Tuesday, March 1, 2016

सोचो..........

  रास्ते है,पर ना रहबर है ना कोई मंज़िल है।
  बस एक कारवाँ है। जो अंधेरो के हमराह है।
  उजाले सारे पीछे छूट गएँ हैं।
  सत्य, अहिंसा और इंसानियत सब से एक एक करके नाते टूट गएँ है।
  अब बाकि बस एक मंच है,उस पर भीड़ है। और सामने झूठ का परदा है।
  हर चेहरा पर सच का नकाब है। और नकाब पर थोड़ी-थोड़ी गर्दा है।
  शहरो में सन्नाटा और खेत-खलिहानों में मौत मंडराती है। 
  पीड़ा में आनन्द आने लगा। खुशियाँ इस महंगाई में खूब रुलाती  है। 
  हाँ पर पैसे, कुर्सी और पुरस्कार आजकल खूब इतराते है। 
  इनकी खातिर ज़िंदा मुर्दे और मुर्दा ज़िन्दे हो जाते हैं। 
  पर ये दुखड़ा किसे सुनाये ,किसे देश की हालत बताएं। 
प्रधान सेवक सब अपनी धुन में मस्त है, जनता भाड में जाये।
  राष्ट्वादी सब फेसबुक पर और देशभक्त सब ट्वीटर पर है। बाकि टीवी पर आते है। 
  कोई बचा ही नही। तो फिर सोचो ..... !
  मारो-मारो सड़को पर ये कौन चिल्लाते है ? 

Saturday, February 20, 2016

क़िस्त....

"बड़े बाबू नमस्कार।" ...... कोई जवाब नही। थूक निगल कर उसने फिर धीरे से कहा "देव....व..देवधर बाबू...... जी... नमस्कार"  देवधर बाबू कहने में वो पूरा काँप गया था। पर कोई जवाब नही। उसने थोड़ा और जोर से कांपती आवाज़ में कहा "प्रधान जी! नमस्कार..... " इस बार आराम कुर्सी पर बैठे देवधर ने उसकी तरफ उचटती सी नज़र डाली। कन्हैया ने खठ से दोनों हाथ जोड़ दिए। पर देवधर ने कोई प्रतिक्रिया नही दी। कमरे में एक बार फिर से सन्नाटा। कन्हैया हाथ जोड़े टकटकी लगाये देवधर के चहरे के भाव देखता रहा। पर उसे कोई उम्मीद की किरण नज़र नही आई। उसने फिर से अपने शरीर की पूरी ऊर्जा समेट कर कमर को थोड़ा और झुकाया ,सूखते होंठो को जीब से तर किया और गिड़गिड़ते हुए कहा "बड़े बाबू एक पखवाड़े से मजूरी नही मिली अगर........आज मिल जाये तो गरीब के चूल्हे का मुहं धुल जाये बड़ी मुश्किल चल रही है।"  कुछ वक़्त ऐसे ही गुज़र गया कोई जवाब नही। फिर देवधर ने कन्हैया को ऊपर से निचे तक देखा। पर जुबान को अब भी ज़हमत नही दी। कन्हैया अपने मटमैले चेहरे पर उधार की मुस्कान सजाये उम्मीद भरी नज़रो से उन्हें देखता रहा। उसे लगा शायद आज कुछ पैसे मिल जायेंगे।
"तुम्हे पता नही घर में शादी है।कितने काम अधूरे पड़े है और तुम्हे मज़दूरी की पड़ी है जाओ जाकर अपना काम करो कल मिल जाएंगी। देवधर ने रोबदार आवाज़ में हुडकी लगाते हुए कहा। कन्हैया लाचार नज़रो से उन्हें देखता रह गया। उसकी अब कुछ कहने की हिम्मत नही हुई।अपने झुके कंधो पर उम्मीद की लाश लेकर भारी कदमो के साथ दलान से बहार निकल गया।

कन्हैया ज्यादा पढ़ा लिखा नही था बस दो चार दर्ज़े ही पढ़ा था। उसका बाप गाँव के प्रधान के यहाँ काम करता था। उसकी मृत्यु के बाद कन्हैया वहां काम करने लगा था। मज़दूरी कभी हफ्ते भर में मिलती कभी पखवाड़े में मिल जाती। कुछ पक्का नही था। जब तक अकेला था कोई दिक्कत नही थी। पर जब से शादी की,परेशानी होने लगी,अकेला तो कैसे भी पेट भर लेता था। अब बीवी भी साथ में थी। अगला पिछला कुछ जोड़ कर नही रखा था। रोज़ का कमाना रोज़ का खाना था। कोई और आमदनी का साधन भी तो नही था। मजदूरी का ही सहारा था। इसीलिए परेशानी हो रही थी। वरना रघुराम भी तो उसी के साथ काम करता था। वो भी घर परिवार वाला था पर उसने दो भैंसे बांध रखी थी जिनका दूध बेचता था। राघुराम प्रधान के खेतों में मज़दूरी करता। उसकी जोरू कमला जंगल से घास लाती,गृहस्ती की गाडी मज़े में चल रही थी। घर में टीवी मोबेल सब थे। कन्हैया ने भी कई बार सोचा एक भैंस बांध ले पर पैसे कहाँ से लाये। खाने के ही लाले पड़े रहते है। पशुधन के लिए बैंक से क़र्ज़ मिलता था पर उसके लिए भी पहले बाबू लोग को राज़ी करो उन्हें भोग लगाओ तब जाकर कुछ काम बनता है। कई बार प्रधान जी से भी बोला था। बैंक में सिफारिश के लिए पर आजकल वें अपनी छोरी की शादी में व्यस्त है। किसी बात के लिए वक़्त ही कहा है उनके पास।

