Tuesday, June 14, 2016

नई डिमांड

बचपन में गुड्डे-गुड़िया की ,खेल-खेल में शादी कराते-2 पता नही कब मैं खुद की शादी के सपने सजाने लगी।
और कब ये सपना हकीकत बन गया पता ही नही चला। ऐसा लगता है जैसे मानो कल की ही बात है।
विदाई के समय मम्मी-पापा का तो रो-रो कर बुरा हाल था।
पापा तो मेरे जाने के बाद कई दिनों तक बहुत उदास रहे थे।
आह... कितने अच्छे दिन थे।
और अब अगर बिना फोन किये मम्मी-पापा से मिलने चली जाती हूँ तो उनके चेहरे पीले पड़ जाते है।
सोचते है। पता नही दामाद ने अब कौन सी नई डिमांड की है।


Monday, April 11, 2016

कर्मो का फल

"क्या कुछ नही किया हमने उसके लिए।"

"वो हमारा फ़र्ज़ था जी।"

"तो क्या उसका कोई फ़र्ज़ नही ? क्या इसी दिन के लिए उसे पढ़ा लिखा कर कामयाब किया था ......?कि एक दिन वो हमें ही 

बोझ समझने लगेगा।" "वो जल्दी ही हमें ले जायेगा।आप दुःखी ना हो।" मालती ने पति से ज्यादा खुद को तसल्ली दी।

"क्या तुम इस आश्रम में खुश हो तुम्हे दुःख नही मालती ?"  "हाँ है। पर इस बात का।कि काश.......! इस बेटे की चाह में 

उस बेटी को गर्भ में क़त्ल करने की बेवकूफी न की होती। ये हमारे कर्मो का फल है जी"



Sunday, March 20, 2016

इज़्ज़त की रोटी














"एक फिरकी के दस रूपये ज्यादा है आठ मिलेंगे।"

"आठ तो कम है।"

"अरे....रख लो अम्मा कहाँ ले जाओगी इतना पैसा।"

"बेटी पेट भर जाये वो ही बहुत है।"

"आप के बच्चे नही है ?"

"राम जी बनाये रखे दो बेटे है।शहर में रहते है।"

"फिर खिलौने क्यों बेचती हो,बेटे पैसे नही भेजते क्या ?"

"अकेले पेट के लिए क्यों बच्चों के सामनेे हाथ फैलाऊँ। महंगाई में उनका ही गुजारा मुश्किल से होता होगा। 

वैसे खिलौने बेचकर मेरा समय भी बीत जाता है।और इज़्ज़त की दो रोटी भी मिल जाती है।" दो आंसू चेहरे की सलवटों में समा गए।





मुफ़्त का खाना
















(दोपहर का समय सरकारी स्कूल)
"भैया जी हमारा फ़ोटो खींच कर क्या करोगें ?"
"उस पर कहानी लिखूँगा।"
"सच ! मुझे कहानी में मास्टरनी बनाना।"
लड़की ने चहकते हुए कहा।
"और मुझे डॉक्टर ।" लड़के ने कैमरे को ताड़ते 
हुए कहा। 
"ठीक है।"
"पर हमें पता कैसे चलेगा तुमने हमारी कहानी लिखी है।"
"तुम पढ़ लेना ।"
"हमें तो पढ़ना ही नही आता।"
"स्कूल में पढना नही सिखाते ?"
"पता नही।"
"तो तुम स्कूल आते क्यों हो ?"
"यहाँ दोपहर का खाना मुफ़्त मिलता है। इसलिए आते है। वरना हम तो चाय की दुकान पर काम करते है।"
लड़की ने सब्ज़ी में सनी उंगलियां चाटते हुए कहा।

