Saturday, August 28, 2021
मेरे बचपन का स्वतंत्रता दिवस 🇮🇳🇮🇳
गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त
Sunday, September 1, 2019
खुशनसीब है जिन्हे टिकटोक और पब जी के ज़माने में जवानी जीने का मौका मिल रहा है
क्यूंकि हम सब एक सांचे में फिट हो गए है, हमें पढ़ने से ज्यादा देखना पसंद है , सोचने से ज्यादा मुस्कुराना पसंद है। खैर सोशल मीडिया पर अपनी फ्री की 1.5 GB में से #aveKashmir लिखकर अपना फ़र्ज़ पूरा करने वाली पीढ़ी खुशनसीब है जिन्हे टिकटोक और पब जी के ज़माने में जवानी जीने का मौका मिल रहा है इसके लिए हम सभी को बधाई।
क्या आप पता है की ......
१-अर्जेंटीना और भारत की अर्थव्यवस्था की तुलना क्यों की जा रही है?
२- मदन मल्लिक कौन है?
३- मौहम्मद अलीम सैय्यद कौन है ?
४ - अगर आप उपरोक्त सवालों के जवाब नहीं जानतें तो मुबारक हो आप सच्चे देशभक्त भारतीय हो।
पिछले दिनों हम सबने सुना है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने एक लाख 76 हज़ार करोड़ भारत सरकार को देने का फैसला किया है जिसपर हम सबने नोटबंदी की तरह ही बड़े मज़ेदार जोक्स भी शेयर किये है। ख़ैर तो मैं ऊपर पूछे गए सवालो की बात करता हूँ।
१ - दरअसल, अर्जेंटीना की सरकार ने अपने सेंट्रल बैंक को फंड देने के लिए मजबूर किया था.
ये साल 2010 की बात है. अर्जेंटीना की सरकार ने सेंट्रल बैंक के तत्कालीन चीफ़ को बाहर कर बैंक के रिज़र्व फंड का इस्तेमाल अपना क़र्ज़ चुकाने के लिए किया था.
अब भारत सरकार के रिज़र्व बैंक से फ़ंड लेने की तुलना अर्जेंटीना के अपने सेंट्रल बैंक से फंड लेने से की जा रही है.
अर्जेंटीना लातिन अमरीका की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. लेकिन आज अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था बेहद ख़राब दौर में है। विश्लेषक मानते हैं कि अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने की शुरुआत तब ही हो गई थी जब सेंट्रल बैंक से ज़बर्दस्ती पैसा लिया गया था। भारत और अर्जेंटीना के घटनाक्रम में फ़र्क ये है कि अर्जेंटीना की सरकार ने आदेश पारित कर सेंट्रल बैंक से पैसा लिया जबकि भारतीय रिज़र्व बैंक ने विमल जालान समिति की सिफ़ारिश पर सरकार को पैसा दिया। अब अर्जेंटीना लगातार जटिल हो रहे आर्थिक संकट में फंस गया है जिससे बाहर निकलने का रास्ता नज़र नहीं आ रहा है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने देश के दीवालिया होने का अंदेशा ज़ाहिर कर दिया है।
भारतीय रुपया डॉलर के मुक़ाबले लगातार टूट रहा है. बेरोज़गारी दर बीते 45 सालों में सर्वोच्च स्तर पर है. जीडीपी की दर सात सालों में सबसे कम होकर सिर्फ़ पांच प्रतिशत रह गई है. अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेत स्पष्ट नज़र आ रहे हैं। सरकार के सहयोगी ही इन दावों पर सवाल उठा रहे हैं.
Saturday, December 29, 2018
दुःख और ख़ुशी
दुःख और ख़ुशी
सब कहते है खुश रहा करो, अपने मन मस्तिष्क को सकारात्मक विचारों से भरो।
करो ख़ुद ही मंथन दुःख का खुशी का, जो इनसे पार पा गया अमर हो गया जीवन उसी का है।
किया मैंने गहन आत्ममंथन, सोचा जीवन में दुःख और ख़ुशी का क्या है बन्धन?
पहला प्रश्न जो मैंने खुद से किया, ख़ुशी है क्या?