कन्हैया ने घर का दरवाज़ा खोला आँगन खाली था उसने चारो तरफ देखकर अपनी जोरू को आवाज़ दी "सुमरि........  अरी ओ..........  सुमरिया कहाँ हो जल्दी से बहार आ बड़ी तेज़ भूख लगी है।"  "क्या हुवा क्यों चिल्ला रहे हो" सुमरि ने जुभाई लेते हुए कहा।  " अरे पगली चिल्ला नही रहा तुझे पुकार रहा हूँ। कहाँ अंदर लेटी थी क्या? कन्हैया ने बड़े लाड से अंगड़ाई लेती सुमरि को देखते हुए पूछा।  " हाँ..आँख लग गई थी। चलो मुहं हाथ धो लो में खाना लाती हूँ।" उसने बिखरे बालो को बांधते हुए कहा।

" कुछ पैसे मिले ? सुमरि ने भात की कटोरी बढ़ाते हुए पूछा "
"नही..... कन्हैया ने थकी सी आवाज़ में सुमरि की तरफ देख कर जवाब दिया। "क्या बोले ? कुछ कहा तो होगा। कब देंगे ? "  सुमरि ने कन्हैया के चेहरे पर नज़र गड़ाते हुए पूछा। कन्हैया ने कोई जवाब नही दिया। चुपचाप दाल-भात खाता रहा। अपने मर्द को उदास और थकन से चूर देख सुमरि ने भी और कोई सवाल नही किया।चुपचाप झूठे बर्तन समेटे और आँगन में बिछावन लगाने लगी।

तारो से झिलमिलाते आसमान के नीचे कन्हैया और सुमरि एक चारपाई पर लेटे अपने अनमोल पलो को जी रहे थे। कन्हैया ने सुमरि का हाथ अपने हाथ में उलझा रखा था सुमरि भी होले-होले अपने हाथ से कन्हैया के सिर को प्यार से सहला रही थी।
"कन्हैया ऐसा कब तक चलेगा"
"कैसा...... ?"
"ऐसा ही जैसा चल रहा है "
जब तक तुम कहो सुमरि ...... मैं  तो सारी उम्र ऐसे ही तेरी बाँहो में पड़ा रहूँ। कन्हैया ने सुमरि की आँखों में झांकते हुए शरारत से कहा।
"मज़ाक नही....... मैं, हमारे हालात की बात कर रही हूँ। कब तक ऐसे ही गुजारा चलेगा ? किरयाने वाला भी उधारी देने में आना कानी करता है। ऊपर से अपनी गन्दी नज़र से ताड़ता है। सो अलग।" सुमरि ने चिंता भरी आवाज़ में कन्हैया की तरफ करवट बदल कर कहा। "प्रधान जी से बात की है मैंने अभी थोडा छोरी के ब्याह में उलझे है पर तू फिकर न कर कल मजूरी देने का बोला है सब की उधारी चूका देंगे।" कन्हैया ने सुमरि को अपनी बाँहो में खींचतें हुए कहा। चूड़ियों की खन-खन से आँगन गूंज उठा।  "मजूरी तो मिल जाएगी उसका क्या है। पर आगे की सोचो अभी तो हम दो है। कल परिवार भी बढ़ेगा ऐसे कैसे चलेगा।" सुमरि ने कन्हैया की छाती पर सिर रखे हुए कहा। "पगली... तू क्यों चिंता करती है मैं हूँ ना। मैने बैंक में बात की है क़र्ज़ के लिए बस प्रधान जी ब्याह से निपट ले फिर उनकी जमानत लेकर बैंक हमे क़र्ज़ दे देगा। एक भैंस ले लेंगे। मैं मजूरी करूंगा। तुम भैंस की टहल करना दूध बेचेंगे आमदनी बढ़ेगी तेरे लिए टीवी खरीदुंगा एक मोबेल लेंगे।" कन्हैया ने दूर आसमान में टिमटिमाते तारो को देखते हुए कहा " हा....  हा.......  हा....  हा... " सुमरि की खनकती हंसी से सुनसान वातावरण में घुँगरू से बज उठे। "क्यों हँस रही हो... मोहल्ला जगाओ गी क्या ?" कन्हैया ने खिलखिलाती सुमरि को टोकते हुए कहा। "शेखचिल्ली के सपने दिखाओंगे तो हंसी आयेगी ही।" सुमरि ने हंसी रोकते हुए कहा। "नही रे....... सच बोल रहा हूँ। सरकार पशुधन के लिए बैंक से क़र्ज़ देती है"
"ब्याज भी तो लेती होगी ?" सुमरि ने तुनककर कहा।
"नही ब्याज माफ़ है। बस एक साल बाद थोड़ा थोड़ा करके किस्तों में पैसा चुकाना पड़ता है। रघुराम ने भी तो ऐसे ही दो-दो भैंसे बांध रखी है खूंटे से है। प्रधान जी बता रहे थे ये योज़ना गरीबो के लिए ही है। "
"अच्छा........... !! सरकार अब गरीबो के लिए भी योज़ना बनाने लगी। "
सुमरि ने कन्हैया की बाँह में कचोटी भरते हुए शरारत से कहा। कन्हैया ने भी उसे अपनी बाँहो के घेरे में ले लिया। रात के अँधेरे में प्रेेम की लौ जलने लगी।

आज प्रधान देवधर बाबू की छोरी की शादी थी। पुरे गाँव में न्यौता दिया था। गाँव की औरते के साथ सुमरि भी सज़धज कर आई थी। उसकी सांवली सलौनी सूरत आज बहुत ही मोहक लग रही थी। शादी-ब्याह तो बहाना था उसने श्रृंगार तो अपने मर्द के लिए ही किया था। इसीलिए सुमरि की नज़र बार बार अपने कन्हैया को ढूंढ रही थी।

"सैंय्या मिले मोहे लरकय्या में का करूँ।
बारह बरस की में ब्याह के आई ,सैंय्या चलाये पैंय्या-२ में का करूँ।
जी का करूँ ........
पंद्रह बरस की में गौने पे आई सैंय्या उड़ाए कन्कय्या में का करूँ ।
सोलह बरस की मोरी बारी उमरयां सैंय्या छुडाएं बैय्यां में का करूँ।
जी का करूँ ........
बीस बरस की में होने को आई सैंय्या करे मैय्या -२ में का करूँ।
जी का करूँ ........"

