमे तो आप की बेटी चाहिए बाकि जो भी आप अपनी बेटी और दामाद को देना चाहे हमे कोई मसला नही। " मुझे तो लगा था कि मोटी जरूर लंबी सी लिस्ट बना कर लायी होगी पर उसकी बात सुनकर मुझे यकीन नही हुआ और खुद अपनी सोच पर नदामत भी हुई।  क़ि मैं खामा खा इनके बारे में अनाप सनाप सोचे जा रही थी "
"अच्छा तो ठीक है अब आप लोग मशवरा कर के हमे खबर कर दीजियेगा  मेरी होने वाली सास ने बड़ी मुहब्बत से मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा। और बस अब इज़ाज़त दीजिये। अरे बातो-बातो में, मैं तो भूल ही गई अगर आप को ऐतराज़ न हो तो क्या में बच्ची की एक फोटो खींच लू ? "जी.......  जी क्यों नही" अम्मी से पहले शकीला खाला बोल पड़ी और उसने खटाक से मेरी फोटो अपने फोन में कैद कर ली।

अब्बू और चाचू ने लड़के और उसके घर वालो के बारे में काफी तहकीकात की और सब कुछ पसंद आने पर एक महीने बाद की शादी तय कर दी।  अब्बू ने कुछ अपने फण्ड और कुछ क़र्ज़ लेकर शादी की तैयारी शुरू कर दी लड़के वालो की तरफ से बस एक मांग थी कि शादी किसी अच्छे से मेर्रिज हाल में हो और खाने का इंतज़ाम भी अच्छा हो जो की कोई बड़ा मशला नही था। अम्मी और अब्बू ने अपनी हैसियत से बढ़ कर सब तैयारी की थी और वो मुतमईन थे कि चलो सब अच्छे से निपट जायेगा। पर अगर सब कुछ इतना आसान हो तो ज़िन्दगी इतनी मुश्किल न हो।

शादी से तीन  दिन पहले शकील खाला एक तूफ़ान लेकर आई  लड़के वालो ने कहलवाया था कि उन्हें कार चाहिए थी दहेज में। इस खबर ने हम सब के होश उडा दिए खुशी का माहौल पल में मातम में बदल गया। अब्बू की हालत बहुत बुरी थी जो कुछ था सब पहले ही खर्च कर दिया और अब जबकि शादी में तीन दिन बचे थे ये नामुमकिन सी मांग कैसे पूरी करेंगे। चाचू और अब्बू ने लड़के वालो से बात की पर उनका कहना था कि  उनका लड़का इतना काबिल है और समाज में उनकी काफी इज़्ज़त भी है अगर दहेज़ में कार  नही मिली तो उनकी क्या इज़्ज़त रह जाएगी। अब्बू ने काफी मिन्नतें की पर उन्होंने दो टूक लहजे में जवाब दे दिया कि अगर कार नही मिली तो वें बारात नही लाएंगे। बिरादरी में शादी के कार्ड बट चुके थे वक़्त पर बारात नही आई तो हमारी तो इज़्ज़त की धज्जिया  उड़ जाएँगी। अब्बू और अम्मी ये सोच सोच कर मरे जा रहे थे।

मेरी हालत ऐसी थी के काटो तो खून नही अब्बू और चाचू ने काफी भाग दौड़ की पर कुछ न हो सका आखिर थक हार कर घर को बेचने का फैसला किया गया। ये बात सुनकर मेरा मारने का दिल किया आज समझ में आया की लडकिया क्यों बोझ होती है क्यों उनकी पैदाइश पर लोग मातम करते है। मैंने अम्मी को साफ़ मना कर दिया।
"अम्मी मैं ये शादी नही करूँगी। मैं अपना घर बसाने के लिए अपने घर वालो के सिर से छत नही छीन सकती "
"पागल मत बनो रिदा अब्बू कुछ न कुछ  कर लेंगे बेटी।" "क्या कर लेंगे खुद को बेच देंगे।" आंसुओ का सेलाब था के रुकने का नाम ही नही ले रहा था।  फोन पर किये गए राहिल के बड़े बड़े वादे प्यार वफ़ा की बात सब तीर बनके दिल में चुभ रहे थे। "अम्मी में राहिल से बात करूँगी अभी " "पर.......  रिदा इस वक़्त.......  इतनी रात को और क्या बात करोगी बेटी तुम ? नही तुम परेशान न हो बेटी अल्लाह सब ठीक कर देगा अब्बू और चाचू लगे हुए है कुछ न कुछ हल जरूर निकल आयेगा।" "नही मुझे बात करनी है "  और राहिल का नंबर मिला दिया।  दूसरी  तरफ से कोई फ़ोन नही उठा रहा था उसने दोबारा ट्राई किया।
 हेल्लो.......  कौन....... रिदा तुम  क्या बात है इतनी रात को सब खैरियत "
"मुझे आप से शादी नही करनी आप बरात लेकर न आये हमारे यहाँ "
"यार ये कोई वक़्त है मज़ाक का हद करती हो तुम भी "
"मैं मज़ाक नही कर रही राहिल "
"क्या हुआ प्लीज मुझे बताओ तो सही क्यों ऐसी बहकी -बहकी बाते  कर रही हो। "
"अच्छा मैं बहकी बाते कर रही  हूँ और आपने क्या किया अगर कार मुझसे ज्यादा प्यारी थी तो पहले बताते ऐसे हमे दुनिया में जलील करने की क्या जरूरत थी। "
"कैसी कार क्या बोले जा रही हो  "
"ज्यादा भोले न बनिए आप को पता है मैं क्या बात कर रही हूँ।  वो ही कार जो अगर आप को हमने दहेज़ में न दी तो आप बारात नही लाएंगे।  जिसके लिए मेरे अब्बू हमारा घर बेच रहे है। " आँसुओ  के साथ सिसकी निकल गई। दूसरी तरफ सन्नाटा पसर गया। "तो बराए करम आप बारात न लाये। मुझे नही करनी आप से शादी" उसने मुश्किल से सिसकीयां रोकते हुए कहा।  दूसरी तरफ अब भी सन्नाटा था कोई जवाब नही और टू........ टू  की आवाज़ के साथ फ़ोन कट गया।