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ताज़े फूल

"एकदम ताज़े फूल है साहब "
"नही चाहिए।"
"ले लो साहब दिन महक जायेगा।" मुरझाये चेहरे से
मुस्कुराते हुए कहा।
"अच्छा दे दो।"
उसके चेहरे पर फूल सी मुस्कुराहट आ गई।
"पढ़ते नही ?"
"टाइम ही नही मिलता।" हँसकर कहा।
"पापा क्या करते है ?"
"नही है।"
"और माँ"
"घरो में झाड़ू-पोछा करती है।"
"पढ़ने को दिल नही करता ?"
"करता है साहब पर दिल की सुने या पेट की।"
उसने हँसते हुए कहा।
"तुम हर बात पर हँसते क्यों हो ?"
"क्योंकि इसमें पैसे नही लगते।" मुस्कुराकर कहा।
आज समझ आया कि मेरे चेहरे पर ऐसी फ़ूल सी ताज़ी निच्छल मुस्कान क्यों नही आती ।

Wednesday, March 9, 2016

तलाक..

"तुम दूसरी शादी कर लो ताबिश।" उसने आंसुओ को आँखों की दहलीज़ पर रोकते हुए कहा।
"मैं तुमसे बेइन्ताह मोहब्बत करता हूँ। दूसरी शादी के बारे में सोच भी नही सकता। ये कैसी बाते कर रही हो।" ताबिश ने उसका हाथ अपने हाथो में लेते हुए कहा। "मैं चाहे तुमसे कितना ही लड़ झगड़ लूँ। पर दूसरी शादी की बात आजतक मेरे मन में भी नही आई।" ताबिश ने सायमा की तरफ देखते हुए है।  सायमा कुछ नही बोली।
"पर क्या तुम नही चाहती सायमा, हमारा भी एक बेटा हो, रायमा ,रिमशा और ज़ूबी का एक भाई हो। जो  हमारी नस्ल को आगे बढ़ाये।" सायमा की ख़ामोशी से लापरवाह वो बोले जा रहा था। "बोलो,जवाब दो,क्या तुम्हे बेटा नही चाहिए ?" ताबिश उसकी लगातार ख़ामोशी से झुंझलाकर थोडी तेज़ आवाज़ में बोला। नर्स दौड़ती हुई कमरे में आई।
"सर आप मरीज़ के पास इतनी जोर से बात नही कर सकते।"
"ठीक है। ठीक है। सॉरी "
"क्यों तमाशा बना रही हो सायमा। तुम पहली बार तो प्रेगनेंट नही हुई। शुरू में थोड़ी बहुत तो दिक्कत होती ही है। ये डॉक्टर तो हर बार ऐसे ही बोलते है तुम्हे याद है न , ज़ूबी के टाइम भी ऐसे ही बोला था कि या तो अभी एबॉर्शन करा लो वरना बाद में माँ और बच्चे दोनों की जान जा सकती है । " नर्स के जाने के बाद वह फिर शुरू हो गया।

