Friday, September 2, 2016

पागल

"जज साहब....मेरे चारो तरफ गिद्ध थे। जो मेरे जिस्म को नोंच रहे थे।"
"अच्छा...तो वो गिद्ध थे। तुम्हे सही से याद है ना...?"
"जी....नही गिद्ध नही, गिद्ध तो मुर्दो को नोचते है। और मैं तो ज़िंदा हूँ। वें तो बाज़ थे। जो मुझे अपनी तेज़ निकुली चोंच से नोच रहे थे।"
"पक्का बाज़ ही थे ना...?" उन्होंने घूरते हुए पूछा।
"नही-नही बाज़ भी नही,बाज़ तो आसमान में उड़कर शिकार करते है। और वें तो खुली सड़क पर मुझे नोच रहे थे। लगता है वें आवारा कुत्ते थे। जो मुझे चाट भी रहे थे और पंजो से नोच भी रहे थे।"
"अरे...... सही से,आराम से सोच कर बताओ डरो नही।" उन्होंने अपनी मुस्कुराहट को दबाते हुए कहा।
अदालत में बैठे लोगो में भी खुसर-फुसर होने लगी।
"ओह ! रुकिए। वें कुत्ते भी नही थे। कुत्ते होते तो भौंकते जरूर । पर वें तो चुप थे।" उसने सोचते हुए कहा।
"पक्का वें शेर या चीते थे। जो इतनी बेरहमी से मुझे झंझोड़ रहे थे। पर शेर या चीते तो झुण्ड में शिकार नही करते है। और वें तो बहुत सारे थे। वें शायद.............???
"रुको, रुको.....एक मिनट रुको जरा। तुम पागल हो या अंधी हो, ये क्या तुमने कुत्ता,शेर ,बाज़,गिद्ध लगा रखा है इतनी देर से,क्यों जानवरो और पक्षियों को ज़लील और शर्मिंदा कर रही हो। आँखे खोल कर ध्यान से देखो क्या वें इनके जैसे ही इंसान नही थे। जो यहाँ बैठे है। और जब तुम बचाओ... बचाओ चिल्ला रही थी। क्या ये सब वहां खड़े तमाशा नही देख रहे  थे..? ध्यान से देखो।" एक बंदर जो काफी देर से अदालत की करवाई देख और सुन रहा था। उसने चिल्ला कर कहा।
"अरे हाँ वें तो इंसान थे। मैं भी कितनी बड़ी उल्लू हूँ समझ ही नही पाई सॉरी जी....." औरत ने एकदम से जोश में चिल्लाते हुए कहा।
"फिर तुमने उल्लू कहाँ......? तुम भी इंसान ही हो उल्लू नही समझी।" बंदर ने गुस्से से कहा।
"सॉरी, औरत हूँ ना, तो भूल जाती हूँ। कि मैं भी इंसान ही हूँ। माफ़ कर दो, गलती भी तो इंसान से ही होती है।" उसने बंदर की तरफ हाथ जोड़ कर कहा।
"हां जज साहब वें इंसान ही थे जो मेरे जिस्म को जानवरो की तरह नोच रहे थे।" औरत ने इस बार बड़े आत्मविश्वास से कहा।
इस बात पर बंदर दांत पीसकर रह गया। पर बोला कुछ नही।
"क्या तुम उनका चेहरा पहचान सकती हो...? जज साहब ने पूछा।
 