ढोलक की थाप पर कुछ औरते गा रही थी और कुछ ठुमक रही थी कुछ ठिठोली कर रही थी । लम्बे-२ घुंगट निकाले औरते , सरपट इधर से उधर भागते नौकर चाकर ,इंतज़ाम में लगे लोग और भीनी भीनी पकवानो की उड़ती महक चारो तरफ उल्लास ही उल्लास था। जहाँ औरते बैठी थी उनके सामने ही मर्दो की टोली खड़ी थी सुमरि चोर नज़रो से बार बार उधर ही देख रही थी। कि कन्हैया शायद वहां ही हो। उसे कन्हैया तो नही दिखा पर दो लाल लाल आँखे जरूर नज़र आई जो उसे ही घूरे जा रही थी। पहले तो सुमरि थोड़ा सा सकपका गई। फिर उसने पास खड़ी जमना काकी से पूछा "ऐ....... काकी ये कोण है गेरू पगड़ी बाँध रखी है जिसने "   जमना काकी ने आँखे सिकोड़ कर उधर देखा जिधर सुमरि ने इशारा किया था। "अरे........ बिटिया इन्हे नही जानत हो ये ही तो प्रधान जी है। बाबू देवधर ! बड़े ही दयालु मानुष है।" काकी ने एक बात आगे की जोड़ कर परिचय दिया। "अच्छा ये ही है देवधर बाबू" इतना कहकर सुमरि वहां से हट गई और अपनी हमउम्र औरतो की टोली में व्यस्त हो गई।

कोई सास का रोना रो रही थी। कोई अपने मर्द की बाते बता रही थी ,किसी को अपनी नई साडी की खूबी बताने से ही फुरसत नही थी। सुमरि इन बातो से ऊब सी गई , तभी उसे मंडप के पास रघुराम की घरवाली कमला जाती नज़र आई। उसने उधर ही कदम बढ़ा दिए सोचा क्यों न बैंक से मिलने वाले क़र्ज़ के बारे में ही बात कर ले। कमला तेज़ तेज़ कदमो के साथ एक कमरे में गुस गई। सुमरि भी उधर ही बढ़ चली सोचा शायद कन्हैया भी उधर ही मिल जाये। उसने कमरे के पास जाकर कमला को इधर उधर देखा पर वो कही नज़र नही आई। कुछ मर्द मिठाई के टोकरे सरो पर रखे इधर ही आ रहे थे। इसलिए सुमरि थोड़ी सी दिवार से लग कर खड़ी हो गई। इस तरफ ज्यादा लोग नही थे। इक्का दुक्का ही औरत और बच्चे नज़र आ रहे थे। न कन्हैया दिखा और न कमला ही उसे कही नज़र नही आई। इसीलिए वहाँ से वापस मंडप की तरफ मूडने लगी। पर जैसे ही सुमरि आगे बढ़ी उसे किसी के रोने ही आवाज़ आई। उसने आस पास देखा कोई नही था। उसने कान लगाया आवाज़ शायद कमरे से आ रही थी सुमरि ने थोड़ा आगे जाकर एक खिड़की से अंदर झाँका। उसे कमला दिखी जो हाथ जोड़े खड़ी थी उसके सामने एक आदमी खड़ा था जिसकी बस पीठ ही नज़र आ रही थी। उसने सर पर गेरू पगड़ी बांध रखी थी। सुमरि को लगा शायद ये प्रधान देवधर है पर चेहरा नही दिख रहा था।
"प्रधान जी  बैंक वाले कल भी आये थे। बोल रहे थे। कि अगर इस हफ्ते में क़िस्त जमा नही की तो भैंस खोल कर ले जायेंगे। आप तो बोले थे कि आप ने सारी क़िस्त चूका दी " कमला सुबकते हुए कह रही थी। "तुम भी तो बोली थी कि जब कहोगे हाज़िर हो जाउंगी। कितना बुलावा भेजा तुम एक बार भी आई ?" सामने खड़ा आदमी ढिठाई से बोला। कमला की बातो से सुमरि को पता चल गया की ये प्रधान देवधर ही है।
"प्रधान जी हमसे अब ये गन्दा काम नही होता।" कमला ने ज़मीन में गर्दन गड़ाते हुए कहा। मानो उसे खुद से ही घिन आ रही हो।
"ठीक है तो फिर मेरे पास क्यों आई हो "
"आप बखत पे मजूरी दे देते तो हम नही आते। भैंस के दूध के पैसे घर में खर्च हो गए। आप मजूरी नही दे रहे। बैंक वाले धमकी दे कर गए है। कैसे क़िस्त जमा करे। अब और कहाँ जाये ? अगर आप के पास नही आये।" कमला आंसू पोंछते हुए गिड़गिड़ाई।
"सही है। क़िस्त नही चुकाओगे तो बैंक वाले तो आएंगे ही। क़िस्त चूका दो। " प्रधान की निष्ठुर आवाज़ सुनाई दी। "और उन किस्तों का क्या जो मैने कई बार काली रातो में आप की हवस से चुकाई  है। कमला ने थोड़े क्रोध से प्रधान का हाथ पकड़ते हुए कहा।"
"वो तो ब्याज था। मूल तो अभी बाकि है " प्रधान का ठहाका गूंजा।
"भगवान से डरो, कुछ तो तरस खाओ आज तुम्हारी छोरी का ब्याह है।" कमला ने प्रधान के पैर पकड़ते हुए कहा। "तो हम कोनसा आज ही तुमको बुला रहे है कल परसो जब बखत लगे आ जाना सारी किस्तें चुका देंगे।" एक बार फिर प्रधान का ठहाका गूंजा। सुमरि के पाँव ये सब सुनकर कांपने लगे। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। उसे कभी कमला की सिसकी सुनाई देती तो कभी प्रधान का ठहाका ,कभी उसके कानो में कन्हैया की बीती रात की बाते गूंज़ती "ब्याज माफ़ है। बस एक साल बाद थोड़ा थोड़ा करके किस्तों में पैसा चुकाना पड़ता है।" तो कभी जमना काकी की बूढी आवाज़ "बाबू देवधर! बड़े ही दयालु मानुष है" उसे हतोड़े सी अपने सिर पर पड़ती महसूस होती।