"और तुमने भी ऐसी ही दलीलें दे दे कर मुझे मज़बूर किया था। " सायमा ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा।
हाँ तो कुछ हुआ तुम्हे ? सब सही से निपट गया था ना।" उसने नज़रे चुराते हुए कहा। "हम्म्म , तो अब तुम क्या चाहते हो ?" सायमा ने गहरी सांस लेते हुए पूछा।
"तुम एबॉर्शन न करवाओ प्लीज। इस बार लड़का ही होगा " ताबिश ने कहा।
"ठीक है। मेरी जान की परवाह नही तो न सही, पर क्या गारंटी है। कि इस बार लड़का ही होगा।" सायमा ने सवाल किया। कमरे में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। "बोलो चुप क्यों हो ताबिश क्या होगा अगर इस बार भी लड़की ही हुई। सायमा ने गर्दन झुकाएं बैठे ताबिश का हाथ झटकते हुए कहा। "अच्छा मान लो अगर लड़का ही हुआ।" इतना कहकर सायमा रुक गई। ताबिश की आँखों में एक चमक सी आ गई। "और मैं न रही।" सायमा ने आस भरी नज़रो से ताबिश की तरफ देखते हुए अपनी बात पूरी की। कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया ताबिश की आँखों की चमक पल में फुर्र हो गई। वह लाजवाब होकर सायमा का मुहं ताकने लगा।
"तो तुम पक्का चाहती हो की में दूसरी शादी कर लूँ ?"
"अगर मैं न कहती तो क्या तुम नही करते ? " सायमा ने ताबिश को एक बार फिर लाजवाब कर दिया।
"आखिर तुम चाहती क्या हो ?" ताबिश ने झल्लाते हुए पूछा। "मैं जीना चाहती हूँ ताबिश। मेरी बेटियो को भाई से ज्यादा माँ की ज़रुरत है। सायमा की आँखों से आंसू उबल पड़े।
"क्या तुम्हे नही पता हमारे मज़हब और देश के क़ानून में एबोर्सन हराम है।" ताबिश ने आखरी दांव चला।
"और ख़ुदख़ुशी करना भी हराम है।" सायमा ने सपाट लहज़े में कहा। "कैसी खुदखुशी कौन कर रहा है खुदखुशी" ताबिश ने बदहवास सा होकर सायमा की तरफ देख कर पूछा। "मुझे पता है कि अगर मैंने इस बच्चे को जन्म दिया तो मेरा बचना मुश्किल है। फिर भी मैं इसे जन्म दूँ। ये खुदख़ुशी नही तो और क्या है ?"
"तुम माँ होकर ऐसी बाते सोचती हो।" ताबिश ने तंज़ किया।

"माँ हूँ। तभी ऐसा सोच रही हूँ ताबिश ,तुम उस के लिए मुझसे बहस कर रहे हो। जिसे मेरी कोख में आये सिर्फ दो महीने हुए है। और में उनके बारे में सोच रही हूँ। जिन्हे मैने  ९-९  महीनो तक अपनी कोख में रख कर जन्म दिया है। शादी के वक़्त जब दहेज़ में कार की मांग की थी तब तो तुमने मज़हब और देश के क़ानून के बारे में नही सोचा। उस वक्त दहेज़ के साथ ये भी कह दिया होता कि लड़की की कोख से एक बेटा भी ज़रूर चाहिए।"  सायमा ने सुलगते लहज़े में कहा । "मैने तुम्हारी हर बात मानी, तुमने जॉब छोड़ने को कहा मैने छोड़ दी । परदे में रहने के लिए कहा मै बुरखा ओढ़ने लगी। और कितने समझोता करूँ खुद से।अब नही ताबिश। अब मुझे खुद के और अपनी बेटियों के लिए जीना है। और रही तुम्हारी मोहब्बत की बात, तो वो तुमने कभी की ही नही थी। अगर की होती तो सैकड़ो बार ज़रा-ज़रा सी बात पर तलाक की धमकी नही देते । रायमा ,रिमशा और ज़ूबी की पैदाईश पर हज़ारो ताने नही दिए होते। " सायमा बोले जा रही थी और ताबिश बुत बना सुन रहा था उसके पास कोई जवाब नही था। "तुमने कभी मोहब्बत के नाम पर और कभी मज़हब के नाम मुझे बहुत मज़बूर किया है। तुम्हे तो इन दोनों लफ्ज़ो का मतलब भी नही पता। जाओ हर बार तुम मुझे तलाक की धमकी देते थे। आज मैं तुम्हे तलाक देती हूँ ताबिश। तलाक......... तलाक.......  तलाक..... ।"



Tuesday, March 1, 2016

सोचो..........