"साहब देखने में तो आप की ही तरह लगते थे।"
"कोई और पहचान बताओ मेरी तरह से क्या मतलब है..?"
"मतलब ये हुजूर... कि आप ही तरह दो आँखे, दो कान, दो हाथ, दो पैर और बाल भी आप ही के जैसे काले थे। औरत ने जज साहब को बड़े ध्यान से देखते हुए कहा।"
"साहब ये औरत पागल है। देखा नही कैसे एक बन्दर के बहकावे में आ गई।" एक संतरी जो जज साहब के पास खड़ा था। उसने धीरे से जज के कान में कहा।
"ह्म्म्म...." जज साहब ने गहरी सांस ली।
"क्या तुम पागल हो गई हो वो मेरी तरह कैसे हो सकते है। मैं तो जज हूँ।" जज साहब ने थोड़ा सकपकाते हुए औरत से कहा।
"पर हो तो इंसान ही और इंसान से तो गलतियां हो ही जाती है साहब..." औरत ने बंदर की तरफ देखते हुए कहा।
"लगता है। इसका दिमाग़ी संतुलन सही नही है। ये औरत पागल है। इसे पागल खाने में ले जाओ। और इस बंदर को भी पकड़ कर जंगल में छोड़ आओ।" जज साहब ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए कहा।और अपना काला चोगा संभालते हुए अदालत से बहार निकल गये।
औरत चिल्लाती रही "नही...... मैं पागल नही हूँ नही.... मैं पागल नही हूँ......।
"अरे...क्या हुआ..आँखे खोलो बेटी.. क्या हुआ..?  क्यों पागल नही हो पागल नही हो चिल्ला रही हो कोई सपना देखा है क्या ?"
अम्मी मुझे झंझोड़ रही थी। और मैं आँखे मथते हुए बदहवास सी इधर-उधर देख रही थी।
"जी अम्मी आज फिर वो ही अदालत वाला सपना देखा है। मैंने।"
"जिसमें बन्दर भी बोलते है...?
"जी..."
"तुम भी ना जोया, हद करती हो। सपनो से ही डर जाती हो। और सोचो बंदर भी कही ऐसे बोलते और गवाही देते है भला।" अम्मी ने हँसते हुए कहा। "अच्छा अब उठो, जल्दी से तैयार हो जाओ कॉलेज के लिए देर हो जायेगी वरना। पागल..." अम्मी मुस्कुराती हुए कमरे से बहार चली गई।


Wednesday, August 31, 2016

है कौन वो ?

है कौन वो ........ दिल जलाएं फिरता है जिसकी याद में, ये जुगनू रात भर,
जिसकी तड़प में तितलियाँ मचलती रहती है इधर से उधर।

है कौन वो जो कर देता है खुद से ही बेगाना,
है कौन वो जो देता है इस तरह के ख्यालों को पर।

कौन है जो लगाता है नीदों पे पेहरा मेरी,
है कौन वो जिसकी यादें कर देती है पलको को आँसूओ से तर।

कभी मैं आसमां में उड़ता फिरूँ, कभी जमी से लिपट कर तड़पा करूँ, 
है कौन वो जो मुझमें समाया रहता है इस कदर।

हवा उसकी ही खुश्बू लाती है, धड़कने उसके ही गीत गाती है,
है कौन वो जो हर शय में मुझको अब आता है नज़र।

ये घर के लोग,ये शहर,ये आइने में मेरा वज़ूद सब अज़नबी से लगते है आजकल,
है कौन वो जिसने कर दिया खुद से ही मुझको बे ख़बर।

रास्तो से पूछा, हवा से पूछा, उड़ते परिंदों, बहते पानी से भी मैं पूछता फिरूँ,
है कौन वो जिसका पता कहीं भी मिलता ही नही मगर।

रात चाँद भी सुनकर मेरी पुकार छुप गया बदलो में, ऐ खुदा तू ही आसरा दे अब,
है कौन वो जिसकी ख़ातिर हर दर पे जाके पटकता हूँ मैं सर।

अब तो रास्ते भी चिढ़ने लगे है मुझसे, मंज़िले भी कहती है भटक गया है तू,
है कौन वो जिसकी ख़ातिर बन गया मैं "मुसाफ़िर" छूट गया है घर।

है कौन वो, है कौन  वो.........  


Sunday, August 21, 2016

सृष्टि की अनमोल रचना

झरोंको से झांकती धूप जब तेरे चेहरे को छूती है,
तुम सूरज बन जाती हो ।
आंगन में जब खिले फूलो के बीच जाती हो ,
तुम चंचल तितली बन जाती हो।
जब जब लहराता है रेशमी अंचल तेरा,
तुम पुरवाइयाँ बन जाती हो।
ये स्याह ज़ुल्फे करती है जब चेहरे से अठखेलियाँ, ये भौंरा ,
तुम खिलता कमल बन जाती हो।
शब्द जब जब तेरे होंठो को छूकर बरसते है।
तुम मीर की रुबाई,ग़ालिब की ग़ज़ल बन जाती हो।
काजल भरी नज़रो से यूँ तेरा जी भर कर ताकना,
तुम सच में कातिल बन जाती हो।
जब लगाती हो बेबाक ठहाके सब कुछ भुलाकर,
तुम मेरी पूरी दुनिया बन जाती हो।
नन्हे कदमो के पीछे मधम-मधम जब दौड़ लगाती हो ,
तुम सृष्टि की सबसे अनमोल रचना ममता बन जाती हो।