"सुमरि...... आँखे खोलो सुमरि " उसे कन्हैया की आवाज़ सुनाई दे रही थी। आँखे खोली तो सामने परेशान सा कन्हैया खड़ा था। "क्या हुवा तुम्हे? बेहोश क्यों हो गई थी।" कन्हैया ने सुमरि के बगल में बैठते हुए बड़े प्रेम से पूछा। सुमरि कुछ नही बोली बस एकटक कन्हैया के चेहरे को देखती रही। "यहाँ मुझे कौन लाया है। "सुमरि ने कन्हैया की तरफ देखते हुए कमजोर सी आवाज़ में पूछा। "मैं लाया हूँ और कौन लाता। तुम अचानक बेहोश हो गई थी।" कन्हैया ने उसके हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा। सुमरि को कमला और प्रधान की सारी बाते एकदम से याद आ गई उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वो कन्हैया से छोटे बच्चो की तरह लिपट गई।
'कन्हैया हम बैंक से क़र्ज़ नही लेंगे। " सुमरि ने कन्हैया से रोते हुए कहा।
"नही लेंगे। जैसा तुम कहोगी वैसा ही करेंगे। तू रोती क्यों है पगली "  इतना कह के कन्हैया ने भी सुमरि को अपनी बाँहो में भर लिया।



Friday, February 19, 2016

फिर भी संतोष तो है............

"ये सूरज कल भी निकलेंगा ना ?" उसने डूबते सूरज को देखते हुए पूछा।
"उम्मीद तो है। "
"सही कहा उम्मीद ही तो है।" उसने आह ! भरी।
फ़ोन की घंटी हो या दरवाज़े की , आजकल सब एक उम्मीद ही तो है। कि दूसरी तरफ शायद वो बेटा हो जो माँ कहकर लिपट जाता था। बेटे के फोटो को बार बार चूमने,उंगलिया से छूने और आंसुओ से भिगोने में दर्द है। या आन्नद,ये तो एक माँ ही जानती है। हज़ारो मील दूर परदेश में व्यस्त, बेटा क्या जाने। बेटा तो बस वेस्टर्न यूनियन का एक कोड बन कर रह गया है जो हर महीने वक़्त से मिलता है।  ... आह... ! फिर भी संतोष तो है। कि इस बहाने वो हमे याद तो रखता है।


Thursday, February 4, 2016

निराशा में भी इबादत जैसा आनंद और सुकून है...................

कभी कभी गुज़री, खर्ची ज़िन्दगी का हिसाब लगाने को दिल करता है। जोड़ ,गुना, भाग सब करके हाथ में कुछ नही बचता। जुएं में हारे जुआंरी सा खाली और हताश अकेला दूर..........  अपने आप से भी तन्हा खड़ा नज़र आता हूँ । लगता है कि जैसे सारे दावं सारी बाज़ी ही बिना सोचे समझे खेल कर हारा हूँ। सब हार दिया सिवाए कुछ जन्म से ही चिपके रिश्तो और कुछ एक अच्छे कर्मों के एवज़ में मिले दोस्तो के।

किसी फ़िल्म की तरह सब आँखों के सामने चलता है। जो मैंने सुना है जिया नही ,जो जिया है वो सुना ही नही था। शायद इसीलिए कहते है। कि ऐसा कोई स्कूल नही जहाँ अनुभव सिखाया जाता है। अब तक जो जिया सब भरम था। परछाई थी। साथ तो चली और चलती रहेगी पर कभी हाथ नही आएगी। यहाँ से रुक कर देखता हूँ। तो अहसास होता है कि सब भाग रहे थे एक दौड़ थी जो आज तक ख़त्म नही हुई। पर मैंने शायद इसमें काफी देर से हिस्सा लिया। वो सब जिनको देख कर में हँसता था। ठहाके लगता था आज , इस दौड़ में रेफरी बने हुए है। और मैं भाग रहा हूँ बिना किसी मंज़िल के मुझे नही पता कहाँ रुकना है? कब तक दौड़ना है?

शीशे में खुद को ध्यान से देख कर लगता है। कि ये चेहरा मेरा नही है। पहचान ही नही पाता खुद को। पर खुद को जब मैं ही नही पहचानता तो ये सब लोग जो मेरे चारो तरफ बिखरे पड़े है। ये कैसे पहचान कर लेते है मेरी? हंसने का या सोचने का विषय है। पता नही । पहचानने वाले शायद इसीलिए गलतियाँ करते है। क्यूंकि इंसान दिखाई कुछ पड़ता है और अंदर कुछ होता है। बाहर से ऐसा सुन्दर और मासूम , मोहक मुस्कान सजा चेहरा और परदे के पीछे इतनी बेरहमी इतनी निष्ठुरता , निराशा और कुंठा कमाल है। यहाँ सबके चेहरों पर नकाब है कोई डॉक्टर है कोई अभिनेता है तो कोई नेता है। कोई अध्यापक , अभियंता तो कोई सुनार और मोची है। चोर पुलिस और भी कई सारे नकाबपोश है पर इंसान कहाँ है। पढ़ने के लिए अध्यापक के पास जाते है। दर्द होता है तो डॉक्टर को ढूँढ़ते है। पर उसकी तलाश कहाँ करे जिसे अशरफुल मखलूक़ात कहते है। उसका कोई पता ठोर ठिकाना है या वो अब किताबो और किस्सों कहानियो में ही है असल ज़िन्दगी में उसका कोई वज़ूद बाकि ही नही रहा।

"घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे!
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला। "(बशीर बद्र )