  रास्ते है,पर ना रहबर है ना कोई मंज़िल है।
  बस एक कारवाँ है। जो अंधेरो के हमराह है।
  उजाले सारे पीछे छूट गएँ हैं।
  सत्य, अहिंसा और इंसानियत सब से एक एक करके नाते टूट गएँ है।
  अब बाकि बस एक मंच है,उस पर भीड़ है। और सामने झूठ का परदा है।
  हर चेहरा पर सच का नकाब है। और नकाब पर थोड़ी-थोड़ी गर्दा है।
  शहरो में सन्नाटा और खेत-खलिहानों में मौत मंडराती है। 
  पीड़ा में आनन्द आने लगा। खुशियाँ इस महंगाई में खूब रुलाती  है। 
  हाँ पर पैसे, कुर्सी और पुरस्कार आजकल खूब इतराते है। 
  इनकी खातिर ज़िंदा मुर्दे और मुर्दा ज़िन्दे हो जाते हैं। 
  पर ये दुखड़ा किसे सुनाये ,किसे देश की हालत बताएं। 
प्रधान सेवक सब अपनी धुन में मस्त है, जनता भाड में जाये।
  राष्ट्वादी सब फेसबुक पर और देशभक्त सब ट्वीटर पर है। बाकि टीवी पर आते है। 
  कोई बचा ही नही। तो फिर सोचो ..... !
  मारो-मारो सड़को पर ये कौन चिल्लाते है ? 

Saturday, February 20, 2016

क़िस्त....

"बड़े बाबू नमस्कार।" ...... कोई जवाब नही। थूक निगल कर उसने फिर धीरे से कहा "देव....व..देवधर बाबू...... जी... नमस्कार"  देवधर बाबू कहने में वो पूरा काँप गया था। पर कोई जवाब नही। उसने थोड़ा और जोर से कांपती आवाज़ में कहा "प्रधान जी! नमस्कार..... " इस बार आराम कुर्सी पर बैठे देवधर ने उसकी तरफ उचटती सी नज़र डाली। कन्हैया ने खठ से दोनों हाथ जोड़ दिए। पर देवधर ने कोई प्रतिक्रिया नही दी। कमरे में एक बार फिर से सन्नाटा। कन्हैया हाथ जोड़े टकटकी लगाये देवधर के चहरे के भाव देखता रहा। पर उसे कोई उम्मीद की किरण नज़र नही आई। उसने फिर से अपने शरीर की पूरी ऊर्जा समेट कर कमर को थोड़ा और झुकाया ,सूखते होंठो को जीब से तर किया और गिड़गिड़ते हुए कहा "बड़े बाबू एक पखवाड़े से मजूरी नही मिली अगर........आज मिल जाये तो गरीब के चूल्हे का मुहं धुल जाये बड़ी मुश्किल चल रही है।"  कुछ वक़्त ऐसे ही गुज़र गया कोई जवाब नही। फिर देवधर ने कन्हैया को ऊपर से निचे तक देखा। पर जुबान को अब भी ज़हमत नही दी। कन्हैया अपने मटमैले चेहरे पर उधार की मुस्कान सजाये उम्मीद भरी नज़रो से उन्हें देखता रहा। उसे लगा शायद आज कुछ पैसे मिल जायेंगे।
"तुम्हे पता नही घर में शादी है।कितने काम अधूरे पड़े है और तुम्हे मज़दूरी की पड़ी है जाओ जाकर अपना काम करो कल मिल जाएंगी। देवधर ने रोबदार आवाज़ में हुडकी लगाते हुए कहा। कन्हैया लाचार नज़रो से उन्हें देखता रह गया। उसकी अब कुछ कहने की हिम्मत नही हुई।अपने झुके कंधो पर उम्मीद की लाश लेकर भारी कदमो के साथ दलान से बहार निकल गया।