Wednesday, August 3, 2016

आखिरी मौका

"अपने इन मासूम बच्चों का सोचो ......... क्या होगा इनका तुम्हारे बाद ?" पड़ोस वाली मीणा आंटी ने बड़े प्यार से पास खड़े दोनों बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
"अपने परिवार का सोचो , माँ पर क्या गुजरेगी ,बाप पर क्या बीतेगी बेटी।" पड़ोस वाले रमेश अंकल ने भी पडोसी का हक़ अदा किया।
"हर साल रक्षाबंधन पर अपनी सुनी कलाई देखकर.........  भाई का क्या हाल  होगा। " एक और नवयुवक ने अपनी तरफ से कोशिश की।
"अरे......... अपने पति का सोचो कितनी बदनामी होगी उसकी समाज में लोग कैसी कैसी बातें बनाएंगे।" शर्मा जी ने अपने खादी के कुर्ते का मान रखते हुए रौबदार आवाज़ में समझाया।
"बूढी सास लोगो के ताने कैसे सह पाएंगे।" ये शीतल आंटी थी।
"नीचे आजा बेटी घर में छोटे मोटे झगडे तो होते ही रहते है। जिद छोड़ दे। मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूँ । " भीड़ में सबसे आगे खडी एक अधेड़ उम्र की स्त्री ने अपने वजूद के विपरीत मरी और घबराई सी आवाज में कहा।
"आप की क्या लगती है ?"
"मैँ इसकी सास हूँ। " स्त्री ने रोनी आवाज में जवाब दिया।
"कोई छत पर जाकर क्यों नहीं उतार लाता?"
भीड़ में से किसी ने कहा। कोशिश की थी,पर दरवाजा अंदर से लॉक है।
"पुलिस को फ़ोन किया।" कर दिया है पर अभी तक नहीं आई।
"अरे.........  सब नाटक है। मरना होता तो घर में पंखे से लटक कर फांसी लगाती या सल्फास खा कर मर जाती।"
"सही कहा बहन मरने वाले इतना तमाशा नहीं करते।"
भीड़ में औरते खुसुर फुसुर कर रही थी।
"अम्मा जी इनके पति,मेरे मतलब है आप का बेटा कहाँ है।" भीड़ में से किसी सज्जन ने पूछा।
"अरे...... वो तो दो दिन से काम के सिलसिले में बहार गया हुआ है।" स्त्री छाती पीटते हुए बोली ।
"आप को इनके घर वालो को फोन करना चाहिए, हो सकता है उनकी ही बात मान जाये।" एक सज्जन ने सलाह दी।
"खबर कर दी है आते ही होंगे।" पास ही खड़े लड़के ने (जो की इस पूरे घटनाक्रम की वीडियो बना रहा था। ) जवाब दिया।
"ये मरना क्यों चाहती है ?" काफी देर बाद किसी ने सही सवाल उछाला।
सब एक दूसरे का मुहं देखने लगे। "ये बात तो अम्मा ही बता सकती है." मीणा आंटी ने आत्महत्या पर उतारू स्त्री की सास की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"मुझे कुछ नहीं पता में तो मंदिर गई  हुई थी हाय हाय........ " अधेड़ ने दहाड़े मार मार कर रोते हुए कहा।
"मुझे तो मामला दहेज़ का लगता है। बुढ़िया झूठ मूट के आँसू  बहा रही है।" एक ने कहा।
"हो सकता है। बहु के अवैध सम्बन्ध हो और बुढ़िया ने रंगे हाथो पकड़ ली हो।" दूसरे ने कहा।
"मियां  हमारे घर नहीं हमे किसी का डर नहीं।" तीसरे ने चुटकी ली।
"अरे कू..... दी."
"रोको। "
"अरे  रोको "
'रुको "
'रुक जाओ ऐसा मत करो।"
आत्महत्या के लिए तीन मंजिले मकान की छत पर चढ़ी स्त्री को कूदता देख भीड़ ने शोर मचा दिया।
शोर सुनकर स्त्री फिर रुक गई और मुंडेर पर बैठ गई।
"ये आखिर चाहती क्या है। अगर मरना ही है तो कूद जाये। मरने से इतना ही डरती है। तो तमाशा ख़त्म करें और नीचे आ जाये।" काफी देर से इस हंगामे को देख रहे। एक सज्जन ने थोड़ा उक्ता कर कहा। उन्हें शायद जल्दी थी इसीलिए इस खेल का अंत जल्द चाहते थे। या तो मरे या नीचे आये।
"पुलिस.......... आ गई ।"
"पुलिस.......... आ गई।"
भीड़ ने पुलिस की गाडी का सायरन सुनकर कौतूहल में शोर मचाया। सब को लगा के शायद अब ये किस्सा जल्दी ही ख़त्म हो जायेगा।