सकुचाये से मन ने यह लंबा सा उत्तर दिया।
खुशी है दुःखों की दवा या गम की आँधी में कहीं से आया
रंगीन दुपट्टा जो किसी की उतरन है।
या वो किलकारी जो नौ महीने बाद माँ के
कानों में पड़ती है और क्षण भर में 'लड़की
है' जैसे शब्दों में फिर से दफ़न हो जाती है।
या वो प्रेम जो अपनी सीमाओं को लांघ कर
अस्पताल के पीछे नाले में बह जाता है।
या वो सम्मान जो ताबूतों में बंद कर दिया जाता है,
जात-पात के ताले लगाकर।
या वो चमक जो पिचके हुए जर्जर शरीर के सहारे, बेजान आँखों से,
टकटकी लगायें शीशे की दीवार के उस पार रखी रोटी को तकते हुए आंखों में आ जाती है।
या दुल्हन के जोड़े में सजी बेटी की झोली में भरे अरमान,
या उसी दुल्हन को दहेज के लोभ में आग लगाने वालों की
लालच भरी सोच जिसमें भरा है निर्दोष सिद्ध होने का सन्तोष।
इससे आगे मेरा मन उखड़ गया गुस्से से बोला, इसके अलावा कोई और प्रश्न हो तो बोलो, मुझकों ख़ुद के विचारों की तराजू में मत तोलो।
अच्छा दुःख क्या है? बस इतना और बता दो,
तुम ज्ञानी हो तो बिना रुके इसका भी उत्तर दो?
मन ने मुझकों अजीब सी नज़रो से देखा,
नादान!
दुःख और खुशी के बीच है बस एक महीन रेखा।
और बोला दुःख है...
वृद्धाश्रम में लेटी हुई उस माँ की प्रसव पीड़ा जिसकी साँसों की डोर अटकी है किसी अपने के आने की झूठी आस में ।
या सड़कों पर इंसानी भेड़ियों के पंजों में तड़पती किसी निर्भया की चीख,
या मारो-मारो के शोर के साथ अपने हाथों से इंसाफ करती कथित भीड़,
या अन्नदाता का अन्न के लिए तडपकर मर जाना।
या सत्ता के घमंड में जनता की त्राहि-त्राहि पर ठहाके लगाना।
या सीमा पर राष्ट्र की रक्षा करते-करते ठंड से सिकुड जाना।
या इंजीनियर की डिग्री लेकर चपरासी की जॉब के लिए लाइन में लग जाना।
और भी कई रंग है दुःख और खुशी के इस दुनिया में, पर बहुत मुश्किल है सब को एक साथ कह पाना।
इतना कहकर मन मौन हो गया, मेरे विचारों में जैसे कहीं वो खो गया।
और मैं आज भी अटका हूँ उस महीन सी रेखा के सहारे,
जिसे लांघकर जीवन, दुखों को खुशी के पार उतारे।
Saturday, September 1, 2018
खुशी और दुःख
Tuesday, August 22, 2017
पूरा घर राशिद के निकम्मेपन और आवारागर्दी से परेशान था। बूढ़ा बाप दिन रात बिजली के कारखाने में काम करता और जवान बेटा सड़को पर आवारागर्दी। छोटा परिवार था। इसलिए दो वक़्त की रोटी नसीब हो रही थी, वरना ऐसे महंगाई के जमाने में कहाँ गुजारा होता है। दो बहन-भाई और माँ-बाप बस चार लोग थे परिवार में। जमील मियां ने काफी कोशिश की बेटा कुछ पढ़ लिख जाये। पर अकेला होने की वज़ह से घर पर मिले ज्यादा लाड प्यार और उसकी आवारा सोहबत ने उसे कहीं का नही छोड़ा। घर से स्कूल का कहकर निकलता और सारा दिन आवारा दोस्तों के साथ मटरगस्ती करता, यहाँ-वहाँ घूमता। बाप सारा दिन ड्यूटी पर रहता डर किसी का था नही, इसीलिए दिन पर दिन बिगड़ता चला गया। गली मोहल्ले से रोज़ शिकायते आने लगी कभी किसी के साथ मारपीट और कभी किसी के साथ गाली गलोच। रोज़ रोज़ की शिकायतों से तंग आकर जब बाप ने डांट पिलाई कि "राशिद देख या तो ये आवारागर्दी छोड़ दे वरना कहीं का नही छोड़ेगी ये तुझे। पढाई पर ध्यान लगा " तो तिडक कर बोला। "मुझे...... नही पढ़ना है। मुझे पढाई समझ नही आती... । मुझे काम... करना है "
"बेटा पढ़ लिख जायेगा तो तेरे ही काम आएगा। और आजकल तो हर काम में पढाई की जरूरत पड़ती है "
माँ ने भी प्यार से समझाया। पर पत्थर दिमाग पर जोंक न लगी। थक हार कर जुम्मन चाचा की फर्नीचर की दुकान पर ये सोच कर छोड़ दिया के पढ़ा नही है। कम से कम हाथ का दस्तकार ही हो जायेगा तो जिंदगी में भूखा नही मरेगा।