"अम्मी दहेज़ में कार की डिमांड आप ने की "
"क्या हुआ राहिल बेटा ?"
"अम्मी हाँ या ना में जवाब दीजिये आपने दहेज़ में कार की मांग की है या नही ? "
"हाँ की है और वें राजी भी है बेटा देने के लिए " राबिया बेगम ने खुश दिली से जवाब दिया।
"हाँ बहुत खुश है और इसी ख़ुशी में अपना घर बेच रहे है" उसने तन्ज़िया लहज़े में कहा।
"अम्मी क्या कमी है हमारे पास क्यों आपने उनसे कार की मांग की ?"
"बेटा तुम काबिल हो आला तालीम हो समाज में इज़्ज़त है तुम्हारी और हमने तुम्हारी परवरिश में कोई कमी भी तो नही की इस लिहाज़ से हमारे भी कुछ अरमान है "
"तो वो अरमान आप मुझसे पूरे कीजिये यूं  मेरा सौदा करके नही,आपने मुझे तालीम दी मुझे काबिल बनाया इसमें रिदा की फॅमिली का क्या फायदा सब के माँ बाप अपने बच्चो के लिए ये सब करते है। आप ने क्या नया किया अम्मी आप मुझे बोलो आप को क्या चाहिए, मैं आप को वो सब ला कर दूंगा ऐसे दहेज़ मांग कर आप किसी को मज़बूर नही कर सकती।"
"राहिल समझने की कोशिश करो बेटा समाज में हमारी इज़्ज़त है लोग क्या कहेंगे तुम्हारे दोस्त क्या बोलेंगे की राहिल को ससुराल से कुछ नही मिला। "
"अम्मी मुझे लोगो की परवाह नही वो क्या कहते है आप अभी रिदा के घर फोन करके उन्हें कहे की हमे कुछ नही चाहिए "
"मैं ऐसा नही करूँगी। और तुम्हे उनकी इतनी फिक्र है मेरे जज़्बातो की मेरी इज़्ज़त की मेरे अरमानो की कोई कदर नही राहिल "
अम्मी बात इज़्ज़त की नही इंसानियत की है आप ऐसे मुझे जज़्बाती होकर ब्लैकमेल न करे। और प्लीज इस तरह की बाते करके आप मुझे मेरी नज़रो में गिरा रही है। मुझे कार या दहेज़ नही एक हमसफ़र चाहिए जो मेरे दुःख सुख में मेरे अच्छे बुरे में मेरा साथ निभाए जो मेरी इज़्ज़त करे मेरे माँ बाप का अहतराम करे नाकि की किसी के अरमानो और मज़बूरी के सौदे में मिली कोई अदना सी चीज़। अगर आप ये काम नही कर सकती तो में खुद उन्हें फोन करता हूँ।"
"मुझे ये हरगिज़ मंज़ूर नही और अगर तुमने ऐसा किया तो मैं तुम्हारी शादी में शामिल नही हूँगी।  राबिया बेगम ने आखरी दांव चला "
"ठीक है जैसी आप की मर्ज़ी। " और राहिल ने फोन मिला दिया
"हेल्लो........ अस्सलाम वालेकुम मुस्तकीम अंकल में राहिल बोल रहा हूँ। आप बिलकुल फ़िक्र न करे हम टाइम से बारात लेकर आयेंगे और हमे कार या किसी भी चीज़ की कोई जरूररत नही बस आप शादी की तैयारी करे अल्लाह हाफिज।" और राबिया बेटे का मुंह ताकती रह गई।