पुलिस की गाडी से तीन लोग बाहर निकले उनमे से दो कॉन्स्टेबल और एक सब इस्पेक्टर था।
"फैमली के लोग सामने आये।" एक पुलिस वाले ने कहा।
"जी मैं इसकी सास हूँ।"
"क्या मामला है,क्यों मरना चाहती है ये ? "
"साहब मुझे कुछ नहीं पता में मंदिर से लौटी तो घर का दरवाजा अंदर से लॉक था। बाद में बाहर शोर सुना तो देखा बहु मरने के लिए छत से कूद रही है। "
"हम्म्म.... इनके पति कहाँ है ?"
"वो तो दो दिन से काम के सिलसिले में बाहर गया हुआ है।" स्त्री ने जवाब दिया।
"आप नीचे आ जाइये जो भी दिक्कत है। हमे बताइए हम दूर करा देंगे।" इस्पेक्टर ने अपनी टोपी सँभालते हुए छत पर खड़ी स्त्री की तरफ देखते हुए कहा।
"हा हा हा हा ,आप दिक्कत दूर करेंगे हा हा हा " छत पर खड़ी स्त्री ने ठहाके मार मार कर हँसते हुए कहा।
"इसका मानसिक संतुलन तो सही है ?" पुलिस वाले ने पास खड़ी स्त्री से पूछा।
"जी सुबह तक तो सही थी।" बुढ़िया ने पसीना पोछते हुए जवाब दिया।
"घर में किसी बात को लेकर कोई झगड़ा हुआ हो ?"
"नहीं साहब ! ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ।"
"पारुल मेरी बच्ची......... हाय, हाय.......  बेटी...... "
भीड़ को चीरती हुई एक स्त्री जोर जोर से रोती हुई सामने आई।
" बेटी नीचे आजा, अपनी मम्मी की बात नहीं मानेगी बेटी..... पारुल..... " स्त्री बेसुध हुई जा रही थी। ये छत पर मरने के लिए खड़ी स्त्री की माँ थी।
बेटी तुम्हे क्या दुःख है क्या परेशानी है। मुझे बता,मरने से समस्या हल नहीं होती। बेटी मैं तेरा पापा हूँ प्लीज मेरी बात मान जैसा तुम कहोगी ऐसा ही होगा पर नीचे आजा। "
"आप इनके पिता है ? "
"जी इस्पेक्टर साहब "
"देखिये अगर ससुराल की तरफ कोई दहेज़ की मांग या दूसरा मामला है। तो साफ़ साफ़ बताईये। " इंस्पेक्टर ने कहा।
"नहीं-नहीं सर शादी को ४ साल  हो गए ऐसी तो कोई बात नहीं। "
"आप की लड़की का मानसिक बीमारी तो नहीं है ?"
"जी.... जी नहीं बिलकुल नही।" आदमी ने हिचकते हुए जवाब दिया।
"तो फिर आप अपनी लड़की से पूछिए मामला क्या है।" इंस्पेक्टर ने अपनी टोपी सही करते हुए थोड़ा झुंझलाकर कहा।
"आखिर तुम चाहती क्या हो बेटी ? " स्त्री के पिता ने चिल्लाकर पूछा।
"पापा मैं जीना चाहती हूँ।" स्त्री ने हिचकियाँ लेते हुए कहा।
"अरे पागल है क्या,जीना ही चाहती है, तो फिर मरना क्यों चाहती है?" भीड़ में से एक सज्जन ने कहा ।
"ठीक है बेटी हम भी ये ही चाहते है। शाबाश ! मेरी अच्छी बच्ची नीचे आ जाओ।"
"आप समझे नहीं पापा..... मैं अब खुद के लिए जीना चाहती हूँ। बचपन से आज तक दूसरों के लिए जीते-जीते,  मैं थक गई हूँ..... अब खुद से और समझौते नहीं कर सकती।" उसने सिसकते हुए कहा।
"पापा आप को याद है। बचपन में आप हमेशा भैय्या के लिए खिलौने लाते और मुझे हमेशा समझाते के तुम बड़ी हो भैय्या छोटा है। ६ साल की बच्ची बड़ी कैसे हो सकती है। पापा ?  थोड़ी बड़ी हुई तो हर बात पर, हर जिद्द पर तुम लड़की हो,लड़की ऐसे जिद्द नहीं करती,लड़की ऐसे नहीं हंसती, लड़की ऐसे नहीं करती, लड़की वैसे नहीं करती। ये सब सुनने को मिलने लगा। बस में ,मार्कीट में, स्कूल में ,जहाँ भी जाती लोगो की गन्दी नजर हमेशा मुझे घूरती। और मम्मी आप हमेशा मुझे ही समझाती, डाँटती , कि दुपट्टा सही से ओढ़ा करो, नज़रे नीची कर के चला करो। ऐसा क्यों था मम्मी ?