कन्हैया ज्यादा पढ़ा लिखा नही था बस दो चार दर्ज़े ही पढ़ा था। उसका बाप गाँव के प्रधान के यहाँ काम करता था। उसकी मृत्यु के बाद कन्हैया वहां काम करने लगा था। मज़दूरी कभी हफ्ते भर में मिलती कभी पखवाड़े में मिल जाती। कुछ पक्का नही था। जब तक अकेला था कोई दिक्कत नही थी। पर जब से शादी की,परेशानी होने लगी,अकेला तो कैसे भी पेट भर लेता था। अब बीवी भी साथ में थी। अगला पिछला कुछ जोड़ कर नही रखा था। रोज़ का कमाना रोज़ का खाना था। कोई और आमदनी का साधन भी तो नही था। मजदूरी का ही सहारा था। इसीलिए परेशानी हो रही थी। वरना रघुराम भी तो उसी के साथ काम करता था। वो भी घर परिवार वाला था पर उसने दो भैंसे बांध रखी थी जिनका दूध बेचता था। राघुराम प्रधान के खेतों में मज़दूरी करता। उसकी जोरू कमला जंगल से घास लाती,गृहस्ती की गाडी मज़े में चल रही थी। घर में टीवी मोबेल सब थे। कन्हैया ने भी कई बार सोचा एक भैंस बांध ले पर पैसे कहाँ से लाये। खाने के ही लाले पड़े रहते है। पशुधन के लिए बैंक से क़र्ज़ मिलता था पर उसके लिए भी पहले बाबू लोग को राज़ी करो उन्हें भोग लगाओ तब जाकर कुछ काम बनता है। कई बार प्रधान जी से भी बोला था। बैंक में सिफारिश के लिए पर आजकल वें अपनी छोरी की शादी में व्यस्त है। किसी बात के लिए वक़्त ही कहा है उनके पास।

कन्हैया ने घर का दरवाज़ा खोला आँगन खाली था उसने चारो तरफ देखकर अपनी जोरू को आवाज़ दी "सुमरि........  अरी ओ..........  सुमरिया कहाँ हो जल्दी से बहार आ बड़ी तेज़ भूख लगी है।"  "क्या हुवा क्यों चिल्ला रहे हो" सुमरि ने जुभाई लेते हुए कहा।  " अरे पगली चिल्ला नही रहा तुझे पुकार रहा हूँ। कहाँ अंदर लेटी थी क्या? कन्हैया ने बड़े लाड से अंगड़ाई लेती सुमरि को देखते हुए पूछा।  " हाँ..आँख लग गई थी। चलो मुहं हाथ धो लो में खाना लाती हूँ।" उसने बिखरे बालो को बांधते हुए कहा।

" कुछ पैसे मिले ? सुमरि ने भात की कटोरी बढ़ाते हुए पूछा "
"नही..... कन्हैया ने थकी सी आवाज़ में सुमरि की तरफ देख कर जवाब दिया। "क्या बोले ? कुछ कहा तो होगा। कब देंगे ? "  सुमरि ने कन्हैया के चेहरे पर नज़र गड़ाते हुए पूछा। कन्हैया ने कोई जवाब नही दिया। चुपचाप दाल-भात खाता रहा। अपने मर्द को उदास और थकन से चूर देख सुमरि ने भी और कोई सवाल नही किया।चुपचाप झूठे बर्तन समेटे और आँगन में बिछावन लगाने लगी।