ऐसा नही है कि मैं हमेशा ऐसी नकारात्मक बाते ही करता हूँ या सोचता हूँ। परन्तु आजकल चारो तरफ नकारात्मक ऊर्जा इतनी है कि ना चाहते हुए भी दिल उदास हो ही जाता है। चाहे सुबह का अखबार हो या चौबीसो घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल और रिश्तो के नए-नए आयाम गढ़ते टीवी सीरियल। सब निराशा और षडयंत्रो से भरे पड़े है। परन्तु ये भी सत्य है कि निराशा में भी इबादत जैसा आनंद और सुकून है। शायद ये आप को अजीब लगे पर हम जब निराश और परेशान होते है तभी सबसे ज्यादा धार्मिक होते है।

खैर.... छोडो! इस मस्ताने बसंती मौसम में शायद ये बाते थोड़ी बेमानी है। क्यों न हम भी किसी बिछड़े मासूम लम्हे के विरह में डूब कर या किसी के प्रेम में मस्त होकर अपने मन को कटी पतंग सा आज़ाद छोड़ दे। ओर आनंद ले उल्लास ,प्रेम ,खुश्बू ,फूलों और रंगो से सजे इस रंगीन मदहोशी भरे मौसम का। छत पर खुले आसमान में रंगीन सपनो सी पतंगो के पेंच ललड़ाकर ताकि ये नीरस सी ज़िन्दगी बसंत सी मोहक,चंचल और प्रफुल्ल हो जाये।


Sunday, January 31, 2016

बदचलन......

"अगर तुम मर ही जाते तो कम से कम ये सुकून तो रहता कि कोई करने वाला नही भीख ही मांग लेते । पर तेरे होते हुए तो कोई भीख भी नही देता। कहते है कि इसका तो हट्टा कट्टा शौहर जिन्दा है। इन बच्चो को संभालूँ , लोगो के घरो में बर्तन मांजू  ? या जिन से उधार लिया है उनकी की गालियाँ और गन्दी नज़र बर्दास्त करूँ।" हमेशा की तरह वो रो पीट रही थी। और उसका शौहर आराम से बीड़ी फूंक रहा था। उस पर बीवी की बातो का कोई असर ही नही हो रहा था। या शायद अब उसे ऐसे ताने सुनने की आदत थी। "अरे. . . . . . . जब बेटा........ इतना........ निकम्मा, नकारा था तो इसकी शादी क्यों की. . . . . . . . क्या शौंक चढ़ा था ऐसे निठल्ले के सर पर सेहरा सजाने का।" राशिद पर अपनी बातो का असर होता न देख अब रुखसाना ने दांत भींच -२ कर सास की तरफ गोले दागने शुरू कर दिए। पर उसकी सास ताहिरा बेगम एक नेक और समझदार खातून थी हमेशा की तरह शर्म से गर्दन झुका कर चुप रही। ( जो की सास बहू के मसले में एक अजीब बात है। )

पूरा घर राशिद के निकम्मेपन और आवारागर्दी से परेशान था। बूढ़ा बाप दिन रात बिजली के कारखाने में काम करता और जवान बेटा सड़को पर आवारागर्दी। छोटा परिवार था इसलिए दो वक़्त की रोटी नसीब हो रही थी वरना ऐसे महंगाई के जमाने में कहाँ गुजारा होता है। दो बहन-भाई और माँ-बाप बस चार लोग थे परिवार में। जमील मियां ने काफी कोशिश की बेटा कुछ पढ़ लिख जाये। पर अकेला होने की वज़ह से घर पर मिले ज्यादा लाड प्यार और उसकी आवारा सोहबत ने उसे कहीं का नही छोड़ा। घर से स्कूल का कहकर निकलता और सारा दिन आवारा दोस्तों के साथ मटरगस्ती करता ,यहाँ वहाँ घूमता। बाप सारा दिन ड्यूटी पर रहता डर किसी का था नही, इसीलिए दिन पर दिन बिगड़ता चला गया। गली मोहल्ले से रोज़ शिकायते आने लगी कभी किसी के साथ मारपीट और कभी किसी के साथ गाली गलोच। रोज़ रोज़ की शिकायतों से तंग आकर जब बाप ने डांट पिलाई कि "राशिद देख या तो ये आवारागर्दी छोड़ दे वरना कहीं का नही छोड़ेगी ये तुझे। पढाई पर ध्यान लगा " तो तिडक कर बोला।  "मुझे...... नही पढ़ना  है। मुझे पढाई समझ नही आती...... । मुझे काम......  करना है "
"बेटा पढ़ लिख जायेगा तो तेरे ही काम आएगा। और आजकल तो हर काम में पढाई की जरूरत पड़ती है "
माँ ने भी प्यार से समझाया। पर पत्थर दिमाग पर जोंक न लगी। थक हार कर जुम्मन चाचा की फर्नीचर की दुकान पर ये सोच कर छोड़ दिया के पढ़ा नही है। कम से कम हाथ का दस्तकार ही हो जायेगा तो जिंदगी में भूखा नही मरेगा।

पर आवारा तबियत राशिद यहाँ भी नही टिक सका। दो तीन महीने काम करके जुम्मन चाचा को भी टाटा बाय-बाय कर दिया। बूढ़े बाप ने जैसे तैसे करके बेटी के तो हाथ पीले कर दिए। पर नालायक बेटे को लाइन पर न ला सके। आस-पडोस , यार रिश्तेदार सब ने ये ही सलाह दी। शादी कर दो खूंटे से बंधेगा तो खुद-बर-खुद लाइन पर आ जायेगा। बूढ़े कंधो ने सोचा, ठीक है शादी तो करनी ही है। हो सकता है के दुल्हन का मुंह देख कर ही कुछ अक्ल आ जाये। और इस तरह रुखसाना दुल्हन बन कर इस आवारा के पल्ले बंध गयी।