"पढाई में भैया से हमेशा अच्छे नंबर लाती पर आप ने मुझे फिर भी जॉब नहीं करने दी। ये बोल कि समाज क्या कहेगा बिरादरी के लोग क्या सोचेंगे। समाज और बिरादरी की फ़िक्र थी आप को मेरी नहीं........ । भैय्या अपने सारे फैसले खुद करते। यहाँ तक की भैय्या ने लव मेर्रिज की। और मेरे लिए.... " लम्बी सास ली।
"आपने एक अच्छा कमाऊं लड़का ढूंढ कर मेरी शादी कर दी और आप के सिर से एक बोझ कम हो गया। हम्म्म ..... बोझ ही तो होती है लड़कियां माँ बाप के लिए। " उसकी आवाज़ हिचकी में अटक गई।
"ससुराल में दिन रात काम करो, सास-नन्द के ताने सुनो पति की हर अच्छी बुरी बात पर चुप रहो। क्यूंकि अच्छे घर की बहु ज्यादा नहीं बोलती। हा हा हा अजीब दस्तूर है।" उसने तंज़ से ठाहका लगाया। वहां मौजूद भीड़ में सन्नाटा पसर गया । "माँ बनना हर शादी-शुदा स्त्री का सपना होता है। पर अगर लड़की पैदा हो जाये ....... तो ये सपना ही उसके लिए सबसे बड़ा पाप बन जाता है। आखिर क्यों? क्यों ? पति किसी भी स्त्री से बात करें तो सही है । और स्त्री अगर किसी पराये मर्द की बात भी कर ले तो चरित्रहीन हो जाती है । क्यों ?  मैं खुल कर नहीं जी सकती क्यों अपना कोई भी फैसला खुद नहीं कर सकती। अरे....... थू  है ऐसी ज़िन्दगी पर जहां में सब्जी भी खुद की पसंद की नहीं पका सकती। उसके लिए भी पति की पसंद पूछनी पड़ती है। वो गुस्से से कांप रही थी।  नीचे खड़े लोग एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे। उन्हें ऐसी उम्मीद नहीं थी।
"ये सब फिल्मों का असर है देखा कैसे भाषणबाजी कर रही है। "
"ये भी कोई बात हुई मरने के लिए अरे सभी औरत ये काम करती है। " जितने मुहं उतनी बातें हो रही थी।
"ठीक है अब से आप जैसा चाहेंगी वैसा ही होगा। पर आप नीचे आ जाइए।" पुलिस वाले ने कहा।
"हा हा हा किसे दिलासा दे रहे हो इस्पेक्टर........ सीता  मैय्या से लेकर निर्भया तक कुछ नहीं बदला इस समाज में। कहानी वही है बस पात्रों के चेहरे अलग है। " स्त्री आज भी अग्नि परीक्षा देती। कभी सुना है किसी बलात्कारी पुरुष का कोई टेस्ट हुआ है। नहीं..... हमेशा बलात्कार पीड़ित स्त्री को ही टेस्ट देना होता है।ये साबित करने के लिए की हाँ उसका बलात्कार हुआ है। ऐ नारी को सम्मान और बराबरी का दर्ज देने का ढोल पीटने वालो आधुनिक बनने से पहले इंसान बनो।" उसने भीड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"मैं ये नहीं कहती के सभी बुरे है। या सब औरतो के साथ ऐसा होता है। पर मेरे साथ जो हुआ। जो कुछ मैंने जिया है। उसके हिसाब से ये दुनिया अभी मेरे काबिल नहीं है या मैं इस दुनिया के लायक नहीं। यहाँ मौजूद सभी लोगो ने मुझे मरने से रोकने के लिए अलग -अलग दुहाई दी। किसी ने बच्चों का मोह दिखाया,किसी ने माँ बाप के दुःख की दुहाई दी,किसी ने समाज में मेरे पति की बेइज़्ज़ती का भय दिखाया। किसी ने भी एक बार मेरे बारे में सोचा। मेरी ज़िन्दगी की दुहाई  दी........ ?  नहीं। आप सब मुझे बुजदिल कह सकते है। कुलटा कह सकते है। पागल कह सकते है। मुझे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि में खुश हूँ। जीवन में पहली बार अपने लिए कोई फैंसला ले रही हूँ। मैं नहीं चाहती की जो घुटन मेरे अंदर पिछले ३५ सालो से है। वो मेरा दम घोट कर मुझसे ये आखरी मौका भी छीन ले। चाहे वो मौत को चुनने का ही क्यों ना हो। अगर इंसानियत ने फिर से जन्म लिया तो हम जरूर मिलेंगे।" उसने छलांग लगा दी और तमाशा खत्म हो गया।