तारो से झिलमिलाते आसमान के नीचे कन्हैया और सुमरि एक चारपाई पर लेटे अपने अनमोल पलो को जी रहे थे। कन्हैया ने सुमरि का हाथ अपने हाथ में उलझा रखा था सुमरि भी होले-होले अपने हाथ से कन्हैया के सिर को प्यार से सहला रही थी।
"कन्हैया ऐसा कब तक चलेगा"
"कैसा...... ?"
"ऐसा ही जैसा चल रहा है "
जब तक तुम कहो सुमरि ...... मैं  तो सारी उम्र ऐसे ही तेरी बाँहो में पड़ा रहूँ। कन्हैया ने सुमरि की आँखों में झांकते हुए शरारत से कहा।
"मज़ाक नही....... मैं, हमारे हालात की बात कर रही हूँ। कब तक ऐसे ही गुजारा चलेगा ? किरयाने वाला भी उधारी देने में आना कानी करता है। ऊपर से अपनी गन्दी नज़र से ताड़ता है। सो अलग।" सुमरि ने चिंता भरी आवाज़ में कन्हैया की तरफ करवट बदल कर कहा। "प्रधान जी से बात की है मैंने अभी थोडा छोरी के ब्याह में उलझे है पर तू फिकर न कर कल मजूरी देने का बोला है सब की उधारी चूका देंगे।" कन्हैया ने सुमरि को अपनी बाँहो में खींचतें हुए कहा। चूड़ियों की खन-खन से आँगन गूंज उठा।  "मजूरी तो मिल जाएगी उसका क्या है। पर आगे की सोचो अभी तो हम दो है। कल परिवार भी बढ़ेगा ऐसे कैसे चलेगा।" सुमरि ने कन्हैया की छाती पर सिर रखे हुए कहा। "पगली... तू क्यों चिंता करती है मैं हूँ ना। मैने बैंक में बात की है क़र्ज़ के लिए बस प्रधान जी ब्याह से निपट ले फिर उनकी जमानत लेकर बैंक हमे क़र्ज़ दे देगा। एक भैंस ले लेंगे। मैं मजूरी करूंगा। तुम भैंस की टहल करना दूध बेचेंगे आमदनी बढ़ेगी तेरे लिए टीवी खरीदुंगा एक मोबेल लेंगे।" कन्हैया ने दूर आसमान में टिमटिमाते तारो को देखते हुए कहा " हा....  हा.......  हा....  हा... " सुमरि की खनकती हंसी से सुनसान वातावरण में घुँगरू से बज उठे। "क्यों हँस रही हो... मोहल्ला जगाओ गी क्या ?" कन्हैया ने खिलखिलाती सुमरि को टोकते हुए कहा। "शेखचिल्ली के सपने दिखाओंगे तो हंसी आयेगी ही।" सुमरि ने हंसी रोकते हुए कहा। "नही रे....... सच बोल रहा हूँ। सरकार पशुधन के लिए बैंक से क़र्ज़ देती है"
"ब्याज भी तो लेती होगी ?" सुमरि ने तुनककर कहा।
"नही ब्याज माफ़ है। बस एक साल बाद थोड़ा थोड़ा करके किस्तों में पैसा चुकाना पड़ता है। रघुराम ने भी तो ऐसे ही दो-दो भैंसे बांध रखी है खूंटे से है। प्रधान जी बता रहे थे ये योज़ना गरीबो के लिए ही है। "
"अच्छा........... !! सरकार अब गरीबो के लिए भी योज़ना बनाने लगी। "
सुमरि ने कन्हैया की बाँह में कचोटी भरते हुए शरारत से कहा। कन्हैया ने भी उसे अपनी बाँहो के घेरे में ले लिया। रात के अँधेरे में प्रेेम की लौ जलने लगी।

आज प्रधान देवधर बाबू की छोरी की शादी थी। पुरे गाँव में न्यौता दिया था। गाँव की औरते के साथ सुमरि भी सज़धज कर आई थी। उसकी सांवली सलौनी सूरत आज बहुत ही मोहक लग रही थी। शादी-ब्याह तो बहाना था उसने श्रृंगार तो अपने मर्द के लिए ही किया था। इसीलिए सुमरि की नज़र बार बार अपने कन्हैया को ढूंढ रही थी।

"सैंय्या मिले मोहे लरकय्या में का करूँ।
बारह बरस की में ब्याह के आई ,सैंय्या चलाये पैंय्या-२ में का करूँ।
जी का करूँ ........
पंद्रह बरस की में गौने पे आई सैंय्या उड़ाए कन्कय्या में का करूँ ।
सोलह बरस की मोरी बारी उमरयां सैंय्या छुडाएं बैय्यां में का करूँ।
जी का करूँ ........
बीस बरस की में होने को आई सैंय्या करे मैय्या -२ में का करूँ।
जी का करूँ ........"