नयी दुल्हन घर में आई तो खर्चे भी बढ़ गए। कुछ दिनों तक तो सब ठीक चला । पर बूढी कमाई,जवान बहू के खर्चे कहाँ तक बर्दास्त करती। बहू के ताने सास के कानो तक जाने लगे। घर के बिगड़ते हालात को देखकर माँ ने बेटे को खूब समझाया  "देख अब कुछ काम धंधा शुरू कर दे। मजदूरी ही करने लग,बहू भी आ गई है कब तक तेरे अब्बू अकेले पूरे घर का खर्च उठाते रहेंगे। अब बहुत हुआ संभल जा बेटा ।"  पता नही माँ की नसीहत का असर था या बीवी के खर्चो का ,अक्ल में कुछ बात आई और मजदूरी करने लगा। पर वो कहावत है ना कि चोर चोरी छोड़ देता है पर हेरा फेरी नही छोड़ता। राशिद पर एक दम सही बैठती है। अब काम तो करता। पर अगर दो दिन काम करता तो तीन दिन पड़कर खाता। ऊपर से हर साल बढ़ते परिवार से हालात और ख़राब हो गए। बहू हर वक़त सास को ताने देती। पर ताहिरा बेगम अपनी किस्मत समझ कर चुप रहती। वैसे भी माँ बाप जन्म के साथी होते है कर्म के नही। समझा समझा कर थक गए। पर राशिद पर कोई फर्क नही पड़ता।

जब तक बाप का साया सर पर था। घर की गाडी किसी तरह चलती रही,पर उनके इंतकाल के बाद हालात बद से बत्तर होते गए। कभी कभी तो फाको की नौबत आजाती। रोज़ रोज़ के झगडे बढ़ने लगे। रुखसाना सास को कोसती,मायके जाने की धमकी देती। बेटा अपने निकम्मेपन से बाज नही आता और इन दोनों के बीच में बूढी ताहिरा बेगम घुन की तरह पिस रही थी। ऊपर से भूखे पोता-पोती। अपनी भूख तो कैसे भी दबा लेती। पर दादी पर छोटे छोटे बच्चो का तड़पना नही देखा जाता। वैसे भी मूल से ज्यादा सूद प्यारा हो जाता है। इसीलिए ताहिरा बेगम ने बच्चो की भूख मिटाने के लिए आसपड़ोस से काफी क़र्ज़ ले लिया था। जो वक़्त पर चुका न सकी और कर्ज़े वाले अब रोज़ आकर खरी खोटी सुना देते। बूढी आँखे शर्म से गर्दन झुकाकर उनसे ना जाने किस उम्मीद पर कल परसो के वादे कर लेती। और हर बार वादा खिलाफी पर नयी ज़लालत और नए वादे । पर नालायक बेटे पर कोई फ़र्क़ नही पड़ा।

और फिर पता नही अचानक ऐसा क्या हुआ। कि सब कुछ बदल गया था। घर के आँगन में हमेशा ठंडा पड़ा रहने वाला चूल्हा आग से दहकने लगा था। पहले हर वक्त भूख से रोने बिलखने वाले बच्चे अब अपनी मस्ती में खेलते रहते। रुखसाना के चीखने चिल्लाने की जगह अब निकम्मे और नकारा राशिद की गन्दी गन्दी गालियों की आवाज आने लगी। "तू..........  बदचलन है। तू ......... बाज़ारू औरत है रुखसाना ....... " और रुखसाना आराम से घर के कामो में लगी रहती। उस पर शौहर की बातो का कोई असर नही होता। कर्ज़े वालो की गन्दी गालियाँ भी अब मुस्कुराहटों में बदल गई थी। बस एक चीज़ अब भी नही बदली थी। और वो थी बूढी ताहिरा बेगम की शर्म से झुकी गर्दन ।


Monday, January 25, 2016

आओ मिलकर "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा" बनाये.....

सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये।
परन्तु आज जब हम 70वां स्वतंत्रता दिवस माना रहे है। तो दिल में कई सरे सवाल उठ रहे है की क्या सच में हम एक गणतंत्र राष्ट्र है ? जहाँ सब की भागीदारी और सब का कल्याण होता है। जहाँ जनता सर्वशक्तिमान होती है। जहाँ सविधान सभी को एक समान अधिकार देता है। जहाँ ऊँच-नीच ,जाति -धर्म का भेद भाव नही होता है। क्या सच में हम ऐसा गणतंत्र बना पाये है?

भले ही आज हमने तरक्की और प्रगति के नाम पर बड़ी-बड़ी इमारते, स्कूल,हॉस्पिटल शॉपिंग माल खड़े कर लिए हो। भले ही हम विश्व पटल पर परमाणु संपन्न देशो की कतार में खड़े हो। किन्तु परमाणु शक्ति संपन्न देश होना और भूख,शिक्षा,रोजगार,गरीबी से मुक्त देश होना दोनों अलग अलग बाते है। तरक्की करना और आगे बढ़ना किसी भी देश या समाज लिए बहुत जरूरी है। परन्तु ये तरक्की जमीनी हकीकत पर समाज के आखरी छोर पर खड़े नागरिक तक भी पहुंचनी चाहिए। ना की समाज के एक विशेष वर्ग और देश के चंद उद्योगपतियों की दहलीज पर पालतू बनकर दुम हिलाती रहे।

आज हमारे मुल्क में सब कुछ मंहगा है। सिवाए इंसान के, इंसान की कीमत हमारे देश में कुछ नही है। और जिस समाज और देश में इंसानो की कोई कीमत नही होती वहां इज़्ज़त सरे बाज़ार तबले की थाप पर नाचती  है। वहां हवस के पुजारी स्याह रातो में सफ़ेद जिस्मो का जीवन स्याह करते है। वहां जागती आँखों के ख्वाब  बिकते है वहां फूल से होठों की प्यास बिकती है। वहां बचपन चाय की दुकानो और होटलों पर दो वक़्त की रोटी के लिए झूठे बर्तन साफ़ करता है। वहां अफवाह पर इंसानो के क़त्ल कर दिया जाते है। पर किसी को कोई फर्क नही पड़ता। वहां हर दिन सैकड़ो दामिनी और निर्भया की इज़्ज़त सरे बाजार नोची जाती है और वो तड़प तड़प कर अपनी जान गवां देती। पर कोई कयामत नही आती। वहाँ ठिठुरती सर्दी और तपते सेहराओ में हजारो लाखो बेबस किसान,मजदूर जिंदगी की जंग हार जाते है। पर संसद भवन में मिनरल वाटर पी-पी कर बहस करने वाले,लाखो के सूट पहनने वाले देश के इन ठेकेदारो पर कोई फर्क नही पड़ता है। क्या ऐसे ही आजाद देश के सपनो को सच करने के लिए भगत सिंह और हज़ारो सपूत हँसते हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। क्या ऐसे ही देश के लिए हमारे अमर शहीदो ने अपना खून बहाया था के आने वाली नस्ले ऐसे ही सिसक-सिसक कर मरे। देश का किसान क्या इसीलिए अन्न उगाता है। की सरकारी गोदामो में सडे और लोग भूख से तड़प तड़प कर मर जाये।