Wednesday, June 22, 2016

नीम का पेड़

"जब तक मैं अब्बू के कंधो पर बैठ कर बाजार का चक्कर नही लगाती मेरी शाम नही होती थी। उनके कंधे जैसी महफ़ूज़ सवारी आजतक नही मिली।100 तक गिनती उनके कंधो पर ही सीखी थी मैने।
"फिर....? 
"फिर.... मैं बड़ी हो गई और अब्बू बूढ़े।" 
"वो आप को डांटते भी थे ?" 
"हाँ...डांटते थे और प्यार भी करते थे। बिलकुल इस नीम के पेड़ की तरह थे। कड़वे पर छायादार।
"अम्मी जब अब्बू आप पर गुस्सा करते है। आप को नानू बहुत याद आते है ना ?"
"नही, जब वें तुम्हे कंधो पर उठा कर आइसक्रीम खिलाने ले जाते है तब ज्यादा याद आते है।"

Tuesday, June 14, 2016

नई डिमांड

बचपन में गुड्डे-गुड़िया की ,खेल-खेल में शादी कराते-2 पता नही कब मैं खुद की शादी के सपने सजाने लगी।
और कब ये सपना हकीकत बन गया पता ही नही चला। ऐसा लगता है जैसे मानो कल की ही बात है।
विदाई के समय मम्मी-पापा का तो रो-रो कर बुरा हाल था।
पापा तो मेरे जाने के बाद कई दिनों तक बहुत उदास रहे थे।
आह... कितने अच्छे दिन थे।
और अब अगर बिना फोन किये मम्मी-पापा से मिलने चली जाती हूँ तो उनके चेहरे पीले पड़ जाते है।
सोचते है। पता नही दामाद ने अब कौन सी नई डिमांड की है।


Monday, April 11, 2016

कर्मो का फल

"क्या कुछ नही किया हमने उसके लिए।"

"वो हमारा फ़र्ज़ था जी।"

"तो क्या उसका कोई फ़र्ज़ नही ? क्या इसी दिन के लिए उसे पढ़ा लिखा कर कामयाब किया था ......?कि एक दिन वो हमें ही 

बोझ समझने लगेगा।" "वो जल्दी ही हमें ले जायेगा।आप दुःखी ना हो।" मालती ने पति से ज्यादा खुद को तसल्ली दी।

"क्या तुम इस आश्रम में खुश हो तुम्हे दुःख नही मालती ?"  "हाँ है। पर इस बात का।कि काश.......! इस बेटे की चाह में 

उस बेटी को गर्भ में क़त्ल करने की बेवकूफी न की होती। ये हमारे कर्मो का फल है जी"