ढोलक की थाप पर कुछ औरते गा रही थी और कुछ ठुमक रही थी कुछ ठिठोली कर रही थी । लम्बे-२ घुंगट निकाले औरते , सरपट इधर से उधर भागते नौकर चाकर ,इंतज़ाम में लगे लोग और भीनी भीनी पकवानो की उड़ती महक चारो तरफ उल्लास ही उल्लास था। जहाँ औरते बैठी थी उनके सामने ही मर्दो की टोली खड़ी थी सुमरि चोर नज़रो से बार बार उधर ही देख रही थी। कि कन्हैया शायद वहां ही हो। उसे कन्हैया तो नही दिखा पर दो लाल लाल आँखे जरूर नज़र आई जो उसे ही घूरे जा रही थी। पहले तो सुमरि थोड़ा सा सकपका गई। फिर उसने पास खड़ी जमना काकी से पूछा "ऐ....... काकी ये कोण है गेरू पगड़ी बाँध रखी है जिसने "   जमना काकी ने आँखे सिकोड़ कर उधर देखा जिधर सुमरि ने इशारा किया था। "अरे........ बिटिया इन्हे नही जानत हो ये ही तो प्रधान जी है। बाबू देवधर ! बड़े ही दयालु मानुष है।" काकी ने एक बात आगे की जोड़ कर परिचय दिया। "अच्छा ये ही है देवधर बाबू" इतना कहकर सुमरि वहां से हट गई और अपनी हमउम्र औरतो की टोली में व्यस्त हो गई।