ये कैसा समाज है ? कैसा देश है? कैसा गणतंत्र है ? ....... जहाँ हर कोई अपनी धुन में  मगन है सिर खुजाने की फुर्सत नही दायें -बाएं की खबर नही। सब भूखे है। कोई दौलत का भूखा तो कोई पेट का भूखा है,कोई  शोहरत का भूखा है तो किसी को कुर्सी की भूख है। भाईचारा,अमन,प्यार,मोहब्बत दम तोड़ती जा रही है। चारो तरफ मारो-मारो का शोर मचा है। इन्साफ के अड्डे सिसक रहे है पर कोई सुनने वाला नही है। क़र्ज़ में डूबा किसान और उत्पीड़न से पीड़ित छात्र खुदखुशी करने को मजबूर है। पर कोई सुनने को तैयार नही।

इन्साफ के लिए भटकते लोग जब मजबूर और मायूस होकर कहते है की "खुदा देख रहा है" तो सोचता हूँ। क्या देख रहा है ?

जब तक इन्साफ के लिए इंडिया गेट पर मोमबती जलती रहेगी ? जब तक मासूम बचपन सड़को पर अपनी भूख मिटाने  के लिए तिरंगे झंडे बेचते रहंगे। जबतक हिन्दू मुस्लिम के नाम पर लोग मरते रहंगे। जबतक नारी को भोग की वस्तु समझकर सड़को पर हवस के अंधे नोचते रहेंगे। जबतक दहेज़ के नाम पर घर की लक्ष्मी जलती रहेगी। जब तक जालिम समाज बेटी को माँ की कोख में कत्ल करता रहेगा।  जबतक ....जबतक ...... कैसा गणतंत्र,कैसा तंत्र कैसी आजादी।

इस भागम-भाग और अपने-अपने का राग अलापने वाले जालिम वक़्त ने इंसानियत और दिलो की मोहब्बत को इस तरह कुचल दिया है। कि ज़िन्दगी सजा बन गई है। किसका हाथ है जो खून से नही रंगा है ? किसका गिरेबान है जो गिरफ्त से बचा है।

इससे पहले की भूख और धार्मिक कटटरता इस मुल्क को खा जाये। इस से पहले की इन्साफ अमीरो के कदमो में दफ़न हो जाये। इस से पहले की आवाजे गुम हो जाये। आओ उस बूढ़े बाप का सहारा बने जिसके जवान बेटे ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी,खुदा के लिए उस माँ के आसूँ पोछ डालिये जिसकी बेटी बेरहम समाज की हवस का शिकार हो गई। और उन मासूमो के सर पर अपनी मोहब्बतों का हाथ रख दीजिये जिनके बचपन सड़को पर भीख मांगते गुजर गए।

आओ आज लाल किले की दिवार से हम ऐलान करे। कि  चाहे कुछ भी हो जाये। हम अपने अंदर के इंसान को मरने नही देंगे। भाईचारे और एकता को कुछ चंद लोगो की नापाक जिद्द के आगे झुकने नही देंगे। आओ आज मिलकर "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा" बनाये। खुश रहिये ,इंसान रहिये। सभी को एक बार फिर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाये।


Saturday, January 23, 2016

और इश्क़ को मंज़िल मिल गई.......