पर आवारा तबियत राशिद यहाँ भी नही टिक सका। दो तीन महीने काम करके जुम्मन चाचा को भी टाटा बाय-बाय कर दिया। बूढ़े बाप ने जैसे तैसे करके बेटी के तो हाथ पीले कर दिए। पर नालायक बेटे को लाइन पर न ला सके। आस-पडोस, यार-रिश्तेदार सब ने ये ही सलाह दी। कि शादी कर दो खूंटे से बंधेगा तो खुद-बर-खुद लाइन पर आ जायेगा। बूढ़े कंधो ने सोचा, ठीक है शादी तो करनी ही है। हो सकता है के दुल्हन का मुंह देख कर ही कुछ अक्ल आ जाये। और इस तरह रुखसाना दुल्हन बनकर इस आवारा के पल्ले बंध गयी।
नयी दुल्हन घर में आई तो खर्चे भी बढ़ गए। कुछ दिनों तक तो सब ठीक चला । पर बूढी कमाई,जवान बहू के खर्चे कहाँ तक बर्दास्त करती। बहू के ताने सास के कानो तक जाने लगे। घर के बिगड़ते हालात को देखकर माँ ने बेटे को खूब समझाया "देख अब कुछ काम धंधा शुरू कर दे। मजदूरी ही करने लग,बहू भी आ गई है कब तक तेरे अब्बू अकेले पूरे घर का खर्च उठाते रहेंगे। अब बहुत हुआ संभल जा बेटा ।" पता नही माँ की नसीहत का असर था या बीवी के खर्चो का ,अक्ल में कुछ बात आई और मजदूरी करने लगा। पर वो कहावत है ना कि चोर चोरी छोड़ देता है पर हेरा-फेरी नही छोड़ता। राशिद पर एक दम सही बैठती है। अब काम तो करता पर अगर दो दिन काम करता तो तीन दिन पड़कर खाता। ऊपर से हर साल बढ़ते परिवार से हालात और ख़राब हो गए। बहू हर वक़त सास को ताने देती। पर ताहिरा बेगम अपनी किस्मत समझ कर चुप रहती। वैसे भी माँ बाप जन्म के साथी होते है कर्म के नही। समझा-समझा कर थक गए। पर राशिद पर कोई फर्क नही पड़ता।
जब तक बाप का साया सर पर था। घर की गाडी किसी तरह चलती रही, पर उनके इंतकाल के बाद हालात बद से बत्तर होते गए। कभी कभी तो फाको की नौबत आजाती। रोज़ रोज़ के झगडे बढ़ने लगे। रुखसाना सास को कोसती, मायके जाने की धमकी देती। इधर बेटा अपने निकम्मेपन से बाज नही आता और इन दोनों के बीच में बूढी ताहिरा बेगम घुन की तरह पिस रही थी। ऊपर से भूखे पोता-पोती, अपनी भूख तो कैसे भी दबा लेती। पर दादी पर छोटे छोटे बच्चो का तड़पना नही देखा जाता। सच ही कहा किसी ने कि मूल से ज्यादा सूद प्यारा हो जाता है। इसीलिए ताहिरा बेगम ने बच्चो की भूख मिटाने के लिए आस-पड़ोस से काफी क़र्ज़ ले लिया था। जो वक़्त पर चुका न सकी और कर्ज़े वाले अब रोज़ आकर खरी खोटी सुना देते। बूढी आँखे शर्म से गर्दन झुकाकर उनसे ना जाने किस उम्मीद पर कल परसो के वादे कर लेती। और हर बार वादा खिलाफी पर नयी ज़लालत और नए वादे । पर नालायक बेटे पर कोई फ़र्क़ नही पड़ा।
और फिर अचानक सब कुछ बदल गया। घर के आँगन में हमेशा ठंडा पड़ा रहने वाला चूल्हा आग से दहकने लगा। पहले हर वक्त भूख से रोने बिलखने वाले बच्चे अब अपनी मस्ती में खेलने लगे। रुखसाना के चीखने चिल्लाने की जगह अब निकम्मे और नकारा राशिद की गन्दी गन्दी गालियों की आवाज आने लगी। "तू...बदचलन है, तू ... बाज़ारू औरत है रुखसाना ..." और रुखसाना आराम से घर के कामो में लगी रहती। उस पर शौहर की बातो का कोई असर नही होता। या शायद अब उसे ऐसे ताने सुनने की आदत थी। कर्ज़े वालो की गन्दी गालियाँ भी अब मुस्कुराहटों में बदल गई थी। बस एक चीज़ अब भी नही बदली थी। और वो थी बूढी ताहिरा बेगम की शर्म से झुकी गर्दन ।
Monday, August 21, 2017
मैं अधूरा इश्क़
तुम बसन्त सी महको मैं पतझड़ सा बिखर जाऊँ।
तुम सुबह की पहली किरण, मैं ढलते सूरज का कोई किनारा सा।
तुम धरा सी दानी, मैं कोई मलंग फ़कीर।
मैं जेठ की तपती दोपहरी सा, तुम सुबह की पहली पहर।
मीर की ग़ज़लों सी, मंटो के अफसानों सी।
राँझें की परछाई सा मजनूं के दुआरे सा।
कृष्ण की मुरली सी मीठी, तान कोई मंजीरों सी।
खतों की झूठी तहरीरों सा,सात जन्मों के बचकाने वादों सा।