कोई सास का रोना रो रही थी। कोई अपने मर्द की बाते बता रही थी ,किसी को अपनी नई साडी की खूबी बताने से ही फुरसत नही थी। सुमरि इन बातो से ऊब सी गई , तभी उसे मंडप के पास रघुराम की घरवाली कमला जाती नज़र आई। उसने उधर ही कदम बढ़ा दिए सोचा क्यों न बैंक से मिलने वाले क़र्ज़ के बारे में ही बात कर ले। कमला तेज़ तेज़ कदमो के साथ एक कमरे में गुस गई। सुमरि भी उधर ही बढ़ चली सोचा शायद कन्हैया भी उधर ही मिल जाये। उसने कमरे के पास जाकर कमला को इधर उधर देखा पर वो कही नज़र नही आई। कुछ मर्द मिठाई के टोकरे सरो पर रखे इधर ही आ रहे थे। इसलिए सुमरि थोड़ी सी दिवार से लग कर खड़ी हो गई। इस तरफ ज्यादा लोग नही थे। इक्का दुक्का ही औरत और बच्चे नज़र आ रहे थे। न कन्हैया दिखा और न कमला ही उसे कही नज़र नही आई। इसीलिए वहाँ से वापस मंडप की तरफ मूडने लगी। पर जैसे ही सुमरि आगे बढ़ी उसे किसी के रोने ही आवाज़ आई। उसने आस पास देखा कोई नही था। उसने कान लगाया आवाज़ शायद कमरे से आ रही थी सुमरि ने थोड़ा आगे जाकर एक खिड़की से अंदर झाँका। उसे कमला दिखी जो हाथ जोड़े खड़ी थी उसके सामने एक आदमी खड़ा था जिसकी बस पीठ ही नज़र आ रही थी। उसने सर पर गेरू पगड़ी बांध रखी थी। सुमरि को लगा शायद ये प्रधान देवधर है पर चेहरा नही दिख रहा था।
"प्रधान जी  बैंक वाले कल भी आये थे। बोल रहे थे। कि अगर इस हफ्ते में क़िस्त जमा नही की तो भैंस खोल कर ले जायेंगे। आप तो बोले थे कि आप ने सारी क़िस्त चूका दी " कमला सुबकते हुए कह रही थी। "तुम भी तो बोली थी कि जब कहोगे हाज़िर हो जाउंगी। कितना बुलावा भेजा तुम एक बार भी आई ?" सामने खड़ा आदमी ढिठाई से बोला। कमला की बातो से सुमरि को पता चल गया की ये प्रधान देवधर ही है।
"प्रधान जी हमसे अब ये गन्दा काम नही होता।" कमला ने ज़मीन में गर्दन गड़ाते हुए कहा। मानो उसे खुद से ही घिन आ रही हो।
"ठीक है तो फिर मेरे पास क्यों आई हो "
"आप बखत पे मजूरी दे देते तो हम नही आते। भैंस के दूध के पैसे घर में खर्च हो गए। आप मजूरी नही दे रहे। बैंक वाले धमकी दे कर गए है। कैसे क़िस्त जमा करे। अब और कहाँ जाये ? अगर आप के पास नही आये।" कमला आंसू पोंछते हुए गिड़गिड़ाई।
"सही है। क़िस्त नही चुकाओगे तो बैंक वाले तो आएंगे ही। क़िस्त चूका दो। " प्रधान की निष्ठुर आवाज़ सुनाई दी। "और उन किस्तों का क्या जो मैने कई बार काली रातो में आप की हवस से चुकाई  है। कमला ने थोड़े क्रोध से प्रधान का हाथ पकड़ते हुए कहा।"
"वो तो ब्याज था। मूल तो अभी बाकि है " प्रधान का ठहाका गूंजा।
"भगवान से डरो, कुछ तो तरस खाओ आज तुम्हारी छोरी का ब्याह है।" कमला ने प्रधान के पैर पकड़ते हुए कहा। "तो हम कोनसा आज ही तुमको बुला रहे है कल परसो जब बखत लगे आ जाना सारी किस्तें चुका देंगे।" एक बार फिर प्रधान का ठहाका गूंजा। सुमरि के पाँव ये सब सुनकर कांपने लगे। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा। उसे कभी कमला की सिसकी सुनाई देती तो कभी प्रधान का ठहाका ,कभी उसके कानो में कन्हैया की बीती रात की बाते गूंज़ती "ब्याज माफ़ है। बस एक साल बाद थोड़ा थोड़ा करके किस्तों में पैसा चुकाना पड़ता है।" तो कभी जमना काकी की बूढी आवाज़ "बाबू देवधर! बड़े ही दयालु मानुष है" उसे हतोड़े सी अपने सिर पर पड़ती महसूस होती।

"सुमरि...... आँखे खोलो सुमरि " उसे कन्हैया की आवाज़ सुनाई दे रही थी। आँखे खोली तो सामने परेशान सा कन्हैया खड़ा था। "क्या हुवा तुम्हे? बेहोश क्यों हो गई थी।" कन्हैया ने सुमरि के बगल में बैठते हुए बड़े प्रेम से पूछा। सुमरि कुछ नही बोली बस एकटक कन्हैया के चेहरे को देखती रही। "यहाँ मुझे कौन लाया है। "सुमरि ने कन्हैया की तरफ देखते हुए कमजोर सी आवाज़ में पूछा। "मैं लाया हूँ और कौन लाता। तुम अचानक बेहोश हो गई थी।" कन्हैया ने उसके हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा। सुमरि को कमला और प्रधान की सारी बाते एकदम से याद आ गई उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वो कन्हैया से छोटे बच्चो की तरह लिपट गई।
'कन्हैया हम बैंक से क़र्ज़ नही लेंगे। " सुमरि ने कन्हैया से रोते हुए कहा।
"नही लेंगे। जैसा तुम कहोगी वैसा ही करेंगे। तू रोती क्यों है पगली "  इतना कह के कन्हैया ने भी सुमरि को अपनी बाँहो में भर लिया।