अजी..........  ये इश्क़ भी बड़ा फरेबी है। एकदम चुनावी वादो की तरह कमबख्त जब आता है बड़े शब्ज़बाग़ दिखता है। भले ही बाद में सब्जी के भी लाले पड़ जाये। ऐसा ही कुछ हमारे प्यारे मित्र के साथ भी हुआ। उसको भी प्यार हो गया है। और वो भी ऐसा की पूछो मत,साला पगला गया है। बिलकुल हमारी मीडिया की तरह। अच्छा खासा नौकरी कर रहा था बैंक में कैशियर है। पर जवानी होती ही दीवानी है कर दिया दीवाना।
वो राहिल के मोहल्ले में ही रहती है। समझो के बस एक मुंडेर परे है। 'दुआ ' प्याले सी बड़ी बड़ी आँखे,बाल खुदा की कसम क़ानून के हाथो से लम्बे और नेताओ के कारनामो से काले,गुलाबी होंठ,केजरीवाल के चरित्र सा उजला रंग। रविश कुमार सी साफ़ और बेबाक। जिधर से निकलती है मोदी से ज्यादा भक्त इकठ्ठा हो जाते है। गली के सारे कुंवारे चाहे कोई लंगड़ा हो या लुल्ला सब जान छिड़कते है। पर सामत तो हमारे राहिल की आई थी। बस छत पर आँखे क्या चार हुई ,जनाब सब गुना भाग भूल गए। अब वो जमाना तो है नही की लड़की रुमाल में प्यार बाँध कर फेंके और लड़का,जैसे बिजली के बढे बिल को कम करवाने के लिए सरकारी दफ़्तर के चक्कर काटने पड़ते  है ऐसे उसके घर के चक्कर काटे। मोबाइल का ज़माना है इंटरनेट का बोल बाल है। बस जी शुरू हो गया धीरू भाई का सस्ता प्लान। पहले पहले व्हाट्सऐप पर मिज़ाज़पुर्सी हुई ,फिर खट्टे  मीठे चुटकुले आने जाने लगे। धीरे धीरे बाबू ,सोना जैसे उपनामों के साथ साथ ग़ालिब से लेकर सारे सड़क छाप बेतुके शायरों के कलाम थोक के भाव बरसने लगे। अब अगर इतने पर ही बात रुक जाती तो अडानी,अम्बानी कैसे तरक्की करते। बस बातो का ऐसा सिलसिला निकला की राहिल के दिन रात फ़ोन पर ही छिपने और निकलने लगे। आधी सैलरी मोबाइल और आधी 'अच्छे दिनों' वाली महंगाई की भेट चढ़ने लगी। मैडम जी मिस कॉल करती और जनाब शुरू हो जाते। वैसे ये 'मिस कॉल' क्या फिट नाम रखा है किसी बेचारे ने,मिस के ही काम की चीज़ है मिस्टर तो बेचारा इसको देख कर ही अपना बैलेंस चेक करने लगता है।
अब भैय्या भारत में तो दाल भी बिना तड़के के नही बनती ये तो इश्क़ था। ऐसा अंधेर कैसे हो सकता है कि मुंडेर के परे प्यार चले और मोहल्ले में पता न चले। ये तो वो ही बात होगी के मंत्री घोटाले करे और हमारे प्रधानमंत्री जी कहे के हमे तो कुछ पता ही नही। लव की बात थी। डेंगू से भी तेज़ पूरे मोहल्ले में फ़ैल गई। दोनों के घरो में हाय तोबा मच गई। अब्बू पल भर में ही नकटे हो गये और अम्मी का मेकअप से चमकता चेहरा मोहल्ले में दिखाने के लायक ही नही रहा। यार,रिश्तेदरो को विपक्ष की तरह एक नया मुद्दा मिल गया। हर शादी ब्याह में मोदी के जुमलों और केजरीवाल के कारनामो की तरह इन दोनो के ही चर्चे थे।गली नुक्कड़ हर जगह न्यूज़ चैनलों की बिना सिर-पैर की डिबेट की तरह लोग इन दोनों के बारे में ही बहस कर रहे थे। हर कोई संबित पात्रा बना फिर रहा था। दुआ घर वालो के लिए बद दुआ बन गई थी या यूँ कहिये मोदी की स्मृति ईरानी। अम्मी DDCA के घोटाले में जेटली की तरह इसकी पैदाइश पर ही लानत भेज रही थी अब्बू हर मामले की तरह इस मामले में भी नए मोदी और पुराने मनमोहन को फॉलो कर थे एकदम चुप। गली मोहल्ले में दीदी से लेकर दादी सब चटखारे ले लेकर 'ट्वीट' कर रही थी। रोज़ नए नए सगूफे भ्रष्टचार के जिन की तरह बहार आ रहे थे।
दुआ से मोबाइल ऐसे छिन गया जैसे शीला से दिल्ली। राहिल साहब लड़को के बीच नए इमरान हाश्मी बन गए। जिधर से भी निकलता लोग ऐसे घूरते जैसे इश्क़ नही 'मर्डर' किया हो बेचारे ने। ऊपर से घर वालो के ताने,टूट कर रह गया। सब ने खूब समझाया के बेटा छोड़ दे। काम पर ध्यान दे कुछ नही रखा इन बातो में। पर राहिल किसी की नही सुनता इश्क़ का बुखार था इतनी जल्दी कहा उतरता। अम्मी ने भी खूब समझाया "देख बेटा तू राहिल है 'राहुल' नही की तेरी उम्र निकली जा है" जो हुआ उसे 'अच्छे दिनों' के वादे और 'काले धन' के जुमलों की तरह भूल जा।
गली मोहल्ले की लड़कियां दुआ को कोस रही थे "कमबख्त . . . . . . .   नैन ये लड़ाई और दफा १४४ हम पर लग गई।"
 मामले को ज्यादा बढ़ता देख 'बीजेपी की बुजुर्ग मण्डली' की तरह बिरादरी के बड़े बुजुर्गो ने परिवार वालो को समझाया की लड़का अपने पैरो पर खड़ा है लड़की भी अच्छे घर से है एक दूसरे को पसंद करते है। दोनों की शादी करवा दो अच्छा रहेगा वरना गरम खून है कुछ ऐसा वैसा कर लिया तो बिहार की हार की तरह किसी को मुहं दिखाने के काबिल नही रहोगे। और बदनामी 'आशाराम' से ज्यादा होगी। पर क्या है न की भारत पाक में क्रिकेट मैच तो हो सकता है दोस्ती नही। दोनों परिवार एक दूसरे पर इल्जाम लगाते रहे और समझोता नही हो सका।
आखिर जिसका डर था वो ही हुआ। राहिल दुआ को लेकर रातो रात फुर्र हो गया। दोनों के घरवालो के मिज़ाज़ ऐसे ठण्डे हो गए जैसे दिल्ली के चुनाव परिणाम के बाद बीजेपी और कांग्रेस के।
दोनों प्रेमी ऐसे गायब हुए जैसे व्यापम घोटाले की फाइल,किसी को कुछ खबर नही। पुलिस ने भी कई जगह दबिश दी पर जैसे 'मफलरमैन' के दफ्तर पर रेड मरकर सीबीआई को कुछ नही मिला। वैसे ही पुलिस को भी कुछ हासिल न हुआ।
राहिल घर का अकेला कमाऊं बेटा था। उसके घर छोड़ते ही घर के हालत ऐसे बिगड़ गए जैसे लोकसभा के चुनाव के बाद कांग्रेस के । राहिल के अब्बू उसकी घर वापसी के लिए हाथ पाँव मरने लगे। और दुआ के घर वाले भी रूपये की तरह दिन पर दिन अपनी गिरती साख को बचाने के लिए छटपटाने लगे। थक हार कर मामला फिर से बिरादरी के बुजुर्गो के पास ले जाना पड़ा। बिरादरी ने माँ बाप को ही कसूरवार ठहराया और दोनों बच्चो की घरवापसी का फरमान सुनाया। इस तरह प्रेमी युगल घर लौट आया। और इश्क़ को मंज़िल मिल गई।